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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: जापान का सिने-इतिहास

Sat, 12 Nov 2022 04:07 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sat, 12 Nov 2022 04:07 PM IST
सार

पचास के दशक में जापान में तेजी से एनीमेशन फिल्में बननी प्रारंभ हुईं। वहीं साठ के दशक में जापान की तीन फ़िल्मों ने दुनिया में धूम मचा दी, ‘रासोमोन’, ‘सेवेन समुराई’ तथा ‘टोक्यो स्टोरी’ आज भी सर्वोत्तम फ़िल्मों में गिनी जाती है।

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जापानी सिनेमा और इसका इतिहास - फोटो : Instagram

विस्तार

जापानी सिनेमा के बिना सिने-इतिहास की कल्पना नहीं हो सकती है। जापान के सिने-निर्देशक अकीरा कुरोसावा के बगैर सिनेमा की बात ही असंभव है। धीमी गति से चलने वाले जापानी सिनेमा ने एशियाई सिनेमा को खूब प्रभावित किया है। विश्व सिनेमा पर भी इसका प्रभाव रहा है। कई अमेरिकी निर्देशक भी अकीरा कुरोसावा से प्रभावित रहे हैं।

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शुरू से जापान में कई तरह का सिनेमा बनता रहा है। यहां के सिनेमा को एनीमेशन (एनीमे), समुराई और तलवारबाजी या पीरियड (जिदाइगेकी), दानव जैसे गोजिला, इंग्लिश में गोड्ज़िला (कैजु) तथा पोर्नोग्राफ़ी (पिंक) फ़िल्म में बांटा जा सकता है। साथ ही वहां ‘द रिंग’, ‘बैटल रॉयल’ जैसी हॉरर फ़िल्में भी बनती रही हैं। वहां की सॉफ्ट पोर्न फिल्में बेहूदी एवं अश्लील न होकर कलात्मक तथा सामाजिक होती हैं। इन श्रेणियों के अलावा जापान में लुटेरों पर भी फ़िल्में बनी हैं जिन्हें ‘याकुज़ा’ कहा जाता है।
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जापान का सिने-इतिहास देखें तो वहां हमें सबसे पहले 1899 में बनी मूक डॉक्यूमेंट्री ‘गेइशा नो तेओडोरी’ प्राप्त होती है। जापान का पहला सिने-अभिनेता मैत्सुनोसुकी ओने काबुकी के मंच से आया था और उसने 1909-1926 के बीच करीब 1000 शॉर्ट फ़िल्मों में काम किया। उसने अधिकतर निर्देशक शोज़ो मैकीनो के साथ काम किया और पीरियड फिल्में बनाई।
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इस काल की बनी फ़िल्म ‘द लाइफ़ ऑफ़ ओहारु’ की चर्चा आज भी होती है। इन मूक फ़िल्मों के प्रदर्शन के समय थियेटर में एक कथावाचक होता था, जो नाटकीय तरीके से कहानी पढ़ता जाता और संग में संगीत चलता रहता था। 1923 के भूकंप, द्वितीय विश्वयुद्ध में बम वर्षा तथा  जापान के नम मौसम के कारण इस काल की फ़िल्में अब उपलब्ध नहीं हैं।

 


1931 में बनी पहली सवाक फिल्म

अभी भी मूक फ़िल्में बन रही थीं लेकिन हेइनोसुके गोशो की 1931 में बनी फ़िल्म ‘द नेबर’स वाइफ़ एंड माइन’ जापान की पहली सवाक फिल्म थी। ‘सिस्टर्स ऑफ़ द जिओन’, ‘ओसाका एलगी’, ‘द स्टोरी ऑफ़ द लेट क्रिसन्तमम’, ‘ह्युमेनिटी एंड पेपर बैलून’ इस काल की प्रमुख फ़िल्में हैं। ‘ह्युमेनिटी एंड पेपर बैलून’ के निर्देशक सडाओ यामानाका इस काल के प्रमुख निर्देशक माने जाते हैं। उन्होंने ‘द पॉट वर्थ ए मिलियन रिओ’ भी बनाई लेकिन वे विरोधी विचारों के कारण चीन की सीमा पर भेज दिए गए और वहीं उनकी 1938 में मृत्यु हुई।

1935 की ‘वाइफ़! बी लाइक ए रोज’ (निर्देशक: मिकिओ नैरुसे) पहली फ़िल्म थी जो अमेरिका में रिलीज हुई। केन्जी मिज़ोगुची की ड्रामा-रोमांस फ़िल्म ‘द स्टोरी ऑफ़ द लेट क्रिसन्तमम’ (1939) एक काबुकी अभिनेता के विषय में है। उन दिनों स्त्री की भूमिका भी पुरुष किया करते थे। शोफ़ु मुरामात्सु की रचना पर आधारित 148 मिनट की यह फ़िल्म स्त्री के बलिदान को दिखाती है।

पचास के दशक में जापान में तेजी से एनीमेशन फिल्में बननी प्रारंभ हुईं। इसी समय 1943 में विश्व प्रसिद्ध निर्देशक अकीरा कुरोसावा की प्रथम फीचर फ़िल्म ‘जूडो सागा’ (सुगाता सैन्शीरो) प्रदर्शित हुई, फ़िर वे रुके नहीं और ‘द मोस्ट ब्यूटीफ़ुल’, ‘जूडो सागा भाग 2’, ‘द मैन हू ट्रेड ऑन द टाइगर’स टेल’, ‘दोज हू मेक टुमारो’, ‘नो रिग्रेट्स फ़ॉर अवर यूथ’, ‘वन वंडरफ़ुल संडे’, ‘ड्रन्कन एंजेल’, ‘द क्वायट डुएल एंड स्ट्रे डॉग’ जैसी एक पर-एक फ़िल्म बनाते चले गए। यहां ड्रामा, कॉमेडी और पीरियड सब कुछ था। 

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साठ के दशक में जापान की फ़िल्मों ने दुनिया में धूम मचा दी - फोटो : Istock

साठ का दशक रहा काफी धमाकेदार

साठ के दशक में जापान की तीन फ़िल्मों ने दुनिया में धूम मचा दी, ‘रासोमोन’, ‘सेवेन समुराई’ तथा ‘टोक्यो स्टोरी’ आज भी सर्वोत्तम फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। 1950 में अकीरा कुरोसावा की 88 मिनट की ‘रासोमोन’ ने अकादमी पुरस्कार जीता। इस क्राइम, मिस्ट्री ड्रामा फ़िल्म में डाकू (तोशिरो मिफ़ुन), पत्नी (मैचिको किओ), समुराई के भूत (मैसायुकी मोरी) तथा एक लकड़हारे (ताकासी शिमुरा) के द्वारा पत्नी के बलात्कार एवं उसके समुराई पति की हत्या को याद किया गया है।

कोई भी पूरा सच नहीं बता रहा है। सब अलग-अलग बात कह रहे हैं। इस फ़िल्म को कई अन्य पुरस्कार प्राप्त हुए। कुरोसावा की ‘सेवेन समुराई’ (1954) से प्रभावित हो हॉलीवुड में ‘द मैग्नीफ़िसेंट सेवेन’ बनी।
 

इसी दशक में यासुजीरो ओज़ु की ‘टोक्यो स्टोरी’ आई। यह फ़िल्म 1953 में बनी पर आज भी यही कहानी है। 136 मिनट की इस फ़िल्म में एक वृद्ध दम्पति अपने वयस्क बच्चों से मिलने शहर जाते हैं, मगर उपेक्षा का शिकार होते हैं। बेटा-बेटी के पास पैसे हैं, समय नहीं है, केवल एक बहु उनका थोड़ा ध्यान रखती है। फ़िल्म को ब्रिटिश फ़िल्म संस्थान का पुरस्कार मिला था।


इसी काल में युद्ध विरोधी दो फ़िल्में (‘द बर्मीज हार्प’ तथा ‘फ़ायर्स ऑन द प्लेन’) भी बनी। युकिओ मिशिमा के उपन्यास ‘टेंपल ऑफ़ द गोल्डेन पैवेलिअन’ पर ‘एन्जो’ (1958) नाम से फ़िल्म बनी। ‘द ह्युमन कंडीशन’ त्रयी भी इसी काल की देन है। ‘द बर्मीज हार्प’ में जब एक जापानी सैनिक अपने लोगों के समर्पण में असफल रहता है, तो वह बौद्ध भिक्षु का जीवन अपना लेता है।

सत्तर का दशक

सत्तर के दशक में टीवी के आगमन से जापानी सिनेमा की हानि हुई लेकिन टेक्निकलर में कई फ़िल्में बनी। तीन घंटे की डॉक्यूमेंट्री ‘टोक्यो ओलिम्पियाड’ उनमें से एक है। नगीसा ओशिमा, सुसुमु हानी, कैनेटो शिन्डो, शोहेइ इमामुरा इस काल के प्रसिद्ध निर्देशक हैं। ‘वुमन इन द डून्स’ को कान समारोह में स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार मिला, इसे ऑस्कर में नामांकन भी प्राप्त हुआ।

अस्सी और नब्बे के दशक में जापान में कई पोर्नोग्राफ़िक फ़िल्में बनीं। इसी काल में हैयाओ मियाज़ाकी ने प्रसिद्ध एनीमेशन फ़िल्म ‘नौसिका ऑफ़ द वैली ऑफ़ विंड’ बनाई। करीब दो घंटे की इस फ़ीचर लेंथ सफल एनीमेशन को कई पुरस्कार प्राप्त हुए। शोहेइ इमामुरा ने 1983 में ‘द बालाड ऑफ़ नारायामा’ (1958) का रिमेक बनाया और कान में गोल्डेन पॉम अपनी झोली में कर लिया। उन्होंने पिछली सदी के अंतिम दशक में एक बार फ़िर इस पुरस्कार को (इरानी निर्देशक किआरोस्तामी को भी मिला) फ़िल्म ‘दि ईल’ के लिए प्राप्त किया। ताकेशी किटानो को ‘हाना-बी केलिए गोल्डेन लायन मिला।

नई सदी की शुरुआत में किन्जी फ़ुकासाकु की फ़िल्म ‘बैटल रॉयल’ एक कल्ट फ़िल्म बन गई। यह फिल्म भविष्य को भयंकर मनहूस ढंग से प्रस्तुत करती है। बेरोजगारी, झुंड-के-झुंड छात्रों का स्कूल को नकारना, अपहरण, आत्मविश्वास की कमी, अत्याचार-अपराध आदि इसके कथानक का हिस्सा हैं। 2001 में हायाओ मियाज़ाकी की ‘स्पिरिटेड अवे’ को सर्वोत्तम एनीमेशन फ़ीचर का अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

‘डॉल’, ‘ज़टोइची’, ‘प्रिंसेस राकून’, ‘डिस्टेंस’, ‘नोबॉडी नोज’, ‘गोड्ज़िला: फ़ाइनल वार्स’ 21वीं सदी में जापान से आने वाली कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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