World Ocean Day 2023: जैव विविधता से भरे महासागर
प्रवाल भित्तियां पृथ्वी के केवल 0.1% हिस्से में फैली हुई हैं, लेकिन मछली, क्रस्टेशियन, शार्क, ऑक्टोपस आदि कई प्रजातियों को आवास प्रदान करती हैं। प्रवाल भित्तियों में इतनी जैव विविधता है कि इन्हे अक्सर महासागर के उष्णकटिबंधीय वर्षावन कहा जाता है।
विस्तार
जीवन की उत्पत्ति स्वयं महासागरों में हुई थी। इनमें प्रवाल भित्तियों (coral reefs), समुद्री घासों, खाइयों आदि जैसे विभिन्न आवास पाए जाते हैं, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उनमें भारी जैव विविधता है। दिलचस्प बात यह भी है कि हमने अब तक महासागरों में पाई जाने वाली 2.5 लाख से अधिक प्रजातियों की पहचान की है, लेकिन यह इस जैव विविधता का केवल एक तिहाई ही है।
महासागर के प्रत्येक स्तर में अद्वितीय पारिस्थितिक तंत्र हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीव हैं। ये समुद्र की सतह पर पाए जाने वाले सूक्ष्म प्राणिप्लवक (zooplankton) और पादप प्लवक (phytoplankton) से लेकर समुद्र की गहराई में विशाल 13 मीटर के स्क्वीड तक हैं।
पॉलीप्स और शैवाल के बीच अद्वितीय सहजीवी संबंध
हम सभी ने प्रवाल भित्तियों में पाई जाने वाली मछलियों और ईल के सुंदर चित्र देखे हैं। ये चट्टानें ज्यादातर उथले पानी तक ही सीमित रहती हैं जहां सीधी धूप पड़ती है। मूंगे की चट्टानें निर्जीव दिखाई देती हैं लेकिन वास्तव में वे कोरल पॉलीप्स (एक जानवर) और शैवाल के बीच एक अद्वितीय सहजीवी संबंध हैं। इस सहजीवन में, पॉलीप्स शैवाल को सुरक्षा प्रदान करते हैं और शैवाल प्रवाल को पोषण प्रदान करते हैं। हजारों पॉलीप्स और शैवाल एक साथ मिलकर प्रवाल भित्तियों का निर्माण करते हैं।
प्रवाल भित्तियां पृथ्वी के केवल 0.1% हिस्से में फैली हुई हैं, लेकिन मछली, क्रस्टेशियन, शार्क, ऑक्टोपस आदि कई प्रजातियों को आवास प्रदान करती हैं। प्रवाल भित्तियों में इतनी जैव विविधता है कि इन्हे अक्सर महासागर के उष्णकटिबंधीय वर्षावन कहा जाता है। हाल ही में, वैज्ञानिकों ने पाया है कि प्रवाल भित्तियों में पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवों की अधिकतम विविधता भी होती है।
एक और आकर्षक पारिस्थितिकी तंत्र समुद्री घासों द्वारा निर्मित है। समुद्री घास अक्सर समुद्री खरपतवारों के साथ भ्रमित होती है, लेकिन वास्तव में ये जमीन पर पाए जाने वाले फूलदार घासों के निकट संबंधी पौधे हैं। इनकी तुलना अक्सर उत्तरी अमेरिका के विशाल प्रेयरी परिदृश्य से की जाती है। समुद्री घास ठंडे और गर्म पानी दोनों में पाई जाती है। कुछ समुद्री घास पारिस्थितिक तंत्र इतने विशाल हैं कि उन्हें अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने की खोज
हाल ही में, वैज्ञानिकों को ऑस्ट्रेलिया के शार्क बे में पोसिडोनिया ऑस्ट्रालिस नामक एक लचीली समुद्री घास मिली। यह दुनिया का सबसे पुराना पौधा है जो 45 000 साल का है और 180 किलोमीटर लंबा है। हालांकि, समुद्री घासों के संरक्षण के संबंध में कम ध्यान दिया जाता है, जब कि वे व्यावसायिक रूप से मूल्यवान मछलियों, केकड़ों और झींगों की कई अनूठी प्रजातियों का घर हैं।
यहां पाया जाने वाला एक और अनोखा जीव डूगोंग है। डूगोंग एक स्तनपायी है जो भोजन के लिए काफी हद तक समुद्री घास समुदायों पर निर्भर है, इसलिए यह इस पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शाकाहारी होने के कारण इसे समुद्री गाय कहा जाता है। चिंता का विषय यह है कि सदियों से मांस और तेल के लिए इसका व्यापक रूप से शिकार किया जाता रहा है।
यह मछली के जाल में भी कई बार फंस जाती है। इससे इसकी आबादी कम हो गई है। शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि भारतीय जलक्षेत्रों में डुगोंग की आबादी 300 से कम है। इस वजह से, तमिलनाडु ने मन्नार की खाड़ी में प्रथम भारतीय डूगोंग संरक्षण रिजर्व को अधिसूचित किया है।
गहरे महासागरों की जैव विविधता भी अद्भुत है। समुद्र की सतह से 1 किमी नीचे लगभग कोई प्रकाश नहीं है। इसलिए, एंगलरफिश जैसे कुछ जीवों के सिर पर एक छड़ जैसी चमकदार संरचना होती है। रॉड के अंदर पनपने वाले बैक्टीरिया ल्यूमिनेसेंट होते हैं और वे रॉड को चमकदार बनाते हैं। यह रॉड एंगलर फिश के शिकार को भी अपनी ओर आकर्षित करती है।
इतनी जैव विविधता होने के बावजूद केवल 3 से 8 प्रतिशत महासागर ही सुरक्षित हैं। जलवायु परिवर्तन और अन्य मानवजनित कार्यों के कारण कई पारिस्थितिक तंत्र खतरे में हैं। कई शार्क, कछुए, समुद्री पौधे और स्तनधारियों जैसे व्हेल और डूगोंग के विलुप्त होने का खतरा है। इसके अलावा, हाल के दिनों में समुद्री घास और प्रवाल के कई क्षेत्रों का भी क्षरण हुआ है।
इसलिए, अद्वितीय आवासों का पता लगाने और उनकी जैव विविधता को प्रलेखित करने की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को महासागरों में जैव विविधता के संरक्षण के लिए जागरूक किया जा सके।
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