यूरोपीय देशों के अस्पतालों में भी होती है पढ़ने की व्यवस्था, मरीज इस तरह करते हैं पढ़ाई
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यूरोपीय देशों में बीमारी शिक्षा की राह में रोड़ा नहीं बनती। फिर बीमारी चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो। अगर डॉक्टर अनुमति दे तो कैंसर की बीमारी से जूझते बच्चे के लिए भी पढ़ाई की व्यवस्था हो सकती है। उसके उपचार को प्रभावित किए बग़ैर आसान और रोचक तरीक़े से पढ़ाई की व्यवस्था यहां के अस्पतालों में होती है। इसे in hospital schooling कहते हैं।
अस्पताल में चलने वाले इन स्कूलों में स्वास्थ्य और उपचार को ध्यान में रखते हुए पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है। यह सुविधा उन बच्चों को मिलती है जिन्हें पांच दिन से ज़्यादा समय के लिए अस्पताल में रुकने की मजबूरी है। हॉस्पिटल विद्यालय का कॉन्सेप्ट यूरोप, यूके, ऑस्ट्रेलिया में सबसे ज्यादा फलफूल रहा है। यहां इस तरह से शिक्षा व्यवस्था की रूपरेखा तैयार की गई है कि सभी बच्चे शिक्षा के अधिकार के दायरे में आ जाएं और अगर किसी कारणवश इसमें रुकावट आ रही है तो उसे तत्काल दूर करने के उपाय हों।
यहां चलते हैं हॉस्पिटल स्कूल
मुझे हॉस्पिटल स्कूल के बारे में जानकारी फ़िनलैंड से मिली। यहां बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा, भोजन और स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा के साथ यह भी देखा जाता है कि कहीं कोई बच्चा अस्वस्थ होने के कारण पढ़ाई से दूर तो नहीं हो रहा। अगर ऐसा है तो सरकार ऐसे बच्चों के लिए अस्पतालों में शिक्षा व्यवस्था शुरू करती है, जिसका पाठ्यक्रम नियमित स्कूलों के समान होता है। इस तरह बच्चे अस्पताल में होते हुए भी अपनी पढ़ाई समय से पूरी कर पाते हैं। यहां बच्चों को कक्षा नौ तक पढ़ना अनिवार्य (कंपल्सरी एजुकेशन)होता है। आपको बता दूं कि फ़िनलैंड की शिक्षा व्यवस्था दुनिया की सबसे बेहतर शिक्षा व्यवस्था मानी जाती है।
हॉस्पिटल स्कूलों का लक्ष्य बिना रुकावट बच्चों की अनिवार्य शिक्षा को पूरा कराना है। यह माना जाता है कि अस्पतालों में चलने वाले स्कूल बच्चों के लिए उस पुल की तरह काम करते हैं जो उनके ठीक होने पर उन्हें सामान्य स्कूल तक बिना किसी बाधा के पहुंचा देती है। फ़िनलैंड में सरकार ने अस्पताल स्कूलों को सामान्य स्कूल से जोड़ रखा है। जिससे यह मालूम चलता रहता है कि सामान्य स्कूल का बीमार बच्चा हॉस्पिटल स्कूल में क्या और कितने अध्याय तक पढ़ चुका है।
क्या किया जाता है इन स्कूलों में? कैसे कराई जाती है पढ़ाई?
इस कॉन्सेप्ट का फ़ायदा यह है कि लंबे समय तक गैरहाजिर होने के बावजूद स्कूल से उसका नाम नहीं कटता। दोनों तरह के विद्यालयों के बीच सामंजस्य होने का नतीजा यह है कि स्वस्थ होने पर बच्चे के लिए सामान्य स्कूल के पाठ्यक्रम को समझना और उनमें घुलना मिलना आसान हो जाता है। वह कभी खुद को दूसरे बच्चों से पीछे नहीं समझता और नियत समय पर उसकी स्कूली शिक्षा पूरी भी हो जाती है। इन स्कूलों में बच्चे की बीमारी और उपचार को ध्यान में रखते हुए अध्ययन का पैटर्न तैयार किया जाता है।
हॉस्पिटल स्कूल में शिक्षक, डॉक्टर और परिजनों की मर्ज़ी व सुविधा का ध्यान रखते हुए बच्चे के लिए पढ़ाई का समय तय करते हैं। अस्पतालों में पढ़ाई के लिए किताब-कॉपियां उपलब्ध कराना सामान्य स्कूल की ज़िम्मेदारी होती है। पढ़ाई का स्थान बीमार बच्चे का कमरा हो सकता है या फिर कोई दूसरी जगह, यह बच्चे के स्वास्थ्य पर पूरी तरह निर्भर होता है।
माना जाता है कि यह प्रयास उपचार के दौरान बच्चों के मन बहलाव और बीमारी से ध्यान भटकाने का काम भी करता है। जबकि बच्चों के मन मस्तिष्क में ऊर्जा का संचार भी होता रहता है। हॉस्पिटल से शिक्षक लगातार बच्चे के सामान्य स्कूल के संपर्क में रहते हैं, ताकि उन्हें यह मालूम हो सके कि उनके पढ़ाई का सबसे अनिवार्य हिस्सा क्या है जिसे बच्चे को पूरा करना चाहिए। हालांकि इसे तय समय में पूरा करना बच्चे के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। इस लिहाज़ से सिलेबस को कम या ज्यादा भी किया जाता है। डॉक्टर की अनुमति पर इन बच्चों को होमवर्क देने और टेस्ट लेने का काम भी बखूबी होता है।
पढ़ाई पर लिए जाते हैं नीतिगत् निर्णय
यह जानकर आपको ताज्जुब होगा कि यहां जब बच्चों की शिक्षा पर कोई चर्चा या नीतिगत निर्णय लिये जाते हैं तो उनमें हॉस्पिटल स्कूलों को भी निश्चित तौर पर शामिल किया जाता है। ताकि उन्हें सभी बारीकियों की जानकारी रहे। हालांकि कई दफ़ा ऐसा भी होता है कि बच्चे के हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद वह क्लासरूम स्टडी के लिए फ़िट नहीं होता।
डॉक्टर उसे दूसरे बच्चों के साथ सामान्य तरीके से पढ़ाई करने की अनुमति नहीं देते। ऐसे में बच्चों के लिए रिमोट टिचिंग यानी दूर से पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है। लेकिन उसके लिए बच्चे के घर और विद्यालय को पूरी तरह से आधुनिक तकनीकों से लैस होना ज़रूरी होता है। यहां आलम यह है कि अगर किसी बच्चे के लिए आधुनिक सुविधाओं का अभाव शिक्षा के आड़े आ रहा हो तो इसकी भरपाई भी सरकार तत्काल कर देती है। इससे बच्चे को क्लासरूम शिक्षा और दूसरी गतिविधियों को पूरा करना सरल हो जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।