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अनुभवों में जीवन: क्यों वृद्ध कहलाने से बचना चाहते हैं लोग? जानें अनुभव की उम्र को क्यों माना जाता है बोझ
Fri, 13 Mar 2026 07:31 AM IST
Himanshu Singh Chandel
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Fri, 13 Mar 2026 07:31 AM IST
सार
वृद्धावस्था वह अवस्था है, जहां वर्षों का ज्ञान, धैर्य और समझ एकत्रित होकर व्यक्ति को गहराई प्रदान करते हैं। बुजुर्ग लोग समाज की स्मृति होते हैं। उनके अनुभवों में जीवन की दिशा छिपी होती है और उनकी कहानियों में पीढ़ियों का ज्ञान।
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old couple
- फोटो : एडोब स्टॉक
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विस्तार
जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब दुनिया हमें यह याद दिलाती है कि एक दिन हम वृद्ध हो जाएंगे। उस क्षण ऐसा लगता है, जैसे यह बात हमारे लिए नहीं, किसी और के लिए कही गई हो। दरअसल, जब हम अपनी छवि किसी वृद्ध व्यक्ति के रूप में देखते हैं, तो मन के भीतर से एक आवाज उठती है कि यह हमारे साथ नहीं होगा। और यदि कभी ऐसा हुआ भी, तो वह ‘हम’ नहीं होंगे, जो उसे अनुभव कर रहे होंगे।
इस प्रकार वर्तमान का ‘मैं’ और भविष्य का ‘मैं’ एक-दूसरे से अलग कर दिए जाते हैं। यही कारण है कि कई लोग वृद्ध कहलाने से बचना चाहते हैं, खासकर साठ, सत्तर या अस्सी वर्ष की आयु के लोग। उनका तर्क होता है कि वे न तो बीमार हैं, न असहाय, न ही जीवन से निराश। इसलिए केवल उम्र के आधार पर उन्हें वृद्ध कहना उचित नहीं है।
वास्तव में समस्या मनुष्य के जीवन-चक्र में नहीं है, क्योंकि हर व्यक्ति जन्म से लेकर युवावस्था से होते हुए वृद्धावस्था तक की यात्रा करता है। यह जीवन की स्वाभाविक और सुंदर प्रक्रिया है। समस्या तो उस सामाजिक दृष्टिकोण में है, जिसने वृद्धावस्था को सम्मान के बजाय बोझ के रूप में देखना शुरू कर दिया है। जब समाज किसी अवस्था को सम्मान और गरिमा से वंचित कर देता है, तो स्वाभाविक रूप से लोग उस पहचान से दूरी बनाने लगते हैं।
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हमें यह समझने की जरूरत है कि वृद्धावस्था जीवन का अंत नहीं, बल्कि अनुभवों की परिपक्वता का समय है। यह वह अवस्था है, जहां वर्षों का ज्ञान, धैर्य और समझ एकत्रित होकर व्यक्ति को गहराई प्रदान करते हैं। बुजुर्ग लोग समाज की स्मृति होते हैं। उनके अनुभवों में जीवन की दिशा छिपी होती है और उनकी कहानियों में पीढ़ियों का ज्ञान।'
वृद्धावस्था जीवन की वह गरिमामय अवस्था है, जिसमें मनुष्य अपने अनुभवों से समाज को दिशा दे सकता है। यदि हम इस चरण को सम्मान और संवेदना के साथ स्वीकार करें, तो समाज को अधिक मानवीय और संतुलित बना सकते हैं।
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इस प्रकार वर्तमान का ‘मैं’ और भविष्य का ‘मैं’ एक-दूसरे से अलग कर दिए जाते हैं। यही कारण है कि कई लोग वृद्ध कहलाने से बचना चाहते हैं, खासकर साठ, सत्तर या अस्सी वर्ष की आयु के लोग। उनका तर्क होता है कि वे न तो बीमार हैं, न असहाय, न ही जीवन से निराश। इसलिए केवल उम्र के आधार पर उन्हें वृद्ध कहना उचित नहीं है।
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वास्तव में समस्या मनुष्य के जीवन-चक्र में नहीं है, क्योंकि हर व्यक्ति जन्म से लेकर युवावस्था से होते हुए वृद्धावस्था तक की यात्रा करता है। यह जीवन की स्वाभाविक और सुंदर प्रक्रिया है। समस्या तो उस सामाजिक दृष्टिकोण में है, जिसने वृद्धावस्था को सम्मान के बजाय बोझ के रूप में देखना शुरू कर दिया है। जब समाज किसी अवस्था को सम्मान और गरिमा से वंचित कर देता है, तो स्वाभाविक रूप से लोग उस पहचान से दूरी बनाने लगते हैं।
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हमें यह समझने की जरूरत है कि वृद्धावस्था जीवन का अंत नहीं, बल्कि अनुभवों की परिपक्वता का समय है। यह वह अवस्था है, जहां वर्षों का ज्ञान, धैर्य और समझ एकत्रित होकर व्यक्ति को गहराई प्रदान करते हैं। बुजुर्ग लोग समाज की स्मृति होते हैं। उनके अनुभवों में जीवन की दिशा छिपी होती है और उनकी कहानियों में पीढ़ियों का ज्ञान।'
वृद्धावस्था जीवन की वह गरिमामय अवस्था है, जिसमें मनुष्य अपने अनुभवों से समाज को दिशा दे सकता है। यदि हम इस चरण को सम्मान और संवेदना के साथ स्वीकार करें, तो समाज को अधिक मानवीय और संतुलित बना सकते हैं।