फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   World Environment Day 2022 Mahatma Gandhi Was First Environmentalist in the world

विश्व पर्यावरण दिवस 2022: दुनिया के पहले पर्यावरणविद थे गांधी जी, उनके विचार आज भी प्रासंगिक

Sat, 04 Jun 2022 06:57 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sat, 04 Jun 2022 06:57 PM IST
सार

गांधी जी का मानना था कि पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियां नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहरें हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा। वन्य जीवन, वनों में कम हो रहा है किन्तु वह शहरों में बढ़ रहा है।

विज्ञापन
World Environment Day 2022 Mahatma Gandhi Was First Environmentalist in the world
महात्मा गांधी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : पेक्सेल्स

विस्तार

युगपुरुष महात्मा गांधी ने कभी भी अपने भाषणों या लेखों में पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख नहीं किया। शायद इसलिए भी कि उनके समय में पर्यावरण असंतुलन से उपजी चिंताओं को मान्यता नहीं दी जाती थी। फिर भी वह पृथ्वी या प्रकृति के प्रति मानवीय आचरण से जिस तरह मानव समाज को आगाह करते थे, वह उनकी अद्भुत दूरदृष्टि ही थी। उनका कालजयी वाक्यांश आज भी बार-बार दोहराया जाता है कि-

विज्ञापन

हमारी आवश्यकता की पूर्ति के लिए इस पृथ्वी पर पर्याप्त संसाधन हैं मगर हमारे लालच के लिए नहीं हैं।


 इसलिए उन्हें विश्व का पहला पर्यावरणवादी कहा जाए तो उचित ही होगा। गांधी जी ने हिमालय के महत्व को भी उसी समय रेखांकित कर प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ न करने की नसीहत दे दी थी।

विज्ञापन


गांधी की चेतावनी 1972 से आई दुनिया की समझ में

देखा जाए तो विश्व में पर्यावरण को लेकर हलचल तब शुरू हुई जब विश्व बिरादरी का ध्यान बढ़ते वैश्विक तापमान के खतरे की ओर गया। इस दिशा में विश्व के अनेक जागरूक राष्ट्र एकजुट होकर प्रयास करने को सहमत हुए।
विज्ञापन
विज्ञापन


वर्ष 1972 में स्वीडन के शहर स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व का पहला अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 119 देशों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी) का प्रारंभ ‘एक धरती’ के सिद्धांत को लेकर किया और एक ‘पर्यावरण संरक्षण का घोषणा पत्र’ तैयार किया जो ‘स्टाकहोम घोषणा’ के नाम से जाना जाता है।

इसी समय, संपूर्ण विश्व में एक तिथि (5 जून) को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाने की भी स्वीकृति हुई। दरअसल ये सम्मेलन गांधी द्वारा पर्यावरण और इसके प्रभावों के बारे में उठाई गई चिंताओं की तुलना में बहुत बाद में बुलाए गए थे। भारत में भी पर्यावरण की रक्षा के लिए चिपको जैसे प्रमुख आंदोलनों के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट और उसे व्यापक प्रचार देने वाले सुंदर लाल बहुगुणा और बाबा आमटे तथा मेधा पाटकर ने गांधी से ही प्रेरणा ली।

पर्यावरण, शहरीकरण और मशीनीकरण के बारे में गांधी जी की चिंता उनके भाषणों, लेखन और श्रमिकों के लिए उनके संदेशों में स्पष्ट थी। यह ध्यान देने योग्य है कि वह दृष्टि और व्यवहार में दुनिया के शुरुआती पर्यावरणविद् थे। चण्डी प्रसाद भट्ट और सुन्दर लाल बहुगुणा को भी गांधीवाद ने ही तो प्रेरित किया था।  

‘हिन्द स्वराज’ में प्रकट की थी पर्यावरण की चिंता

गांधी जी ने आधुनिक पर्यावरणविदों से बहुत पहले दुनिया को बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की समस्याओं के बारे में आगाह किया था। गांधी जी ने कल्पना की थी कि मशीनीकरण से न केवल औद्योगीकरण, बड़े पैमाने पर शहरीकरण, बेरोजगारी होगी, बल्कि पर्यावरण का विनाश भी होगा। एक सदी पूर्व 1909 में लिखी गई उनकी पुस्तक, ‘‘हिंद स्वराज’’ ने पर्यावरण के विनाश और ग्रह के लिए खतरे के रूप में दुनिया के सामने आने वाले खतरों की चेतावनी दी थी।

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में, गांधी जी पर्यावरण प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य के लिए इसके परिणामों से पूरी तरह अवगत थे। वह विशेष रूप से उद्योग में काम करने की भयावह परिस्थितियों के बारे में चिंतित थे, जिसमें श्रमिकों को दूषित, जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने 5 मई, 1906 को इंडियन ओपिनियन में उन चिंताओं को व्यक्त किया और कहा था कि ‘आजकल, खुली हवा की आवश्यकता के बारे में प्रबुद्ध लोगों में सराहना बढ़ रही है।’’

World Environment Day 2022 Mahatma Gandhi Was First Environmentalist in the world
पेड़ काटने पर गांधी की आपत्ति - फोटो : अमर उजाला

पृथ्वी पर मानव के लिए पर्याप्त संसाधन हैं मगर उसकी हवस के लिए नहीं

गांधीजी का दृष्टिकोण, पर्यावरण के प्रति व्यापक था। उन्होंने देशवासियों से, तकनीकों के अंधानुकरण के विरुद्ध, जागरूक होने का आह्वान किया था। उनका मानना था कि पश्चिम के जीवन स्तर की नकल करने से, पर्यावरण का संकट पनप सकता है। कहते थे कि यदि विश्व के अन्य देश भी आधुनिक तकनीकों के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करेंगे तो पृथ्वी के संसाधन नष्ट हो जायेंगे। इसीलिए उन्होंने कहा था कि पृथ्वी पर मानव की आवश्यकता पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन हैं मगर उसकी हवस के लिए नहीं। मतलब यह कि प्रकृति के साथ जीना सीखों और उसके साथ बेवजह छेड़छाड़ मत करो।

गांधी जी का मानना था कि पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियां नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहरें हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा।


वन्य जीवन, वनों में कम हो रहा है किन्तु वह शहरों में बढ़ रहा है। 1909 की शुरुआत में ही उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘हिंद स्वराज’’ में मानव जाति को अप्रतिबंधित उद्योगवाद और भौतिकवाद के प्रति आगाह किया था। वह नहीं चाहते थे कि भारत इस संबंध में पश्चिम का अनुसरण करे और चेतावनी दी कि यदि भारत अपनी विशाल आबादी के साथ पश्चिम की नकल करने की कोशिश करता है तो पृथ्वी के संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे।

उन्होंने 1909 में भी तर्क दिया कि औद्योगीकरण और मशीनों का लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि वह मशीनों के विरोध में नहीं थे। उन्होंने निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर मशीनरी के उपयोग का विरोध किया। उन्होंने नदियों और अन्य जल निकायों को प्रदूषित करने के लिए लोगों की आलोचना की। उन्होंने धुएं और शोर से हवा को प्रदूषित करने के लिए मिलों और कारखानों की आलोचना की।

हिमालय की पर्यावरणीय महिमा का भी उल्लेख किया

आज हिमालय पर्यावरणीय चिन्ताओं का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। वह इसलिए कि पर्वतराज न केवल गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी सदानीराओं का श्रोत है बल्कि मौसम नियंत्रक भी है और जैव विविधता का भण्डार भी, लेकिन मानवीय छेडछाड़ के कारण हिमालय पर 2013 की जैसी केदारनाथ जल प्रलय और 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा की बाढ़ आ रही है। मानव जीवन असुरक्षित हो गया और मौसम चक्र के बदलने से अनेक समस्याएं खड़ी हो गयी हैं।

World Environment Day 2022 Mahatma Gandhi Was First Environmentalist in the world
महात्मा गांधी ने गंगा में गंदगी पर जताई थी चिंता - फोटो : facebook

गांधी जी ने जून 1921 में उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा प्रवास के दौरान अपनी डायरी में हिमालय के विराट स्वरूप के साथ ही मानव जीवन के लिए उसकी उपयोगिता का इस तरह बहुत ही सटीक वर्णन किया है,

यदि हिमालय न होता तो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र औ सिन्धु भी न होती। हिमालय न हो तो ये नदियां न हों, न वर्षा हो और वर्षा न हो तो भारत रेगिस्तान या सहारा की मरुभूमि बन जाए।


इस बात को जानने वाले और हर बात के लिए सदैव ईश्वर का उपकार मानने वाले हमारे दीर्घदर्शी पूर्वजों ने हिमालय को यात्रा धाम बना दिया था।

हरिद्वार और वाराणसी में गंगा में गंदगी से बहुत दुखी थे

स्वच्छता भी पर्यावरण का ही हिस्सा है और गांधी जी स्वच्छता के प्रति अतिरिक्त रूप से जागरूक थे। खासकर हरिद्वार और वाराणसी में गंदगी से बहुत दुखी थे। गांधी जी जब 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद 5 अप्रैल को कुंभ के अवसर पर मुन्शीराम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो गंगा की गंदगी को देखकर उन्हें बड़ा कष्ट हुआ।
 

उन्होंने अपनी डायरी में लिखा

''ऋषिकेश और लक्ष्मण झूले के प्राकृतिक दृश्य मुझे बहुत पसंद आए, परन्तु हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गंदा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुए उन्हें कुछ संकोच न होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देख कर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची।'


गांधी जी ने काशी विश्वनाथ की गंदगी पर कुछ यूं टिप्पणी की थी

 मैं इसके बाद भी एक दो बार काशी विश्वनाथ गया। किन्तु गन्दगी और हो-हल्ला जैसे के तैसे ही वहां देखे।’’


हरिद्वार के बारे में उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था-

 ''पहली बार जब 1915 में मैं हरिद्वार गया था तो मैं सहज ही बहुतेरी बातें आखों देख सका था लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहीं दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरिद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदी की जाती है।


गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिए ध्यान लगा कर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुए असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं। तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है।

यह तो हुई प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है।'


-----------------------

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed