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जीवन धारा: हमारी असली पहचान तो भीतर छिपी है
Wed, 02 Sep 2026 07:07 AM IST
निर्मल कांत
सोरेन किर्केगार्ड
सोरेन किर्केगार्ड
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 02 Sep 2026 07:07 AM IST
सार
दुनिया आपको हजार नाम दे सकती है, लेकिन उनमें से कोई भी अंतिम नहीं है, जब तक कि आप ही उसे अंतिम न मान लें। हम वास्तव में कौन हैं, इसका निर्णय तो हमें खुद करना होगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
मनुष्य का जीवन बाहर से देखने पर बहुत सरल-सा लगता है। समाज उसे नाम, भूमिका और पहचान देता है। धीरे-धीरे ये सभी पहचान उसके चारों ओर एक परत की तरह जमती चली जाती हैं और वह खुद भी इन्हें ही अपना सच मानने लगता है। लेकिन, मैं पूछना चाहता हूं कि क्या आप वही हैं, जो दूसरे आपको कहते-समझते हैं, या कुछ और, जिसे केवल आप ही जान सकते हैं?
समाज एक बनी-बनाई पहचान देता है, क्योंकि उसके लिए यह सुविधाजनक है। एक बार यदि आपको एक खांचे में रख दिया जाए, तो फिर आपके साथ वैसा ही व्यवहार करना आसान हो जाता है। लेकिन, मनुष्य कोई स्थिर वस्तु नहीं है, जिसे किसी खांचे में बंद किया जा सके। मनुष्य एक निरंतर बनती हुई संभावना है। आपके भीतर जो ‘मैं’ है, वह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हर क्षण आप खुद ही यह तय कर रहे हैं कि आप क्या बनना चाहते हैं। और इसी बात से सबसे ज्यादा डर भी लगता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन की जिम्मेदारी किसी और पर नहीं डाल सकते। अधिकांश लोग इस जिम्मेदारी से बचने के लिए ही समाज-निर्मित पहचानों का चोला पहनना स्वीकार कर लेते हैं। वे कहते हैं- मैं ऐसा ही हूं, मेरा स्वभाव ऐसा है, हालात ऐसे थे, समाज ने मुझे ऐसा बना दिया.. आदि। ये सारे तर्क-वाक्य एक प्रकार की आत्म-रक्षा हैं। मगर सच्चाई यह है कि आप केवल वही नहीं हैं, जो हैं, आप वह भी हैं, जो बन सकते हैं। आप ईमानदार हो सकते हैं या बेईमान, प्रेम कर सकते हैं या उपेक्षा, इन चुनावों के माध्यम से ही आप अपने जीवन को आकार देते हैं। हम वास्तव में कौन हैं, इसका निर्णय तो हमें खुद करना होगा। और, यह निर्णय कोई एक बार का काम नहीं, बल्कि सतत प्रक्रिया है। अपने छोटे-छोटे निर्णयों के माध्यम से हम रोजाना खुद को लिखते हैं। हम जो सोचते हैं, जो चुनते हैं, जो त्यागते हैं और जिस पर टिके रहते हैं, ये सब मिलकर हमारी आत्मा की दिशा तय करते हैं। दुनिया आपको हजार नाम दे सकती है, लेकिन उनमें से कोई भी अंतिम नहीं है, जब तक कि आप ही उसे अंतिम न मान लें। हमारा वास्तविक अस्तित्व किसी एक नाम, एक भूमिका या किसी एक उपलब्धि से बड़ा है। वह एक खुला प्रश्न है, जिसका उत्तर हम स्वयं अपने जीवन से लिखते हैं।
इसलिए, मैं यह कहूंगा कि अपने बारे में दुनिया की आवाज को अंतिम मत मानो। वह तो केवल एक बाहरी गूंज है। असली प्रश्न तो वह है, जो हमारे भीतर शांत स्वर में उठता है-मैं वास्तव में कौन हूं। और, इस प्रश्न का उत्तर किसी सिद्धांत, पुस्तक या दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलेगा। इसका जवाब तो केवल उस जीवन में है, जिसे हम साहसपूर्वक जीते हैं।
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मनुष्य का सबसे बड़ा हासिल यह नहीं है कि वह दुनिया में क्या बनता है, बल्कि यह है कि वह खुद के प्रति सच्चा रहते हुए क्या बनता है। यही वह यात्रा है, जो जीवन को केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण बनाती है।
सूत्र: खुद को नए सिरे से गढ़ें
आपकी पहचान दुनिया नहीं, आपके निर्णय तय करते हैं। इसलिए, परिस्थितियों को अपनी नियति मत मानिए। हर दिन आपके पास खुद को नए सिरे से गढ़ने का अवसर है। आपके विचार, चुनाव, साहस, प्रेम और कर्म ही आपके वास्तविक व्यक्तित्व को आकार देते हैं। दुनिया की आवाज को सुनिए, लेकिन अपने भीतर की आवाज को अंतिम महत्व दीजिए।
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समाज एक बनी-बनाई पहचान देता है, क्योंकि उसके लिए यह सुविधाजनक है। एक बार यदि आपको एक खांचे में रख दिया जाए, तो फिर आपके साथ वैसा ही व्यवहार करना आसान हो जाता है। लेकिन, मनुष्य कोई स्थिर वस्तु नहीं है, जिसे किसी खांचे में बंद किया जा सके। मनुष्य एक निरंतर बनती हुई संभावना है। आपके भीतर जो ‘मैं’ है, वह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हर क्षण आप खुद ही यह तय कर रहे हैं कि आप क्या बनना चाहते हैं। और इसी बात से सबसे ज्यादा डर भी लगता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन की जिम्मेदारी किसी और पर नहीं डाल सकते। अधिकांश लोग इस जिम्मेदारी से बचने के लिए ही समाज-निर्मित पहचानों का चोला पहनना स्वीकार कर लेते हैं। वे कहते हैं- मैं ऐसा ही हूं, मेरा स्वभाव ऐसा है, हालात ऐसे थे, समाज ने मुझे ऐसा बना दिया.. आदि। ये सारे तर्क-वाक्य एक प्रकार की आत्म-रक्षा हैं। मगर सच्चाई यह है कि आप केवल वही नहीं हैं, जो हैं, आप वह भी हैं, जो बन सकते हैं। आप ईमानदार हो सकते हैं या बेईमान, प्रेम कर सकते हैं या उपेक्षा, इन चुनावों के माध्यम से ही आप अपने जीवन को आकार देते हैं। हम वास्तव में कौन हैं, इसका निर्णय तो हमें खुद करना होगा। और, यह निर्णय कोई एक बार का काम नहीं, बल्कि सतत प्रक्रिया है। अपने छोटे-छोटे निर्णयों के माध्यम से हम रोजाना खुद को लिखते हैं। हम जो सोचते हैं, जो चुनते हैं, जो त्यागते हैं और जिस पर टिके रहते हैं, ये सब मिलकर हमारी आत्मा की दिशा तय करते हैं। दुनिया आपको हजार नाम दे सकती है, लेकिन उनमें से कोई भी अंतिम नहीं है, जब तक कि आप ही उसे अंतिम न मान लें। हमारा वास्तविक अस्तित्व किसी एक नाम, एक भूमिका या किसी एक उपलब्धि से बड़ा है। वह एक खुला प्रश्न है, जिसका उत्तर हम स्वयं अपने जीवन से लिखते हैं।
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इसलिए, मैं यह कहूंगा कि अपने बारे में दुनिया की आवाज को अंतिम मत मानो। वह तो केवल एक बाहरी गूंज है। असली प्रश्न तो वह है, जो हमारे भीतर शांत स्वर में उठता है-मैं वास्तव में कौन हूं। और, इस प्रश्न का उत्तर किसी सिद्धांत, पुस्तक या दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलेगा। इसका जवाब तो केवल उस जीवन में है, जिसे हम साहसपूर्वक जीते हैं।
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मनुष्य का सबसे बड़ा हासिल यह नहीं है कि वह दुनिया में क्या बनता है, बल्कि यह है कि वह खुद के प्रति सच्चा रहते हुए क्या बनता है। यही वह यात्रा है, जो जीवन को केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण बनाती है।
सूत्र: खुद को नए सिरे से गढ़ें
आपकी पहचान दुनिया नहीं, आपके निर्णय तय करते हैं। इसलिए, परिस्थितियों को अपनी नियति मत मानिए। हर दिन आपके पास खुद को नए सिरे से गढ़ने का अवसर है। आपके विचार, चुनाव, साहस, प्रेम और कर्म ही आपके वास्तविक व्यक्तित्व को आकार देते हैं। दुनिया की आवाज को सुनिए, लेकिन अपने भीतर की आवाज को अंतिम महत्व दीजिए।