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मातृ मृत्यु दर कम करने की जंग: कहां तक पहुंचा भारत?

Mon, 24 Mar 2025 02:41 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 24 Mar 2025 02:41 PM IST
सार

मातृ मृत्यु का अर्थ है गर्भावस्था के दौरान या गर्भावस्था समाप्त होने के 42 दिनों के भीतर महिला की मृत्यु। भारत में मातृ मृत्यु का अनुमान नमूना पंजीकरण प्रणाली (एस आर एस ) से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर लगाया जाता है।

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What is the maternal mortality rate in India check here
मातृ मृत्यु का अर्थ है गर्भावस्था के दौरान या गर्भावस्था समाप्त होने के 42 दिनों के भीतर महिला की मृत्यु। - फोटो : Freepik.com

विस्तार

पिछले दो दशकों में, भारत ने मातृ मृत्यु दर (एमएमआर ) में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, संस्थागत प्रसव में वृद्धि, और व्यापक सामाजिक सुधारों के कारण मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है। इसके बावजूद, देश के विभिन्न क्षेत्रों में मातृ मृत्यु दर में असमानता बनी हुई है और भारत अभी भी अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने से कुछ दूरी पर है।

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महिलाओं में मृत्यु के प्रमुख कारणों में मातृ मृत्यु दर एक महत्वपूर्ण कारण बनी हुई है। 2020 में, 15-29 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं की कुल मृत्यु में से लगभग 7% मौतें मातृ मृत्यु से जुड़ी थीं।
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मातृ मृत्यु का अर्थ है गर्भावस्था के दौरान या गर्भावस्था समाप्त होने के 42 दिनों के भीतर महिला की मृत्यु। भारत में मातृ मृत्यु का अनुमान नमूना पंजीकरण प्रणाली (एस आर एस ) से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर लगाया जाता है। 2018-2020 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 97 महिलाओं की मृत्यु हुई, जो लगभग 24,000 वार्षिक मौतों के बराबर है। भारत में विभिन्न राज्यों में मातृ मृत्यु दर में बड़ा अंतर है।
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केरल में सबसे कम एमएमआर 19 प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर दर्ज किया गया, जो अमेरिका (21) से भी बेहतर है। वहीं, असम, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एमएमआर सबसे अधिक दर्ज किया गया। ये राज्य स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच और बुनियादी ढांचे की समस्याओं से जूझ रहे हैं।

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध एसआरएस डेटा मातृ मृत्यु के कारणों पर जानकारी प्रदान नहीं करता है। हालांकि, 2007 से 2014 के बीच किए गए "मिलियन डेथ स्टडी " में "वर्बल ऑटोप्सी" पद्धति का उपयोग करके मृत्यु के कारणों को समझने का प्रयास किया गया। 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में मातृ मृत्यु का प्रमुख कारण ऑब्स्टेट्रिक हैमरेज (गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के तुरंत बाद अत्यधिक रक्तस्राव) है।

यह समस्या पूरे देश में महिलाओं को प्रभावित करती है, लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे गरीब राज्यों में विशेष रूप से गंभीर है। 2007 से 2014 के बीच इन क्षेत्रों में आधे से अधिक मातृ मृत्यु हैमरेज के कारण हुईं, क्योंकि देरी से निदान और अपर्याप्त उपचार अक्सर घातक साबित हुआ। वहीं, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्यों में गर्भावस्था से जुड़ी उच्च रक्तचाप की बीमारियां (प्री-एक्लेम्पसिया और एक्लेम्पसिया) एक गंभीर खतरे के रूप में उभरी हैं।


पिछले कुछ वर्षों में भारत ने मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। 2014-16 में प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 130 मातृ मृत्यु दर्ज की गई थी, जो 2018-20 में घटकर 97 रह गई।

कुछ राज्यों ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के तहत 70 से कम एमएमआर प्राप्त कर लिया है, जिनमें केरल, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, गुजरात और कर्नाटक शामिल हैं। हालांकि, अन्य राज्यों में अब भी उच्च मातृ मृत्यु दर बनी हुई है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 (2019-21) के अनुसार, प्रसवपूर्व देखभाल में सुधार हुआ है। पहली तिमाही में प्रसवपूर्व देखभाल प्राप्त करने वाली महिलाओं का अनुपात 59% (2015-16) से बढ़कर 70% हो गया है। चार या अधिक प्रसवपूर्व देखभाल प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या भी 51% से बढ़कर 59% हो गई है।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत प्रसव दर 79% से बढ़कर 89% हो गई है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं, जहां लगभग 87% प्रसव संस्थागत होते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह दर 94% है।

भारत में मातृ मृत्यु की प्रमुख वजहों में रक्तस्राव, संक्रमण, उच्च रक्तचाप से जुड़ी जटिलताएं और असुरक्षित गर्भपात शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कुपोषण, कम उम्र में गर्भधारण, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और आर्थिक व सामाजिक असमानताएं भी मातृ मृत्यु दर को बढ़ाने में योगदान देती हैं। खासकर पिछड़े और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

सरकार ने मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए कई योजनाएं चलाई हैं। इनमें प्रमुख रूप से जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई), प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके), सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (सुमन) और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) शामिल हैं।

इन योजनाओं का उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, गर्भवती महिलाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना और प्रसव के दौरान मुफ्त चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित करना है।

हालांकि, इन योजनाओं के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में प्रसवपूर्व देखभाल की सेवाएं सीमित हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों की कमी है, जिससे गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इसके अलावा, कई महिलाएं जागरूकता और सामाजिक दबाव के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं ले पातीं।

मातृ मृत्यु दर को और कम करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुलभ और प्रभावी बनाना आवश्यक है। इसके लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका को मजबूत करना, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का बुनियादी ढांचा सुधारना और दूर-दराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना जरूरी है।

इसके अलावा, किशोरियों और महिलाओं में स्वास्थ्य शिक्षा और पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि वे गर्भावस्था के दौरान आवश्यक सावधानियां बरत सकें।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखती है और सामाजिक जागरूकता में सुधार किया जाता है, तो 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के तहत 70 से कम एमएमआर प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।

समुदाय, गैर-सरकारी संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को मिलकर एक ठोस कार्य योजना तैयार करनी होगी ताकि हर गर्भवती महिला को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें और किसी भी महिला की जान सिर्फ इसलिए न जाए क्योंकि उसे समय पर उचित चिकित्सा सहायता नहीं मिली।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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