कोरोना से जंग: क्या भारत में होने वाले चुनाव स्थगित होंगे?
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विश्व व्यापी महामारी कोविड-19 वायरस यानी कोरोना के संकट के चलते न केवल समूची दुनिया के मुल्क न केवल लोगों की जान बचाने के जूझ रहे हैं बल्कि अमेरिका और चीन जैसे पहले से परस्पर विवादों में उलझे हुए हैं। ये अर्थ शक्तियां कोराना को लेकर भी झगड़े को आतुर हैं। फिलहाल कोराना की वैक्सीन की खोज में भी विश्व का चिकित्सकीय और वैज्ञानिक समुदाय लगा हुआ है, लेकिन इस संकट का भविष्य में और क्या असर पड़ने वाला है, कोई भी यकीन के साथ नहीं कह सकता। अमेरिका में तो इसी साल नवंबर में होने वाले प्रेसिडेंशियल इलेक्शन यानी राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव पर संकट के बाद छा गए हैं। वहां करीब डेढ दर्जन राज्यों में प्राथमिक चुनाव स्थगित कर दी गई हैं।
बाकी राज्य क्या करेंगे और मतदाता, मतदान केंद्र और मतदान को लेकर कोरोना के परिप्रेक्ष्य में क्या होगा? इन प्रश्नों पर अमेरिकी नेता से जनता तक सब पसोपेश में हैं। अगर यह महामारी आगे भी जारी रही तो अमेरिका का सामना संवैधानिक संकट से भी होने वाला है। इधर भारत में भी राज्यसभा चुनाव टाल दिए जाने के बाद विधान परिषदों के उप चुनाव भी टल गए हैँ। सवाल यह है कि कई राज्यों में उपचुनाव होने हैं, क्या वे भी टलेंगे? और यह भी कि क्या बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के आगामी समय में आने वाले चुनाव भी टल तो नहीं जाएंगे?
अमेरिकी चुनाव प्रभावित
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 24 फरवरी को कोरोनाकाल में भी भारत यात्रा पर आए थे और जिस केम छो ट्रंप को नमस्ते ट्रंप में बदल दिए कार्यक्रम में वे भारत की तारीफें कर रहे थे, उसके पीछे उनका एजेंडा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अपनी दूसरी पारी के लिए भारतीय अमेरिकियों के सपोर्ट को बरकरार रखना ही था। तब अमेरिका को कोराना संकट के विकराल होने का अंदेशा नहीं था और न ही भारत की सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा को ही अंदाजा था कि यह आयोजन बाद में कोरोना गंभीर होने पर विपक्ष के निशाने पर आ जाएगा।
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के सिस्टम में पहले प्राथमिक चुनाव राज्य स्तर पर होते हैँ। यह जून तक होने थे लेकिन महामारी कोराना के चलते 15 राज्य इन्हें टाला चुके हैं और लगता है कि बाकी के राज्य भी एक-एक कर इसी निर्णय की तरफ जाने वाले हैँ। लेकिन राज्यों को यह चुनाव टालने के लिए अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी है। यानी चुनाव टालना इतना आसान भी नहीं है।
इस चुनाव का अंतिम चरण इसी साल नवंबर में होना है और डोनाल्ड ट्रंप जनवरी 2021 में अपना पहला कार्यकाल पूरा करेंगे। अगर जून में प्राथमिक चुनाव नहीं हो रहे हैं तो फिर नवंबर में अंतिम चुनाव होना फिलहाल कठिन लगता है। ऐसे में अमेरिका के सामने संविधानिक संकट उपस्थति हो सकता है। अमेरिका में प्रत्यक्ष मतदान ही होता है यानी मतदाता को मतदान केंद्र जाकर मताधिकार का प्रयोग करना होता है। वह पोस्टर बैलेट यानी डाक मतपत्र का उपयोग भी कर सकता है लेकिन उसे इसका वाजिब कारण बताकर पहले अनुमति लेना होती है। इस तरह के मतदान की संभावना में भी सभी मतदाताओं को यह सुविधा मिल पाने और उसका इंतजाम हो पाने के आसार फिलहाल नहीं लग रहे हैं।
भारत में उपचुनाव और फिर विधानसभा चुनाव का क्या होगा?
भारत में भी कोरोना संकट के चलते राज्यसभा के चुनाव स्थगित करने पड़े हैं। मप्र, महाराष्ट्र, उप्र समेत कई राज्यों में राज्यसभा की रिक्त सीटों के लिए मार्च-अप्रैल में चुनाव की प्रक्रिया अंतिम चरण में स्थगित की गई। मप्र में तो कोरोना संकट काल में भी सत्ता पलट की सियासत के चलते 22 विधानसभा सीटें रिक्त हुई हैंं। इनमें से दो पूर्व विधायक अब मंत्री भी बना दिए गए हैं। इन सीटों पर सितंबर तक चुनाव होना चाहिए।
उधर महाराष्ट्र में बिना किसी सदन के सदस्य रहे मुख्यमंत्री बने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को 29 मई तक विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुना जाना आवश्यक है, वे इस तारीख को बतौर मुख्यमंत्री छह महीने पूरे करेंगे। अगर सदस्य नहीं बन सके तो मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ेगा या यों कहें कि स्वयमेव ही वे मुख्यमंत्री नहीं रह जाएंगे। विधान परिषद का चुनाव भी स्थगित हो जाने से अब उद्धव विधान परिषद मेंं मनोनीत सदस्य बनकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखने की कोशिश में हैं जरूर लेकिन मनोनयन का अधिकार राज्यपाल को है। मनोनयन को राज्यपाल की मंजूरी मिलने या न मिलने के पेंच से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या मनोनीत सदस्य मुख्यमंत्री हो सकता है? किसी भी तरह के सदन में किसी भी तरह के मनोनीत सदस्यों को मताधिकार नहीं होता तो मताधिकार विहीन कोई सदस्य सदन का नेता मुख्यमंत्री या मंत्री भी कैसे हो सकता है?
बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव ....
भारतीय राजनीति में वर्तमान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिहार और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होना है। पहले बिहार और फिर बंगाल में। सवाल यह है कि कोरोना संकट अगर जल्द नहीं टला तो क्या इन राज्यों के विधानसभा आम चुनाव पर भी असर पड़ेगा? गैर भाजपा दलों की सियासत के लिहाज से यह सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण है और उन दलों में अब इस पर सुगबुगाहट शुरू भी होगई है। राज्यसभा चुनाव टलने और इसके बाद कोरोना संकट गहराने ने इन दलों को चौकन्ना कर दिया है। लोकसभा की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की कोरोना संकट पर केंद्र सरकार की घेराबंदी के पीछे एक कारण भविष्य की राजनीति भी है।
मध्य प्रदेश में पहले से ही टले नगरीय निकाय और पंचायती राज चुनाव मे कोरोना जनित नया पेंच
मध्यप्रदेश में बीते साल कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने नगरीय निकायों के चुनाव नवंबर में नही कराए, सरकार महापौर और नपाध्यक्षों के सीधे चुनाव के बजाय चुने हुए पार्षदों में से ही चुनने की ढाई दशक पुरानी पद्धति को फिर लागू करना चाहती थी। इसके पीछे निकायों में भाजपा के जारी वर्चस्व को तोड़ने की मंशा थी लेकिन तत्कालीन विपक्ष भाजपा ने पुरजोर विरोध किया और राज्यपाल लालजी टंडन ने सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
सरकार ने निकायों की चुनी हुई परिषदों और महापौर, अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा होते ही प्रशासक नियुक्त कर निकाय पूरी तरह अफसरों को सौँप दिए। लेकिन इस साल के तीसरे महीने यानी प्रशासक व्यवस्था के करीब पांच माह पूरे होने तक सत्तापलट हो जाने के बाद अब भाजपा की शिवराज सरकार ने यह प्रशासक व्यवस्था खत्म कर पांच साल का कार्यकाल पूरा कर चुके महापौरों और अध्यक्षों को ही प्रशासक की जगह बैठाने का फैसला कर लिया है।
यानी कोरोना के संकट के चलते यह किया गया है, इसी तरह का फैसला त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं के लिए किया गया। यानी सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों की जगह प्रशासनिक अधिकारियों को दिए गए अधिकारों को अब कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्षों को कमान दी गई है। यह अभूतपूर्व हालात हैं। सवाल यह है कि क्या इन फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जाएगी?
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