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जब टीम इंडिया से मिलने के लिए अनिल कुंबले को करना पड़ गया था घंटों का इंतजार!

Thu, 02 Apr 2020 06:15 PM IST
Vimal Kumar विमल कुमार
Updated Thu, 02 Apr 2020 06:15 PM IST
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World Cup 2011: Rare and untold stories and facts of this tournament
विश्व कप 2011 - फोटो : सोशल मीडिया

भारतीय क्रिकेट में 2 अप्रैल की तारीख ने बड़ी सहजता के साथ 25 जून को साए में धकेल दिया है। 1983 के बाद से वर्ल्ड कप जीतने का सूखा जब 2011 में ख़त्म हुआ तो एक नई पीढ़ी ने पहली बार महसूस किया कि वर्ल्ड कप जीतना क्या होता है। बतौर रिपोर्टर मैंने 2007 का वर्ल्ड कप वेस्टइंडीज जाकर कवर किया था, लेकिन वहां पर भारतीय क्रिकेट की बजाए, ज्यादा समय पाकिस्तान कोच बॉब वूल्मर की हत्या या मौत पर खर्च किया। बहरहाल, जब टीम इंडिया फाइनल जीत कर मुंबई के मशहूर होटल ताज में पहुंची तो मध्य-रात्रि में सैकड़ों की संख्या में लोग लॉबी में भारतीय खिलाड़ियों के तालियां बजा रहे थे। ये अपने आप में अविश्वसनीय लम्हा रहा, लेकिन उससे भी हैरान करने वाला पल रहा पूर्व कप्तान अनिल कुंबले का इंतजार।

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जश्न के शोर में खिलाड़ी नहीं सुन पाए कुंबले का कॉल

कुंबले लॉबी में हमारे जैसे पत्रकारों के साथ कतार में खड़े थे। दो साल से भी ज्यादा ज्यादा वक्त नहीं हुआ था, इस कप्तान को रिटायर हुए लेकिन ये दिन ऐसा था कि कुंबले को भी खिलाड़ियों के फ्लोर में जाने की इजाजत नहीं थी। पूर्व कप्तान के लिए ये अजीब सी स्थिति थी, लेकिन ये उनकी विनम्रता का ही परिचायक है कि उन्होंने इस बात को अहम का मुद्दा नहीं बनाया। कुंबले ने इस दौरान 2-3 मर्तबा खिलाड़ियों को फोन किए, लेकिन जश्न के माहौल में फोन उठाता कौन! इसके बाद वो मैसेज भी भेजते दिखे और जवाब का इंतजार करते। मगर वो जश्न की रात थी। न किसी को समय का ख्याल था न हस्तियों का। आलम ये रहा कि मैं अपने दो साथी रिपोर्टर के साथ पूरी रात लॉबी में बिना पलक गिराए खिलाड़ियों की एक झलक पाने, उनसे बात करने, इंटरव्यू लेने का इंतजार करता रहा। आलम ये रहा कि सुबह के 6 बजे पहली बार जिंदगी में हमने डिनर ऑर्डर किया! जी हां, सुबह के 6 बजे ब्रेकफास्ट का टाइम नहीं होता। और चूंकि हमने रात का खाना नहीं खाया था तो सूर्योदय होने से पहले डिनर करना चाहते थे।

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होटलकर्मी ने तेंदुलकर तक पहुंचाया कुंबले का संदेश

World Cup 2011: Rare and untold stories and facts of this tournament
2011 विश्व कप - फोटो : सोशल मीडिया

खैर, इस बीच होटल के एक सीनियर कर्मचारी का कुंबले पर ध्यान गया। बाद में वो अधिकारी सचिन तेंदुलकर से मिलने गया और उन्हें ये बात बताई। तेंदुलकर ने तुरंत कुंबले को फ्लोर पर बुलाया। उसके बाद कुंबले भारतीय खिलाड़ियों को बधाई देने में कामयाब हुए। अब आप खुद सोचिए कि अगर कुंबले जैसी शख्सियत को टीम इंडिया तक पहुंचने में कई घंटे लग गए तो वो रात कैसी रही होगी, उसका जश्न कैसे मन रहा होगा। बहरहाल, अगले दिन सुबह से लेकर शाम तक और आने वाले कई दिनों तक न्यूज चैन्ल्स और अखबारों में सिर्फ और सिर्फ भारतीय क्रिकेट और खिलाड़ी और उनसे बातचीत की खबरें ही छाईं रहीं। 

गौतम गंभीर चाहे कितना भी नाराज हो, लेकिन महेंद्र सिंह धोनी की वो पारी और खासकर वो ऐतिहासिक छक्का वर्ल्ड क्रिकेट का एक सुनहरा पल है। वैसे कितने लोगों को ये बात पता है कि फाइनल से पहले 11 मैचों में धोनी का औसत महज 22.38 का था जबकि उनका करियर औसत 50 से ज्यादा का रहा है। यानि पूरे वर्ल्ड कप के दौरान धोनी अपनी साख के आधे बल्लेबाज भी नहीं थे, लेकिन फाइनल में उन्होंने ऐसी पारी खेली कि उनकी साख हमेशा के लिए भारतीय क्रिकेट में वास्तविकता के दोगुनी हो गई जो समय-समय पर उनके कई साथी खिलाड़ियों को खटकती भी है!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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