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क्षेत्रीय नेताओं से मिलेगी चुनौती

Sun, 22 May 2016 05:09 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 22 May 2016 05:09 PM IST
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Challenges from regional leaders
नीलांजन मुखोपाध्याय

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का नतीजा आने के एक दिन बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी। उसमें उन्होंने एक सवाल उठाया-वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को कांग्रेस चुनौती देगी या क्षेत्रीय पार्टियों का पिटा-पिटाया गठबंधन यह दायित्व निभाएगा? जिस दिन अरुण जेटली ने फेसबुक पर यह पोस्ट लिखी, उसी दिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि भाजपा अब संसद से पंचायत तक-देश के हर राजनीतिक ढांचे पर अपना वर्चस्व स्थापित करेगी। बेशक यह किसी भी राजनीतिक पार्टी की जायज इच्छा हो सकती है, लेकिन भारत में लोकतंत्र है, और हर लोकतांत्रिक देश में एक विपक्ष होता है, इसलिए केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा विपक्ष को महत्व न देना खटकता है।

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2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस उन दो सवालों के जवाब अब तक नहीं दे पाई है, जिनसे उसे जूझना पड़ता है। एक यह कि उसका नेता कौन होगा, और दूसरा यह कि वह किन मुद्दों के साथ जनता के सामने जाएगी। चूंकि कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन लगातार खराब होता गया है, ऐसे में, इसका आकलन करना जरूरी है कि आने वाले दिनों में भाजपा को किनसे चुनौती मिलेगी। कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों से भी बदतर स्थिति में पहुंच गई है। इस समय कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस की सरकारें हैं। इन सभी राज्यों से लोकसभा के लिए कुल 42 सांसद चुनकर आते हैं।
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दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42, तमिलनाडु में 39, बिहार में 40 और ओडिशा में 21 सीटें हैं। इन सबको जोड़ लें, तो 142 सीटें होती हैं। अगर उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों को भी इसमें जोड़ लें, तो यह संख्या लोकसभा में बहुमत के नजदीक पहुंचती है। साफ लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को चुनौती किसी राष्ट्रीय पार्टी से नहीं, बल्कि किसी क्षेत्रीय नेता से मिलने वाली है। वह क्षेत्रीय नेता कौन हो सकता है?
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इस समय नरेंद्र मोदी को मजबूत चुनौती देने वाली राजनीतिक शख्सियत ममता बनर्जी दिखाई देती हैं, जिन्होंने विवादों के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है। जब उनकी जीत के संकेत मिलने लगे थे, तब उनसे यही सवाल पूछा गया था-क्या वह प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं? उनके उत्तर ने मुझे 2012 में नरेंद्र मोदी के ठीक ऐसे ही जवाब की याद दिला दी। तब मैं मोदी की जीवनी लिखने के सिलसिले में गुजरात में था। प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के मेरे सवाल पर उन्होंने कहा था, आपने बहुत बोझिल सवाल पूछा है। अगर मैं इसका जवाब 'हां' में देता हूं, तो विवाद होगा। और अगर मैं 'न' कहूं, तो भी लोगों के कान खड़े होंगे। ममता बनर्जी ने भी ठीक ऐसा ही कहा। जब उनसे आगे पूछा गया कि क्या दूसरी राजनीतिक पार्टियों में उनके दोस्त हैं, तब उनका उत्तर था, नरेंद्र मोदी और सोनिया गांधी को छोड़ सभी मेरे मित्र हैं। पर 2019 में प्रधानमंत्री पद के लिए ममता बनर्जी अकेली उम्मीदवार नहीं होंगी। नीतीश कुमार ने 'संघ मुक्त भारत' का सपना साकार करने के लिए महागठबंधन की जरूरत बताकर पहले ही अपना कार्ड चल दिया है। जयललिता और नवीन पटनायक भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में मायावती और मुलायम सिंह यादव में से जो भी विजयी होंगे, गैरभाजपा गठबंधन के नेता के तौर पर उनके नाम से इनकार नहीं किया जा सकेगा।

चंद्रबाबू नायडु अभी राजग के साथ हैं, पर कह नहीं सकते कि वह राजग में कब तक रहेंगे, क्योंकि मोदी के साथ रहने से उनका कद बढ़ने की संभावना नहीं है। लिहाजा यह कहा जा सकता है कि चंद्रबाबू नायडु या तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव अगले लोकसभा चुनाव में मोदी को चुनौती देने वाले गठबंधन में होंगे। चूंकि आंध्र प्रदेश से लोकसभा के 25 सांसद हैं और तेलंगाना से 17, ऐसे में, इन दोनों नेताओं में से किसी एक का नाम खारिज नहीं किया जा सकता।

अगले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में भाजपा क्षेत्रीय दलों के संभावित गठबंधन के प्रति भले व्यंग्य भरा भाव दिखा रही हो, पर क्षेत्रीय पार्टियों को लोग इतनी हिकारत से भी नहीं देखते। देश का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय पार्टियों के अधीन ही है, और आने वाले दिनों में इसमें बदलाव की संभावना नहीं दिखती।

वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के पक्ष में प्रबल जनमत बनने का कारण यह था कि लोग यूपीए से हताश हो गए थे। इसलिए अगले लोकसभा चुनाव में मतदाता भाजपा को सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण विजयी नहीं बनाएंगे। अनेक बार लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने क्षेत्रीय पार्टियों को वोट दिया है।

अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की लड़ाई भी शायद राष्ट्रीय स्तर पर न हो। इसके बजाय उसे विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रतिद्वंद्वियों से लड़ना पड़ सकता है। वैसी स्थिति में भाजपा के चुनाव अभियान में वैसी धार शायद ही हो, क्योंकि उसे विभिन्न पार्टियों के खिलाफ अलग-अलग मुद्दों की शिनाख्त करनी पड़ेगी। बिहार जैसे राज्यों को छोड़कर, जहां महागठबंधन का स्वरूप स्पष्ट दिखता है, अलग-अलग राज्यों को राजग के खिलाफ अपने स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। वैसे में, चुनाव के बाद सीटों के आधार पर जो क्षेत्रीय नेता ताकतवर होगा, उसके प्रधानमंत्री बनने की संभावना प्रबल होगी।


लेकिन भाजपा ऐसी किसी संभावना को महत्व नहीं देती। भारत चूंकि राज्यों का संघ है, क्या इसीलिए अरुण जेटली ने क्षेत्रीय दलों की आलोचना की, क्योंकि भाजपा तो केंद्रीकरण और एक व्यक्तिवाद की समर्थक है?

-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक

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