{"_id":"6a87b6e54106bd722a0f7c81","slug":"why-is-there-such-contradiction-in-west-s-policies-and-what-then-is-the-justification-for-lecturing-putin-2026-08-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"दुनिया: पश्चिम की नीतियों में इतना विरोधाभास क्यों, फिर पुतिन को नसीहतों का औचित्य?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
दुनिया: पश्चिम की नीतियों में इतना विरोधाभास क्यों, फिर पुतिन को नसीहतों का औचित्य?
Fri, 21 Aug 2026 07:54 AM IST
Pavan
रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
Published by: Pavan
Updated Fri, 21 Aug 2026 07:54 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
- फोटो :
ANI
विस्तार
अमेरिकी नेतृत्व और उसकी नीतियों से जुड़ी दो खबरें सामने आई हैं। एक तरफ यूगॉव और फोकलडाटा के सर्वे में ट्रंप की विश्वसनीयता को संकट में पड़ता दिखाया गया है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सीनेट ‘द लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पारित कर राष्ट्रपति ट्रंप को अभूतपूर्व शक्तियां देने की मंशा प्रकट कर रहा है। यह एक्ट (संसद के निचले सदन में पास होने के बाद) ट्रंप को व्लादिमीर पुतिन और रूस के अन्य बड़े नेताओं, कुलीनतंत्र, रूसी अधिकारियों, बैंकों तथा अन्य संस्थाओं पर अनिवार्य प्रतिबंध लगाने का अधिकार दे देगा। सवाल यह है कि क्या ट्रंप, जो पहले से ही अपनी सनक के चलते दुनिया में अनिश्चितता पैदा कर चुके हैं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था व जीवन को संकट की ओर ले जा रहे हैं, को ऐसे अधिकार देना उचित है?यह एक्ट मूलतः रूस पर प्रतिबंधों के लिए था, पर बाद में इसमें ईरान को भी जोड़ दिया गया, जो ‘ईरान सैंक्शंस एक्ट ऑफ 1996’ की अवधि को और पांच साल बढ़ाता है। यह भी एक विरोधाभास है-एक तरफ समझौता और दूसरी तरफ सैंक्शंस! आखिर अमेरिकी नीतियां इतनी भ्रमपूर्ण क्यों हैं? इसके पीछे तर्क है कि ट्रंप को रूस के खिलाफ सिर्फ प्रतिबंध लगाने की शक्ति नहीं, बल्कि रूसी तेल खरीदारों को आर्थिक दबाव में लाने की भी छूट चाहिए। इसमें नया क्या है? ट्रंप तो पहले से ही टैरिफ को विदेश नीति के हथियार की तरह इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब संभव है कि अमेरिका रूस के अतिरिक्त दूसरे भू-राजनीतिक या आर्थिक विवादों में भी आक्रामकता अपनाए। लेकिन, क्या पुतिन इससे डर जाएंगे? नहीं। अमेरिका जरूर दबाव में आ सकता है, क्योंकि फोकलडाटा सर्वे में 55 प्रतिशत मतदाताओं ने ट्रंप के कार्यों को अस्वीकार किया है। इसलिए संभावना है कि अमेरिकी संकट अभी और बढ़ेगा।
दुनिया दो प्रकार के युद्धों से जूझती नजर आ रही है। पहला है, यूक्रेन के खिलाफ रूसी युद्ध और दूसरा है, क्रेमलिन के खिलाफ पश्चिमी दुनिया का ‘आर्थिक युद्ध’। मगर पूरी पश्चिमी दुनिया के प्रयासों के बाद भी रूस नहीं रुक रहा। कारण, पश्चिमी ब्लॉक जब प्रतिबंध लगा रहे थे, तब रूस अर्थव्यवस्था को युद्ध के अनुकूल ढाल रहा था। यही उसकी उत्तरजीविता का कारण है। अब बात यह कि पुतिन यूक्रेन में जो कर रहे हैं, वह कितना सही और कितना गलत है। पश्चिम की नजर में पुतिन युद्ध अपराधी हैं, लेकिन दूसरों की नजर में वह पूंजीवादी धुरी को छठी का दूध याद दिला रहे हैं। सच क्या है?
पश्चिमी दुनिया प्रायः किसी देश को लोकतांत्रिक, किसी को आधुनिक और किसी को मानवाधिकार संपन्न बनाने का दावा करती रहती है, जबकि इसने लोकतंत्रों को भ्रष्ट किया है, आधुनिकता के नाम पर औपनिवेशिकता दी और मानवाधिकारों के नाम पर युद्ध, हत्याएं तथा पलायन का गहरा दर्द दिया है। यूक्रेन में भी उन्होंने आधुनिकता का दावा किया, लेकिन उद्देश्य कुछ और ही है। मजे की बात यह है कि जो यूरोप अपने आदर्शवादी संघवाद को नहीं बचा पा रहा है, वह यूक्रेन की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बचाने में लगा होने का दावा कर रहा है। अमेरिका घरेलू राजनीति में विभाजन, ध्रुवीकरण और सामंजस्य की कमी से जूझ रहा है, लेकिन अमेरिकी नेता यूक्रेन सहित शेष दुनिया की ओर देख रहे हैं।
दरअसल, नाटो शक्तियां सोवियत खंडहरों पर उगे ‘कॉमन वेल्थ ऑफ स्टेट्स’ (सीआईएस) के हर दरवाजे पर एक पश्चिमी शेरपा खड़ा करना चाहती हैं। गौर से देखिए, तो यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद बहुत-से नकाब उतरे हैं। दिलचस्प यह है कि युद्ध से सभी नुकसान में हैं और फायदे में है चीन। इसके बाद ही रूस और चीन ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक नए युग में प्रवेश’ कर गए। इसी के बाद चीनी अर्थव्यवस्था और रूसी अर्थव्यवस्था ने गठजोड़ करने में सफलता प्राप्त की है। रूस भले ही गलत नजर आए, लेकिन इसे एकांगी दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। इसमें कई पेच हैं। पहला यह कि पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन में लगातार उन दक्षिणपंथी ताकतों को समर्थन दिया गया, जो रूस विरोधी गतिविधियों में लिप्त थीं। यह प्रक्रिया सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही शुरू कर दी गई थी। वहां कुछ ऐसी शक्तियां पैर पसारने लगी थीं, जिनका उद्देश्य नए संघर्षों को जन्म देकर अपने हितों को पूरा करना था। यूक्रेन में दक्षिणपंथी और नव-नाजीवादियों को प्रोत्साहित किया गया, ताकि वे रणनीतिक तौर पर मजबूत हो सकें। पश्चिमी ताकतें इन्हें लगातार समर्थन दे रही थीं। इसके साथ, यदि भाषाई अतिवाद को भी जोड़ दें, तो बात और स्पष्ट हो जाएगी। राइट सेक्टर स्वोबोदा (स्वतंत्रता) तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के समय राष्ट्रवादी स्टेपन बांडेरा जैसे संगठन पूरी तरह से रूस विरोधी और नाजी समर्थक रहे। इनका एक ही उद्देश्य था कि यूक्रेन तथा कुछ अन्य देशों में रूसियों के खिलाफ मुहिम चलाना।
अगर लगभग एक सदी पीछे जाकर देखा जाए, तो अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देश इन दक्षिणपंथी ताकतों को उसी तरह से समर्थन दे रहे थे, जिस तरह से वे 1930 के दशक में नाजीवाद, फासीवाद और जापानी सैन्यवाद को गुप्त समर्थन दे रहे थे। फिर परिणाम तो कुछ वैसे ही होने थे, जिस प्रकार हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी ने छोटे-छोटे राज्यों पर धावा बोलकर उन्हें कब्जे में ले लिया था, पुतिन ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। षड्यंत्र फिर भी नहीं रुके, तो उन्होंने यूक्रेन पर सैन्य कार्रवाई कर दी। पुतिन का कहना था कि 1991 में सोवियत संघ बिखरा, तो रूस पर डाका डाल दिया गया। इसी तरह कभी हिटलर ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साय की संधि को ‘राजमार्ग की डकैती’ कहा था। पुतिन के शब्दों में, वह पिछले 20 वर्षों से सोवियत संघ की पुरानी कड़ियों को जोड़ते हुए अंदर ही अंदर एक युद्ध लड़ रहे थे। हालांकि, यह पूरा सच नहीं है, लेकिन पूरा झूठ भी नहीं।
एक बात और, अमेरिका और पश्चिमी शक्तियां सीधे टकराने के बजाय अक्सर मोहरों के जरिये युद्ध लड़ती रही हैं। यह उनके लिए बिना किसी नुकसान के लाभांश पाने का पुख्ता इंतजाम होता है। यूक्रेन भी ऐसा ही मोहरा है। वे कह रहे हैं कि रूस के राष्ट्रपति को उन यूक्रेनी जिंदगियों की कोई परवाह नहीं है, जिन्हें वे बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन, क्या पश्चिमी दुनिया ने गाजा में बहते हुए खून की परवाह की? क्या पश्चिम ने उन युद्धों पर सवाल उठाए, जो गाजा, बगदाद, तेहरान, काबुल, दमिश्क और बेरूत के खिलाफ उन्हीं की सरजमीं पर अमेरिकी नेतृत्व में पश्चिम द्वारा लड़े गए? क्या वहां से लाखों लोग पलायन कर शरणार्थी का जीवन जीने के लिए विवश नहीं हुए? आखिर दर्द, खून, चिंता....इतना सेलेक्टिव कैसे हो सकता है? बहरहाल, अमेरिकी सीनेटरों ने एक एक्ट पारित कर राष्ट्रपति ट्रंप को मॉस्को और ईरान के खिलाफ अधिक कठोर कार्रवाई करने का अधिकार देने का इरादा दर्शाया है। अब देखना है कि आगे क्या होता है!