विश्व पर्यावरण दिवस विशेष : स्टॉकहोम कांफ्रेंस की 50वीं वर्षगांठ, तब किसी ने नहीं की थी पर्यावरण मंत्रालय की परिकल्पना
किसी ने यह परिकल्पना नहीं कि थी बदलते समय के साथ एक दिन पर्यावरण मंत्रालय भी बनाना पड़ेगा और वह मंत्रालय इतना महत्वपूर्ण होगा जितना कि वित्त, रक्षा और विदेश जैसे बड़े मंत्रालय।
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स्वीडन आज स्टॉकहोम कांफ्रेंस की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि आज से 50 साल पहले दुनिया के किसी भी देश में पर्यावरण से जुड़ा मंत्रालय नहीं था। किसी ने यह परिकल्पना नहीं कि थी बदलते समय के साथ एक दिन पर्यावरण मंत्रालय भी बनाना पड़ेगा और वह मंत्रालय इतना महत्वपूर्ण होगा जितना कि वित्त, रक्षा और विदेश जैसे बड़े मंत्रालय। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के मुद्दे केवल विकसित देशों के लिए नहीं बल्कि विकासशील देशों के लिए भी चिंता का कारण बन जाएंगे।
50वीं सालगिरह का आगाज
स्वीडन में बुधवार को स्टॉकहोम कांफ्रेंस के 50वीं सालगिरह का आगाज हो चुका है। साल 1972 में यहीं दुनिया के पहले जलवायु व पर्यावरण से जुड़े संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन किया गया था। बेशक उस वक्त इस सम्मेलन को उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया।
कुछ विकसित देशों के साथ कई विकासशील देशों ने इसका विरोध भी किया था और इसे समृद्ध राष्ट्रों की चोंचलेबाजी की संज्ञा तक दे दी थी। लेकिन पचास साल बाद आज लगभग सभी देश जलवायु संकट की गंभीरता को समझ कर इसके निदान ढूंढने में लगे हैं।
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज हुआ
आपको जानकर हैरानी होगी कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में भी 1972 से पहले पर्यावरण को लेकर कोई विशेष तैयारी नहीं थी। स्वीडन ने पहली दफा साल 1968 में यूएन के समक्ष पर्यावरण खतरे, वैश्विक जलवायु संकट और उससे निपटने जैसे विषयों को लेकर स्टॉकहोम कांफ्रेंस शुरू करने का प्रस्ताव रखा था। इसे मंजूर किया गया और चार साल बाद 1972 में दुनिया में नए तरह के विषय पर पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज हुआ।
इस संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में 122 देशों के प्रतिनिधि (जिसमें भारत भी शामिल) हुए थे। सम्मेलन का विषय रखा गया था ‘केवल एक पृथ्वी (Only one earth)’। हालांकि तब किसी को ऐसे सम्मेलनों की गंभीर जरूरत व महत्व का अंदाजा नहीं था। लेकिन आज पर्यावरण किसी भी देश या समाज के लिए ज्वलंत मुद्दा और वैश्विक चिंता का विषय है।
कांफ्रेंस में शामिल देशों ने भविष्य के जलवायु व पर्यावरण संकट से बचाव, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के तरीकों को लेकर आम सहमति जताई। इसके बाद स्टॉकहोम घोषणा पत्र को सार्वजनिक किया गया। इस घोषणा पत्र में पर्यावरण से जुड़े 26 सैद्धांतिक कार्य योजनाओं को शामिल किया गया था। इसमें सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह थी कि किसी भी देश को अपनी संप्रभुता के लिए दूसरे देशों के पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।
दूसरा, पर्यावरण के नुकसान विषय पर अध्ययन के लिए कार्य योजना का गठन और तमाम देशों के आपसी सहयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय निकाय ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी)’ का गठन किया जाए।
पर्यावरण से जुड़ी नीति
इस पर भी सहमति जताई गई कि किसी भी देश की पर्यावरण से जुड़ी नीति, विकासशील देशों के वर्तमान या भविष्य की क्षमता को बढ़ावा देने वाला होगा। यह किसी भी तरह उन पर प्रतिकूल प्रभाव देने वाला नहीं होना चाहिए। हालांकि इस मामले में विकसित देशों का रवैया आज कैसा है, यह किसी से छुपी हुई नहीं रह गई है।
स्वीडन को दुनिया में पर्यावरण मामलों की अगुवाई करने वाला देश का गौरव हासिल है। लेकिन सबसे पहले नॉर्वे ने अपने यहाँ 1972 में पर्यावरण मंत्रालय के तैयार किया और उसके कुछ ही हफ्तों बाद स्वीडन में पर्यावरण मंत्रालय का निर्माण हुआ।
वहीं भारत में इसके तेरह साल बाद 1985 में पर्यावरण मंत्रालय का निर्माण हुआ।यह जानना दिलचस्प है कि स्टॉकहोम घोषणा पत्र को तैयार करने में क़रीब चार साल लगे। इसे दुनिया भर से सैकड़ों वैज्ञानिक और विशेषज्ञों से सलाह मशविरा कर तैयार किया गया था। जिसे क़रीब आठ सौ पन्नों में संकलित किया गया। इसे संयुक्त राष्ट्र के सबसे महंगे डॉक्युमेंटेशन में से एक माना जाता है।