विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: जीवन के लिए जोखिम बढ़ाता प्लास्टिक
हमारे घरों में टूथपेस्ट से लेकर पानी की टंकी, बाल्टी से लेकर पानी की बोतल, ग्रोसरी के लिए खरीदे गए पैकेट बंद सामान से लेकर बिस्किट, नमकीन, जूस की बोतल तक सभी प्लास्टिक से या तो कवर होते हैं या फिर प्लास्टिक से ही निर्मित हैं। जिनमें कुछ तो रिसाइकल हो जाता है और कुछ रोज के कचरे में शामिल होकर हमें और हमारे पर्यावरण को दूषित कर रहा है।
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विस्तार
आज से करीब 116 साल पहले सन 1907 में बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक लियो बेकलैंड ने प्लास्टिक की खोज की थी, जिसे दुनिया ने एक वरदान की तरह देखा-समझा। किसे मालूम था कि यह आविष्कार आगे चलकर अभिशाप में परिवर्तित हो जाएगा। इससे न केवल मानव समाज बल्कि संपूर्ण जगत का अस्तित्व ही खतरा में पड़ जाएगा। इस ग्रह ही नहीं बल्कि यहां रहने वाले हर जीव के भीतर यह शामिल हो जाएगा।
हालांकि, मौजूदा दौर में भारत सहित कई देशों में सिंगल यूज प्लास्टिक पूरी तरह से प्रतिबंधित है। अपितु फिर भी प्लास्टिक हमें बाजार से दुकान तक आसानी से प्राप्त हो जाने वाली वस्तु बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की मानें तो दुनिया के लगभग 80 देशों में इस पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा चुका है। यूरोप में तो प्लास्टिक बैग के सामान पर अतिरिक्त टैक्स देने का भी प्रावधान है। इतना होने के बाद भी प्लास्टिक को मानव जीवन से दूर करने का कोई पुख्ता हल नहीं दिखाई दे रहा।
अभी हाल ही में प्लास्टिक से होने वाले दुष्परिणामों को लेकर 29 मई से 2 जून 2023 के मध्य अंतरराष्ट्रीय संधि के लिए पेरिस में वार्ता हुई। संयुक्त राष्ट्र सरकारी वार्ता समिति की यह बैठक संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के मुख्यालय पर आयोजित की गई है।
मानव अधिकारों के विशेषज्ञों ने प्लास्टिक के खतरे से होने वाले मानवाधिकारों के हनन पर गहन चर्चा की। उनका मानना है कि बढ़ते प्लास्टिक का खतरा हमारे पर्यावरण को दूषित कर रहा है। जो अलग-अलग तरीके से मानव जीवन को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के दशकों में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और आज दुनिया में हर साल औसतन 40 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा पैदा हो रहा है जो मानव स्वास्थ्य, जल एवं जीवन को प्रभावित कर रहा है। जिन्हें प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है।
कहते हैं कि प्लास्टिक पूरी तरह से जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है, उसके उत्पादन में कई तरह के हानिकारक पदार्थ निकलते हैं। जो मानव स्वास्थ्य एवं जीव-जंतुओं सहित सम्पूर्ण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। जिन प्लास्टिक की वस्तुओं को हम अक्सर कचरे में फेंक देते हैं, उनसे हमारा पूरा ग्रह दूषित हो रहा।
हमारे घरों में टूथपेस्ट से लेकर पानी की टंकी, बाल्टी से पानी की बोतल, ग्रोसरी के लिए खरीदे गए पैकेट बंद सामान से लेकर बिस्किट, नमकीन, जूस की बोतल तक सभी प्लास्टिक से या तो कवर होते हैं या फिर प्लास्टिक से ही निर्मित हैं। जिनमें कुछ तो रिसाइकल हो जाता है और कुछ रोज के कचरे में शामिल होकर हमें और हमारे पर्यावरण को दूषित कर रहा है।
जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा है प्लास्टिक
अक्सर सिंगल यूज प्लास्टिक को या तो लैंडफिल में दफन कर दिया जाता है या फिर ऐसे ही खुले वातावरण में फेंक दिया जाता है। धुएं और धूल के जरिए इनके बारीक कण हवा और पानी में घुलकर हमारे शरीर के भीतर पहुंच जाते हैं जिससे जानलेवा बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। यह खतरा मानव तक सीमित नहीं रहा है अपितु प्रतिवर्ष प्लास्टिक खाने से हजारों जानवरों की मौत हो रही है, जमीन एवं जल में रहने वाले जीवों पर प्लास्टिक का कहर टूट रहा है।
यूनाइटेड नेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में हर साल लगभग 500 बिलियन प्लास्टिक बैग इस्तेमाल किए जाते हैं जिन्हें हम कचरे के ढेर में तब्दील कर देते हैं। उस कचरा युक्त पॉलिथीन खाने से कई पशुओं की मौत हो जाती है। यदि पॉलीथीन खाने से मरने वाली गायों के आंकड़े पर नजर डालें तो साल 2017 में उत्तर प्रदेश में (पशु चिकित्सा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार) केवल लखनऊ में करीब 1000 गायों की मौत हुई थी।
सन 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले कैथल शहर में एक माह में 20 से अधिक गाय पॉलीथीन खाने से बीमार हुईं जो मौत का शिकार हो गईं और सैकड़ों गाय बीमार हो गईं। मरने वाली गायों का जब पोस्टमार्टम कराया गया तो उनके पेट में लगभग 15 किलो तक पॉलिथीन निकली, जो उनकी मौत का कारण बनी। हम अक्सर अपना कचरा गीला- सूखा अलग-अलग किए बगैर ही फेंक देते हैं जिन्हें भूखे जानवर अपना खाना समझ लेते हैं और अक्सर बहुत से जानवर पॉलिथीन सहित उसे निगल जाते हैं जो उनके जीवन को खत्म करने के लिए पर्याप्त होता है। हमारी थोड़ी सी लापरवाही कई बेजुबानों का जीवन खत्म कर देती है।
कई सालों तक नष्ट नहीं होती है प्लास्टिक
पॉलिथीन मिट्टी में यदि खाली छोड़ दी जाए तो वह नष्ट नहीं होती बल्कि मिट्टी में दब जाती है। वह मिट्टी ही नहीं बल्कि जमीन की आत्मा को ही नष्ट कर देती है। मिट्टी की सारी उर्वरा शक्ति को खत्म कर देती है और जल की अवशोषण शक्ति को कम कर देती है। साथ ही मिट्टी में रहने वाले असंख्य कीड़ों को समाप्त करने का काम करती है।
एक अनुमान के मुताबिक शहरों से प्रतिदिन निकलने वाले कचरे में 15 से 20 फीसदी तक पॉलिथीन अथवा प्लास्टिक रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो हमारी दैनिक जीवन में शामिल, पानी की बोतलों को नष्ट होने में लगभग 450 साल का समय लगता है, जबकि प्लास्टिक कप के नष्ट होने में 50 साल का समय लग जाता है। मामूली रूप से प्लास्टिक की परत चढ़े पेपर कप के नष्ट होने में भी लगभग 30 साल का समय लग जाता है।
आज कचरे के ढेर में इनकी बहुलता देखी जा सकती है। एक समय यह था जब बारिश के मौसम में कचरे के ढेर में घास और पेड़ स्वतः ही उग आया करते थे, लेकिन अब यही कचरा बारिश आते ही कई तरह की बीमारियों का घर बन जाता है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के अनुसार दुनियाभर में प्लास्टिक का उपयोग 8.3 अरब टन पहुंच चुका है। यह तकरीबन आठ लाख एफिल टावर बनाने के बराबर है। करीब 90 फीसदी प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुंचता है, जो भयावह है।
प्लास्टिक से वायु प्रदूषण का भी खतरा
कचरा जलाने से दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। जलने के दौरान निकलने वाले जहरीले रसायनों में नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक रसायन (वीओसी) और पॉलीसाइक्लिक कार्बनिक पदार्थ (पीओएम) शामिल हैं। जलती हुई प्लास्टिक और उपचारित लकड़ी भी भारी धातुओं और जहरीले रसायनों जैसे डायोक्सीन को छोड़ती हैं। डायोक्सीन के कारण कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है।
इनोवेशन इन प्लास्टिक, द पोटेंशियल एंड पॉसिबिलिटीज' नाम की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि बढ़ते प्लास्टिक कचरे के ढेरो दुष्प्रभाव दिख रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव क्लाइमेट पर पड़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है। इससे मौसम का चक्र गड़बड़ा गया है। कहीं समय पर वर्षा नहीं हो रही है तो कहीं बेमौसम की बारिश से फसलें खराब हो रही हैं।
भूमि में प्लास्टिक कचरा मिलने से भूमि बंजर हो रही है। नदियां और समुद्र दूषित हो रहे हैं। प्रदूषित अनाज, प्रदूषित मछली खाने से लोग रोगी बन रहे हैं। बताया जाता है कि कैंसर का एक प्रमुख कारक प्लास्टिक का कचरा भी है।
रिपोर्ट का कहना है कि भारत में प्लास्टिक की खपत पिछले पांच वर्षों में काफी तेज गति से बढ़ी है, और इसलिए इसका कचरा भी बढ़ा है। यदि लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जाए तो इसमें कमी आ सकती है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता ही अब सबसे बड़ा हथियार बनेगा।
इससे पहले की यह प्लास्टिक हमारे ग्रह को निगल जाए हमें इससे निपटने के उपाय तलाशने होंगे। हमें आपस में इसके खतरे के विषय में चर्चाएं तेज करनी होंगी ताकि समाज में प्लास्टिक के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता पैदा हो सके। हमें स्वयं इससे निपटने के उपाय तलाशने होंगे जैसे- स्वयं ही प्लास्टिक को खत्म करने की कोशिश न करना, क्यों की न पानी में, न जमीन पर और न ही जमीन के नीचे प्लास्टिक खत्म होता है।
हमें यह समझना होगा कि इसे जलाना भी पर्यावरण के लिए अत्यधिक हानिकारक है। इसलिए प्लास्टिक के बैग्स को संभाल कर रखना चाहिए। इन्हें कई बार इस्तेमाल में लाना चाहिए। सामान खरीदने जाने पर अपने साथ कैरी बैग (कपड़े या कागज के बने) लेकर ही जाना चाहिए।
हमें ऐसे प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचना चाहिए जिसे एक बार इस्तेमाल के बाद ही फेंकना पड़े जैसे प्लास्टिक के पतले ग्लास, तरल पदार्थ पीने की स्ट्रॉ और इसी तरह का अन्य सामान भी। पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का कार्य हम सभी को करना होगा। प्लास्टिक के विकल्प हमें ही तलाशने होंगे। जल, जीव, जीवन की रक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी तभी प्लास्टिक के अभिशाप से पृथ्वी सुरक्षित रह सकती है।
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