महिला आरक्षण बिल और राजनीति: हिंदुस्तान की सियासत में महिलाओं के 'अच्छे दिन'
महिला आरक्षण कानून के लागू होने से भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। इससे महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें सत्ता के उच्च स्तर तक पहुंचने का अधिक अवसर मिलेगा।
महिला आरक्षण कानून के लागू होने से भारत की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। इससे महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें सत्ता के उच्च स्तर तक पहुंचने का अधिक अवसर मिलेगा।
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स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में अभी तक एक महिला प्रधानमंत्री और करीब 15 महिला मुख्यमंत्री रही हैं। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में उच्च राजनीति पद पर महिलाओं की भागीदारी का ये आंकड़ा अपने आप एक दुर्भाग्यपूर्ण कहानी है। लेकिन, क्या अब समय बदलने वाला है?
दरअसल, सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है, ताकि महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित किया जा सके और महिलाओं के आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) को जल्द से जल्द लागू किया जा सके। इस कानून के अमल में आते ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अनिवार्य रूप से बढ़नी तय है और जब भागीदारी बढ़ेगी तो उच्च पदों पर अधिक संख्या में उनका पहुंचना तय हो जाएगा।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार स्वीकार किया, तब इसे कई पश्चिमी देशों की तुलना में एक क्रांतिकारी कदम माना गया। खासकर शिक्षा और गरीबी के स्तर को देखते हुए। इस अग्रिम शुरुआत के बावजूद महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी व्यवहार में बहुत असमान रही है। हाल ये कि 1952 में जब पहली बार देश में लोकसभा चुनाव हुए, तब कई महिलाओं ने वोट भी नहीं डाला था।
दरअसल, निर्वाचन आयोग के अधिकारी जब मतदाता सूची बना रहे थे, तब लाखों महिलाओं ने अपना नाम बताने से इंकार कर दिया क्योंकि तब उनकी पहचान फलां की पत्नी या फलां की बेटी के रुप में ही जानी जाती थी। मतलब उनकी पहचान किसी पुरुष पारिवारिक सदस्य से जुड़ी होती थी। ऐसे में महिलाओं की राजनीति में सक्रिय भागीदारी दूर की कौड़ी थी।
जैसे-जैसे लोकतंत्र समाज के भीतर गहराई तक पहुंचा, महिलाएं राजनीतिक विमर्श में दिखाई देने लगीं लेकिन सच यही है कि वे अब भी हाशिए पर ही हैं। एक संरचनात्मक बदलाव 1990 के दशक की शुरुआत में पंचायती राज और स्थानीय निकाय कानूनों के लागू होने से आया। इन कानूनों ने स्थानीय निकायों में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं। इससे लाखों महिलाओं को पहली बार राजनीतिक सत्ता का अनुभव मिला, भले ही ‘प्रधान पति’ या ‘पार्षद पति’ के रूप में प्रॉक्सी राजनीति की मौजूदगी मजबूत बनी रही।
1990 के दशक में ही एक बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन और संभव था, लेकिन राजनीतिक दलों के स्वार्थ ने उसे संपन्न नहीं होने दिया। 1996 में देवगौड़ा सरकार ने पहली बार महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश किया था। इसमें संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण का प्रस्ताव था। लेकिन भारी विरोध के कारण यह पास नहीं हो सका और लोकसभा भंग होने के साथ ही बिल खत्म हो गया। फिर 1998, 1999, 2002, 2003 में भी अलग-अलग सरकारों ने इसे पेश करने की कोशिश की।
हर बार जबरदस्त हंगामा हुआ और बिल ठंडे बस्ते में चला गया। एक बार तो संसद में लालू यादव एंड टीम के सांसदों द्वारा बिल की कॉपी छीनकर फाड़ने और स्पीकर की टेबल तक पहुंचने जैसी घटनाएं हुईं। ये भारतीय संसद के सबसे उग्र दृश्यों में से एक माना जाता है। 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान यह बिल राज्यसभा में पास हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया, इसलिए कानून नहीं बन सका।
इसका सीधा अर्थ है कि कोशिश तो हुईं, लेकिन परवान नहीं चढ़ पाईं क्योंकि इस कानून को पास कराने के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी, वो उस तरह कोई सरकार नहीं दिखा पाई, जैसी नरेंद्र मोदी सरकार ने दिखाई। सितंबर 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे नए रूप में पेश किया और लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पास होकर यह कानून बन गया यानी नारी वंदन अधिनियम, 2023 । अब इसे लागू करने की तैयारी है।
इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी तेजी से बढ़ी है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जहां लगभग 55–56% महिलाओं ने वोट डाला था, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 65–67 फीसदी महिलाओं ने वोट डाला। बीते लोकसभा चुनाव में बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्य ऐसे भी थे, जहां महिला वोट का प्रतिशत पुरुषों से कुछ अधिक रहा।
उच्च स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की बात करें तो पहली लोकसभा में कुल 5 फीसदी महिला सांसद थीं, जो इंदिरा गांधी के आखिरी कार्यकाल यानी 1980 के वक्त सातवीं लोकसभा में भी 5 फीसदी ही रहीं। 2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, उस 16वीं लोकसभा में 62 महिलाएं लोकसभा पहुंची थीं यानी करीब 11.4 फीसदी। 2024 में ये प्रतिशत 13.6 फीसदी है। अब नारी वंदन अधिनियम, 2023 लागू होने के बाद कम से कम 33 फीसदी महिला सांसद दिखेंगी और आधी आबादी के राजनीतिक हस्तक्षेप को मान्यता मिलेगी।
दरअसल, बीते 12 साल में महिलाएं एक लक्षित चुनावी वर्ग बन गईं हैं और सभी राजनीतिक दलों ने उनके लिए विशेष कार्यक्रम और प्रोत्साहन योजनाएं बनानी शुरू की हैं। एलपीजी कनेक्शन, नकद हस्तांतरण, महिला सुरक्षा, घरेलू उपयोग की वस्तुएं जैसे मिक्सी आदि चुनावी वादों का हिस्सा बनने लगे हैं। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने पुरुष मध्यस्थों पर निर्भरता को कम किया है। केंद्र और राज्य सरकारों ने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिलाओं के एक अलग राजनीतिक वर्ग का निर्माण और पोषण किया है। अगर बिहार ने महिलाओं के वोट को आकर्षित करने के लिए शराबबंदी का रास्ता अपनाया, तो मध्य प्रदेश में ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजनाएं सामने आईं हैं।
हालांकि महिलाओं ने राजनीतिक क्षेत्र में काफी हद तक अपनी भूमिका और अधिकार स्थापित किए हैं, फिर भी प्रतिनिधित्व में एक स्थायी अंतर बना हुआ है। संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी लगभग 14% है और उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया पुरुष-प्रधान बनी हुई है।
इसके अलावा, महिलाओं के अपने उचित स्थान तक पहुंचने में कई चुनौतियां बनी हुई हैं। संरचनात्मक बाधाएं हैं, जैसे कि पार्टी टिकट वितरण पुरुषों के पक्ष में झुका हुआ है और चुनावी वित्त अब भी पुरुषों के नियंत्रण में है। सामाजिक बाधाएं भी स्पष्ट हैं, जैसे कि एक महिला राजनेता को घरेलू जिम्मेदारियों और राजनीतिक जीवन के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। एक और महत्वपूर्ण मुद्दा महिलाओं की व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा है। लेकिन, अब वक्त बदलने वाला है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 निश्चित रूप से महिला नेताओं का एक सशक्त समूह तैयार करेगा और हमारी राजनीतिक संस्कृति को पुनर्परिभाषित करेगा। चुनाव प्रचार के तरीकों में स्पष्ट बदलाव आएंगे और महिलाएं पार्टी टिकट वितरण तथा चुनावी वित्त पर भी प्रभाव डाल सकेंगी। यह कहना उचित होगा कि नीतिगत प्राथमिकताओं में भी बदलाव आएगा, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, स्थिरता, कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।
(लेखिका दिल्ली महिला मोर्चा की महासचिव हैं।)
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