विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मिशेल बर्क- मेकअप के लिए दो ऑस्कर
- आसान नहीं है मेकअप आर्टिस्ट के रूप में दो बार ऑस्कर पुरस्कार पाना। और यह कमाल हुआ है, मिशेल बर्क के संदर्भ में। उन्हें 1983 में फिल्म ‘क्वेस्ट फॉर फायर’ केलिए तथा 1993 में ‘ड्राकुला’ फिल्म हेतु यह पुरस्कार प्राप्त हुआ। हालांकि ये दोनों पुरस्कार उन्हें अकेले को नहीं मिले।
विस्तार
केरल के डांस-ड्रामा ‘कथकलि’ के अभिनेताओं को तैयार होने में घंटों लगते हैं। अक्सर वे अपना मेकअप स्वयं करते हैं। कभी-कभी उनके साथी कलाकार उनकी इसमें सहायता करते हैं। अधिकतर नाटक कलाकार अपना शृंगार स्वयं करते हैं। जो अभिनेता को पात्र बनाता है, उसे एक खास चरित्र में दर्शकों के मन में बैठाने का श्रम करता है, उसका श्रम अनदेखा रहता है, उसके नाम से कोई परिचित नहीं होता है। पहले फिल्म अभिनेताओं के साथ भी यही बात लागू होती थी।
जब मेकअप किसी विशेषज्ञ द्वारा किया जाता था तब भी उनका नाम कहीं नजर नहीं आता था। प्रसिद्ध फिल्म ‘सिटीजन केन’ में युवा और वृद्ध केन दोनों की भूमिका के लिए ऑर्सन वेल्स को घंटों भारी-भरकम मेकअप करवाना पड़ता और काफी समय उसमें रहना पड़ता था। यह कमाल किया था, मेकअप मैन सैंडरमैन एवं उनकी टीम ने। मगर क्रेडिट में उनका नाम नहीं था।
स्टूडियो सिस्टम में कभी नहीं बताया जाता था कि अभिनेता मेकअप करते हैं। जबकि देखने से लगता अभी-अभी पार्लर से निकल कर आए हैं। चाहे दृश्य जंगल का अथवा अस्पताल पर पड़े मरीज का। परन्तु समय के साथ सब बदला, स्टूडियो सिस्टम भी बदला। मेकअप मैन, हेयर ड्रेसर नाम फिल्मी दुनिया में सुनाई देने लगा। फिर भी क्रेडिट में वे गायब रहे। पारामाउंट ने जब ‘डॉ. जेकिल एंड मिस्टर हाइड’ बनाई, जिसका मेकअप फ्रेड्रिक मार्च ने किया ता तो उन्हें क्रेडिट नहीं मिला। कोई खुल कर न कहता कि मेकअप आर्टिस्ट की आवश्यकता है।
कोई स्वीकार न करते कि अभिनेता मेकअप करते हैं। और यहां भी लैंगिक भेदभाव बना रहा। विभाग बना तो उसका नाम रखा गया, ‘डिपार्टमेंट ऑफ मेकअप एंड हेयरड्रेसिंग’। इसे ‘डिपार्टमेंट ऑफ हेयरड्रेसिंग एंड मेकअप’ नहीं कहा गया। क्यों? क्योंकि हेयरड्रेसिंग करने वाली औरतें थीं और मेकअप पुरुष द्वारा किया जाता था।
‘एन अमेरिकन वेरेवुल्फ इन लंदन’ के लिए पुरस्कार
बाद में जब एमजीएम ने स्पेंसर ट्रेसी को लेकर ‘डॉ. जेकिल एंड मिस्टर हाइड’ बनाई तो जैक डान को ‘मेकअप क्रियेटर’ का खिताब मिला। अकादमी ने अस्सी के दशक में मेकअप के लिए अलग से ऑस्कर देना शुरू किया। सबसे पहले रिक बेकर को 1982 में फिल्म ‘एन अमेरिकन वेरेवुल्फ इन लंदन’ के लिए यह पुरस्कार मिला।
वे मेकअप आर्टिस्ट के साथ-साथ अभिनेता भी थे। मगर इसके काफी पहले अकादमी ने विलियम टटल को 1964 में ‘7 फेसेस ऑफ डॉ. लियो’ के लिए ऑनरेरी ऑस्कर दिया था, इसी तरह पुरस्कार स्थापित होने के पहले 1968 में बनी फिल्म ‘प्लनेट ऑफ दि एप्स’ के मेकअप आर्टिस्ट जन चेम्बर्स को 1969 का ऑनरेरी ऑस्कर मिला था। हेयर स्टाइल केलिए तो इसके भी बहुत बाद, 2012 में ऑस्कर की शुरुआत हुई।
आसान नहीं है मेकअप आर्टिस्ट के रूप में दो बार ऑस्कर पुरस्कार पाना। और यह कमाल हुआ है, मिशेल बर्क के संदर्भ में। उन्हें 1983 में फिल्म ‘क्वेस्ट फॉर फायर’ केलिए तथा 1993 में ‘ड्राकुला’ फिल्म हेतु यह पुरस्कार प्राप्त हुआ। हालांकि ये दोनों पुरस्कार उन्हें अकेले को नहीं मिले।
पहला ऑस्कार उन्होंने सराह मोन्जानी के साथ साझा किया और दूसरी बार उनके साझीदार ग्रेग कैनोम एवं मैथ्यु डब्ल्यू मुन्गल थे। वैसे मिशेल बर्क को छ: बार अपने काम के लिए ऑस्कर का नामांकन मिला है।
आयरलैंड में 1959 में जन्मी मिशेल बर्क जल्द ही कैनडा चली गईं। उन्होंने अपना मेकअप कैरियर प्रारंभ किया और फैशन शो आयोजित करने लगीं। लेकिन उनका मन फैशन शो में नहीं रम रहा था, उन्हें तो फिल्मों में जाना था। वहां अपना कमाल दिखाना था। शुरुआत में उन्होंने मेकअप असिस्टेंट के रूप में तीन फिल्मों में काम किया।
मिशेल का कहना है, ‘आप जितनी बार मेकअप में काम करते हैं, उतनी बार आपको नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। सारे समय आपको सतर्क रहना पड़ता है। आप एक समूह के साथ काम करते हैं, समूह जो बहुत सृजनात्मक होता है। वे आपको अपनी राय देते रहते हैं। आपको डिजाइन,बजट, स्किन और बहुत सारी बातों का ध्यान रखना होता है।
55 फिल्मों में मेकअप का दायित्व संभालने वाली मिशेल बर्क कृत्रिम अंगों (Prosthetic) की विशेषज्ञ हैं। प्रत्यारोपण संबंधी उनका ज्ञान ‘ड्राकुला’, ‘मार्शल’, ‘बैड ड्रीम’ जैसी फिल्मों में देखा जा सकता है। शुरू में निर्देशकों और प्रड्यूसर्स को लगता था कि प्रयोगशाला अर्थात प्रत्यारोपण का काम पुरुष ही बेहतार ढ़ंग से कार सकते हैं, इससे उन्हें बहुत कोफ्त होती थी। लेकिन उन्होंने अपनी कुशलता का लोहा मनाव लिया। एक दिन ऐसा आया जब वे ‘क्वीन ऑफ हॉरर’ के नाम से जानी जाने लगीं।
हालांकि यह विशेषण उन्हें कम बजट वाली हरार फिल्मों हेतु काम करने के लिए मिला था। मगार वे लगी रहीं। आसान नहीं था यह सफर। पुरुष बहुल क्षेत्र में अपनी सम्मानित जगह बनाना। उन्होंने हार नहीं मानी और अपने श्रम, विशेषता एवं लगन से अपना मुकाम हासिल किया।
उन्हें पहला बड़ा ब्रेक तब मिला जब उनकी मुलाकात 1981 में फ्रेंच-कैनेडियन प्रोडक्शन से हुई। यह फिल्म ‘क्वेस्ट फॉर फायर’ के संदर्भ में था। इसमें उन्हें ऐसे पात्र तैयार करने थे, जो पृथ्वी पर तब रहते थे जब मनुष्य के इस रूप की शुरुआत नहीं हुई थी। सारा-का-सारा काम कृत्रिम अंगों के मेकअप से होना था। आगे निकला हुआ माथा, चौड़े, फैले हुए नथुने। यह काम और जटिल था, क्योंकि चार अलग-अलग समुदाय के लोगों का मेकअप होना था।
‘ड्राकुला’ फिल्म के लिए ऑस्कर
हर एक समुदाय में चालीस या उससे भी अधिक पात्र तैयार होने थे। काम बड़े पैमाने पर होना था। दो टीम बनीं, पहली टीम का संचालन सराह मोन्जानी ने किया, जिसमें अधिकतर लोग इंग्लिश थे। और दूसरी टीम जिसमें अधिकांश लोग केनडा से थे उसका दायित्व मिशेल के जिम्मे था। नतीजा हुआ दोनों को संयुक्त रूप से ऑस्कर मिला।
मिशेल मेकअप आर्टिस्ट होने के साथ-साथ चित्रकार हैं, वे मैक्स फैक्टर की स्पोकपर्सन भी हैं। इतना ही नहीं उन्होंने आंखों एवं होंठ हेतु कुछ प्रोडक्ट भी विकसित किए हैं। वे फिल्मों के साथ टी वी केलिए भी काम करत हैं। उन्हें उनका दूसरा ऑस्कर ‘ड्राकुला’ फिल्म के लिए मिला। इसमें उन्होंने ब्राम स्टोकर का मेकअप कार अभिनेता को बिल्कुल एक नया रूप प्रदान कर दिया है।
मेकअप के लिए उन्हें ब्रिटिश अकादमी का पुरस्कार भी दो बार मिला है। ‘मिशन इम्पोसीबल 3’, ‘मॉन्सटर हाउस’, ‘द सेल’, ‘माइनरिटी रिपोर्ट’, ‘स्पैंगलिश’ आदि उनके द्वारा मेकअप केलिए प्रसिद्ध कुछ अन्य फिल्में हैं। आजकल लॉस एन्जेलेस में रह रही मिशेल की इंडस्ट्री में काफी मांग है।
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