World Press Freedom Day 2020: विचारधाराओं के संघर्षकाल में पत्रकारिता
प्रेस और मीडिया शब्दों का जिक्र आते ही हमारे जेहन में एक ऐसे प्रोफेशन का बिंब उभरता है, जो नैतिकता के ताने-बाने से पूरी तरह सजा हो। नैतिकता, लोकहित का ध्यान और व्यापक समुदाय की चिंता इस पेशे की नैतिकता के आभूषण हैं। आजादी के पहले तक कम से कम भारतीय प्रेस की नैतिकता का एक अंग राष्ट्रप्रेम भी रहा है। भारतीय पत्रकारिता का विकास स्वतंत्रता आंदोलन की कोख से हुआ है, लिहाजा उसने आजादी के आंदोलन में विकसित राष्ट्रीय नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को भी आत्मसात किया।
आजाद भारत में भारतीय प्रेस ने तमाम क्षरण के बावजूद आत्मसात मूल्यों को एक हद तक बचाए रखा है। हालांकि उसमें भी क्षरण आता जा रहा है। इस बदलाव के आलोक में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हम यह दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जिन मूल्यों को भारतीय प्रेस ने स्वीकार्य किया था, वे बचे रह सकेंगे।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस को संवैधानिक व्यवस्था का ही नैतिक विस्तार माना गया है। चौथे स्तंभ की अवधारणा इस नैतिक विस्तार की बुनियाद पर ही टिकी हुई है। लेकिन जिस तरह पत्रकारिता में नैतिक विचलन आ रहा है, नहीं कहा जा सकता कि पत्रकारिता अपनी पारंपरिक नैतिक बुनियाद पर कितने दिनों तक टिकी रह सकेगी। हर भूभाग और उस पर विकसित समाज के अपने मूल्य होते हैं। इनसे एक सामूहिक चेतना विकसित होती है और वह चेतना व्यापक समाज और भूभाग की नैतिकता पर ही टिकी होती है।
लोकतांत्रिक समाज में उम्मीद की जाती है कि प्रेस अपनी प्रभावी स्थिति के चलते लोकहित के संदर्भ में सामूहिक चेतनाओं में आते बिखराव पर भी सवाल उठाएगा। वह तात्कालिक संकटों से उपजी चिंताओं को तब तक खारिज करता रहेगा, जब तक कि तात्कालिक संकट समाज को दीर्घकालिक स्तर पर चोट पहुंचा सकता है। विश्व प्रेस स्वाधीनता दिवस पर हमें देखना होगा कि क्या भारतीय प्रेस शाश्वत भारतीय सामूहिक चेतना के साथ कम से कम अपने बुनियादी दायित्व के मुताबिक न्याय कर पा रहा है?
भारतीय पत्रकारिता में इन दिनों देखा जाए तो विचारधारा का संकट ज्यादा नजर आ रहा है। विचारधाराएं शाश्वत चिंतन पर हावी हो रही हैं। राष्ट्र, समाज और संस्कृति की निरंतरता और भलाई में जो मूल्य कारगर भूमिका निभा सकते हैं, हैरत की बात यह है कि भारतीय पत्रकारिता उन मूल्यों को भी लगातार किनारे लगा रही है। हैरतअंगेज तरीके से वह अपना नया नैरेटिव खड़ा कर रही है। इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रीय अखंडता और सांस्कृतिक मूल्य तिरोहित होते हैं तो होते रहें। दुर्भाग्यवश भारतीय प्रेस का भी एक हिस्सा इसमें सहयोगी बना नजर आता है। भारतीय प्रेस का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिसे पत्रकारिता और लोकहित से ज्यादा चिंता अपने वैचारिकता को ही विस्तार देना है। विस्तारवाद की इस सोच ने उस भारतीय सामूहिक चेतना पर गहरी चोट पहुंचाने की कोशिश की है, जिसकी विशेषता निरंतरता पर भरोसा रही है। जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ने की हिमायती रही है। जिसे अपने देश पर गुमान रहा है।
पत्रकारिता में निष्पक्षता और तटस्थता की अवधारणा शुरू से ही गड्डमड्ड रही है। अत्याचारी का पक्ष लेना नैतिक रूप से सही तो हो ही नहीं सकता, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि पत्रकारिता पीड़ित का भी पक्ष लेती है तो वह तटस्थ नहीं रह जाती। इसलिए पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ी जानी चाहिए। जिसमें यह कहा जा सकता है कि लोकहित में लोक, शास्त्र और समाज के गढ़े उदात्त मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना पत्रकारिता है। समय के साथ समाज में आई बुराइयों के खिलाफ खड़ा होना भी पत्रकारिता का अंग हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता दोनों ही स्थितियों में अतिवादी होती नजर आ रही है।
इस अतिवाद का ही असर है कि अब प्रेस का नाम लेते ही पाठक, दर्शक, श्रोता बता देता है कि फलां का मतलब राष्ट्रवाद, फलां का मतलब राष्ट्र और भारतीयता विरोध और फलां का मतलब मध्यमार्ग। पत्रकारिता को एक गुमान रहता है कि वह नैरेटिव गढ़ने, लोकतांत्रिक समाज में लोक मानस तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन यह आंशिक रूप से सत्य है। आज तीव्र गति से सूचनाओं की इतनी बाढ़ आ रही है कि पाठक, दर्शक या स्रोता, किसी एक माध्यम, प्रकाशन या प्रसारण तक सीमित नहीं है। बहुविध सूचनाओं की बाढ़ के बीच वह राय बनाता है और जरूरी नहीं कि वह किसी एक विचारधारा या सोच को बढ़ावा देने वाले प्रकाशन या प्रसारण से प्रभावित रहे। वह अपनी अलग राय बनाता है। इसलिए प्रेस को कम से कम खुद पर गुमान करना छोड़ देना चाहिए।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर प्रेस कर्मियों की चर्चा ना करना बेमानी है। वैचारिकता के संघर्ष के बीच सबसे ज्यादा वह पत्रकार पिस रहा है, जो वैचारिकता के आवरण में बंधा नहीं रहना चाहता, वह 'जस की तस धरि दीन्हीं खबरिया' के सिद्धांत पर काम करना चाहता है। वैचारिकता की खोल ओढ़े पत्रकारिता के कालनेमि के बीच सहज पत्रकार ज्यादा जूझ रहा है। राजनीति, प्रशासन और पुलिस तो हर काल से चाहती रही है कि पत्रकार और मीडिया हाउस उसके मनमुताबिक बातें करें। इसमें एक और तबका जुड़ गया है, विचारधारा का। अब वर्चस्ववादी विचारधाराएं भी पत्रकारिता पर दबाव बना रही हैं।
पत्रकारों के रोजगार का सवाल अपने देश में कहीं ज्यादा विकराल रूप से खड़ा हुआ है। पत्रकारिता तो सबको अच्छी चाहिए, प्रकाशन और प्रसारण की कमाई भी होनी चाहिए, लेकिन पत्रकारीय हितों को ठेंगे पर रखा जाए, यह मानसिकता भारत में कहीं ज्यादा गहरी हुई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकतें पत्रकार और पत्रकारिता का अपने लिए बेहतर इस्तेमाल की आकांक्षी तो हैं, लेकिन उनके सामने पत्रकारीय हित के सवालों का कोई महत्व ही नहीं है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पत्रकारों की स्वतंत्रता की बात तो होती है, लेकिन वह रस्मी ज्यादा रह जाती है। बेहतर हो कि जताई गई चिंताओं के आलोक में पत्रकारों की बुनियादी चुनौतियों, मुश्किलों और सवालों से संजीदगी से विचार किया जाए। तभी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सही मायने में जमीन पर उतर सकेगी।
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