फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Women empowerment will be possible through economic social and ideological uplift

केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और वैचारिक उत्थान से ही संभव होगा महिला सशक्तीकरण

Sun, 08 Mar 2020 12:12 PM IST
Ramesh saraf रमेश सर्राफ
Updated Sun, 08 Mar 2020 12:12 PM IST
विज्ञापन
Women empowerment will be possible through economic social and ideological uplift
महिला दिवस उन महिलाओं को याद करने का दिन है, जिन्होंने महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए अथक प्रयास किए - फोटो : social media

हर वर्ष 8 मार्च को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। हमारे देश की महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर अपनी ताकत का अहसास करवा रही है। भारत में रहने वाली महिलाओं के लिए इस वर्ष का महिला दिवस कई नई सौगातें लेकर आया है। महिलाओं के लिए अच्छी खबर यह है कि इस बार संसद में महिला सांसदो की संख्या बढ़कर 78 हो गई है, जो अब तक की सबसे ज्यादा हैं। कुछ दिनो पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने भी महिलाओं को सेना में स्थाई कमीशन देने का आदेश दिया है। अब सेना में भी महिलाएं पुरूषों के समान पदों पर काम कर पाएंगी। इससे महिलाओं का मनोबल बढ़ेगा।

विज्ञापन


संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी महिलाओं के अधिकार को बढ़ावा और सुरक्षा देने के लिए दुनियाभर में कुछ मापदंड निर्धारित किए हैं। महिला दिवस उन महिलाओं को याद करने का दिन है, जिन्होंने महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। वर्तमान दौर में महिलाओं ने अपनी ताकत को पहचान लिया है और काफी हद तक अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी सीख लिया है। अब महिलाओं ने इस बात को अच्छी तरह जान लिया है कि वे एक-दूसरे की सहयोगी हैं।
विज्ञापन


महिलाओं का काम अब केवल घर चलाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि वे हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। पारिवार हो या व्यवसाय महिलाओं ने साबित कर दिखाया है कि वे हर वह काम करके दिखा सकती हैं, जिसमें अभी तब सिर्फ पुरुषों का ही वर्चस्व माना जाता था। शिक्षित होने के साथ ही महिलाओं की समझ में वृद्धि हुई है। अब उनमें खुद को आत्मनिर्भर बनाने की सोच पनपने लगी है। शिक्षा मिलने से महिलाओं ने अपने पर विश्वास करना सीखा है और घर के बाहर की दुनिया को जीतने का सपना सच करने की दिशा में कदम बढ़ाने लगी है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकार ने महिलाओं के लिए नियम-कायदे और कानून तो बहुत सारे बना रखें हैं, किन्तु उन पर हिंसा और अत्याचार के आंकड़ों में अभी तक कोई कमी नहीं आई है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की उम्र वाली 70 फीसदी महिलाएं किसी न किसी रूप में कभी न कभी हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें कामकाजी व घरेलू महिलाएं भी शामिल हैं। देशभर में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के लगभग 1.5 लाख मामले सालाना दर्ज किए जाते हैं। जबकि इसके कई गुणा अधिक मामले दबकर रह जाते हैं।

घरेलू हिंसा अधिनियम देश का पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को उनके घर में सम्मानपूर्वक रहने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इस कानून में महिलाओं को सिर्फ शारीरिक हिंसा से ही नहीं बल्कि मानसिक, आर्थिक और यौन हिंसा से बचाव करने का अधिकार भी शामिल है। भारत में लिंगानुपात की स्थिति भी अच्छी नहीं मानी जा सकती है। लिंगानुपात के वैश्विक औसत 990 के मुकाबले भारत में 941 ही है। हमें भारत में लिंगानुपात सुधारने की दिशा में विशेष काम करना होगा। ताकि लिंगानुपात की खराब स्थिति को बेहतर बनाई जा सके।

Women empowerment will be possible through economic social and ideological uplift
एनसीआरबी डाटा - फोटो : NCRB Website

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दोगुने से भी अधिक हुए हैं। पिछले दशक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ अपराध के 26 मामले दर्ज होते है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के प्रति की जाने वाली क्रूरता में वृद्धि हुई है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्ष बाद भी भारत में 70 प्रतिशत महिलाएं अकुशल कार्यों में लगी हैं जिस कारण उनको काम के बदले मजदूरी भी कम मिलती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं औसतन हर दिन छह घंटे ज्यादा काम करती हैं। चूल्हा-चौका, खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों का पालन पोषण करना तो महिलाओं के कुछ ऐसे कार्य हैं जिनकी कहीं गणना ही नहीं होती है। दुनिया में काम के घंटों में 60 फीसदी से भी अधिक का योगदान महिलाएं करती हैं जबकि उनका संपत्ति पर मात्र पांच फीसदी ही मालिकाना हक हैं।

कहने को तो सम्पूर्ण विश्व की महिलाएं एकजुट होकर महिला दिवस को मनाती हैं। मगर हकीकत में यह सब बातें सरकारी दावों और कागजों तक ही सिमट कर रह जाती है। देश की अधिकांश महिलाओं को तो आज भी इस बात का पता नहीं है कि महिला दिवस का मतलब क्या होता है, महिला दिवस कब आता है, कब चला जाता है। भारत में अधिकतर महिलाएं अपने घर-परिवार में इतनी उलझी होती है कि उन्हे बाहरी दुनिया से मतलब ही नहीं होता है। लेकिन इस स्थिति को बदलने का बीड़ा महिलाओं को स्वयं उठाना होगा। जब तक महिलाएं स्वयं अपने सामाजिक स्तर और आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं करेगी तब तक समाज में उनका स्थान गौण ही रहेगा।

बड़े दुख की बात है कि नारी सशक्तीकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर शहरों में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों का मुकाबला करने में सक्षम है। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाओं को तो अपने अधिकारो का भी पूरा ज्ञान नहीं हैं। वे चुपचाप अत्याचारों सहती रहती है और सामाजिक बंधनों में इस कदर जकड़ी है कि वहां से निकल नहीं सकती हैं।

Women empowerment will be possible through economic social and ideological uplift
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का जरूर कुछ असर दिखने लगा है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का जरूर कुछ असर दिखने लगा है। इस अभियान से अब देश में महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ने लगा है, जो इस बात का अहसास करवाता है कि आने वाले समय में महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया सकारात्मक होने वाला होगा। विकसित देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी नहीं है। आज भी महाराष्ट्र के बीड़, गुजरात के सूरत, भुज में घटने वाली महिला उत्पीड़न की घटनाएं सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग लगा जाती है।

देश में आज भी सबसे ज्यादा उत्पीड़न महिलाओं का ही होता है। आए दिन महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या, प्रताड़ना की घटनाओं से समाचार पत्रों के पन्ने भरे रहते हैं। महिलाओं के साथ आज के युग में भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। बाल विवाह की घटनाओं पर पूर्णतया रोक ना लग पाना एक तरह से महिलाओं का उत्पीड़न ही है। कम उम्र में शादी कर देने से और कम उम्र में मां बनने से लड़की का पूर्णरूपेण शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है। आज हम 'बेटा-बेटी एक समान' की बातें तो करते हैं, मगर बेटी होते ही उसके पिता को बेटी की शादी की चिंता सताने लग जाती है। समाज में जब तक दहेज लेने और देने की प्रवृति नहीं बदलेगी तब तक कोई भी मां-बाप बेटी पैदा होने पर सच्चे मन से खुशी नहीं मना सकेंगे। 

महिला दिवस पर देश भर में अनेकों स्थान पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मगर अगले ही दिन उन सभी बातों को भुला दिया जाता है। समाज में अभी पुरूषवादी मानसिकता मिट नहीं पाई है। समाज में अपने अधिकारों और सम्मान पाने के लिए अब महिलाओं को स्वयं आगे बढऩा होगा। देश में जब तक महिलाओं का सामाजिक, वैचारिक एवं पारिवारिक तौर पर उत्थान नहीं होगा, तब तक महिला सशक्तीकरण की बातें करना बेमानी होगी। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed