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समस्या शरीर नहीं, मन है: शारीरिक बनावट के प्रति चिंतित होना मानसिक स्वास्थ्य समस्या, करें आत्मनिरीक्षण
Sun, 24 May 2026 08:22 AM IST
Pavan
क्रिस्टीना कैरन
क्रिस्टीना कैरन
Published by: Pavan
Updated Sun, 24 May 2026 08:22 AM IST
सार
अगर आप अपने शरीर की बनावट को लेकर हद से ज्यादा चिंतित रहते हैं, तो समझ लें कि यह समस्या शारीरिक कम, मनोवैज्ञानिक अधिक है। जिन लोगों को यह परेशानी है, उनके लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि वे सतर्कता पूर्वक अपने भीतर झांकें और आत्मनिरीक्षण करें।
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समस्या शरीर नहीं, मन है
- फोटो : Freepik
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विस्तार
मैं डी रोसेनबर्ग ने अपनी खूबसूरती की वजह से हमेशा लोगों का ध्यान खींचा है। हाई स्कूल में तो उनके साथी उन्हें ‘बार्बी’ कहकर बुलाते थे। लेकिन, इसके बावजूद वह खुद को उस नजर से नहीं देखती थीं। वह अपने माथे पर मौजूद मुश्किल से दिखाई पड़ने वाले एक छोटे-से दाग को घूरते हुए घंटों बिता देती थीं। उन्हें लगता था कि वह बहुत बड़ा और बदसूरत निशान था। वह कहतीं कि अगर मैं इसे दूर नहीं कर सकती, तो मैं अब और जीना नहीं चाहती। तब उन्हें पता नहीं था कि उन्हें ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) और बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (बीडीडी) जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या थी, जिसके कारण लोग अपनी शारीरिक बनावट को लेकर हद से ज्यादा चिंता करते हैं। यह चिंता इतनी बढ़ जाती है कि वे खुद को अपने ही शरीर में कैद जैसा महसूस करने लगते हैं।
बीडीडी विशेषज्ञ डॉ. कैथरीन फिलिप्स ने बताया कि इस रोग से पीड़ित लोगों को पक्का यकीन होता है कि उनकी कमियों की वजह से दूसरे लोग उन्हें ठुकरा देंगे। यह विकार आमतौर पर किशोरावस्था के दौरान सामने आता है। टोरंटो विश्वविद्यालय के टेमर्टी फैकल्टी ऑफ मेडिसिन में मनोरोग विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. जेमी फ्यूसनर ने कहा कि जिन लोगों को यह समस्या होती है, उनके मस्तिष्क के वे हिस्से, जो हमें चीजों को समग्र रूप से देखने में मदद करते हैं, कम सक्रिय होते हैं। ज्यादातर बीडीडी पीड़ितों को यह एहसास ही नहीं होता कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। ऐसे लोग रिश्तों से दूर हो सकते हैं, काम या स्कूल जाने से बच सकते हैं, और अपना बहुत ज्यादा समय बार-बार आईना देखने, अपने चेहरे को छिपाने की कोशिश करने या दूसरों से तसल्ली पाने में बिताते हैं।
जिन लोगों को यह परेशानी है, उनके लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि वे सतर्कता पूर्वक अपने भीतर झांकें और आत्मनिरीक्षण करें। अपने विचारों पर नजर रखने भर से बीडीडी के आधे से ज्यादा मरीजों में बीमारी के लक्षण खत्म होते देखे गए हैं। इस प्रक्रिया का मूल मकसद मरीजों को धीरे-धीरे उन चीजों का सामना करने में मदद करना है, जिनसे वे अब तक बचते रहे हैं। डॉ. फिलिप्स ने बताया कि जिन लोगों को गंभीर बीडीडी की समस्या है, उनके लिए दवा और मनोवैज्ञानिक मदद, दोनों की सलाह दी जाती है। मनोवैज्ञानिक थेरेपी ने रोसेनबर्ग की बीडीडी समस्या में धीरे-धीरे सुधार लाने में मदद की। उन्होंने कहा, ‘मेरा शरीर यह तय नहीं कर सकता कि मेरा दिन कैसा बीतेगा।’ - साथ में जस्टिन क्रिस्टेंसन।
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बीडीडी विशेषज्ञ डॉ. कैथरीन फिलिप्स ने बताया कि इस रोग से पीड़ित लोगों को पक्का यकीन होता है कि उनकी कमियों की वजह से दूसरे लोग उन्हें ठुकरा देंगे। यह विकार आमतौर पर किशोरावस्था के दौरान सामने आता है। टोरंटो विश्वविद्यालय के टेमर्टी फैकल्टी ऑफ मेडिसिन में मनोरोग विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. जेमी फ्यूसनर ने कहा कि जिन लोगों को यह समस्या होती है, उनके मस्तिष्क के वे हिस्से, जो हमें चीजों को समग्र रूप से देखने में मदद करते हैं, कम सक्रिय होते हैं। ज्यादातर बीडीडी पीड़ितों को यह एहसास ही नहीं होता कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। ऐसे लोग रिश्तों से दूर हो सकते हैं, काम या स्कूल जाने से बच सकते हैं, और अपना बहुत ज्यादा समय बार-बार आईना देखने, अपने चेहरे को छिपाने की कोशिश करने या दूसरों से तसल्ली पाने में बिताते हैं।
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जिन लोगों को यह परेशानी है, उनके लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि वे सतर्कता पूर्वक अपने भीतर झांकें और आत्मनिरीक्षण करें। अपने विचारों पर नजर रखने भर से बीडीडी के आधे से ज्यादा मरीजों में बीमारी के लक्षण खत्म होते देखे गए हैं। इस प्रक्रिया का मूल मकसद मरीजों को धीरे-धीरे उन चीजों का सामना करने में मदद करना है, जिनसे वे अब तक बचते रहे हैं। डॉ. फिलिप्स ने बताया कि जिन लोगों को गंभीर बीडीडी की समस्या है, उनके लिए दवा और मनोवैज्ञानिक मदद, दोनों की सलाह दी जाती है। मनोवैज्ञानिक थेरेपी ने रोसेनबर्ग की बीडीडी समस्या में धीरे-धीरे सुधार लाने में मदद की। उन्होंने कहा, ‘मेरा शरीर यह तय नहीं कर सकता कि मेरा दिन कैसा बीतेगा।’ - साथ में जस्टिन क्रिस्टेंसन।
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