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चुनावी हिंसा में बिहार की 'शर्मनाक' परंपरा से कहीं आगे निकला ममता का बंगाल

Wed, 15 May 2019 01:19 PM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Wed, 15 May 2019 01:19 PM IST
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west bengal violence vidyasagar statue broken in trinamool-BJP violence amit shah mamata banerjee
2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान के हर चरण के दौरान पश्चिम बंगाल में हिंसा हो रही है। - फोटो : Social media

बंगाल 1990 के दशक का बिहार बनता नजर आ रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान के हर चरण के दौरान पश्चिम बंगाल में हिंसा हो रही है। अब कोलकाता में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के चुनावी रोड शो के दौरान हिंसा हुई है। भाजपा और टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे पर हमला किया है। बंगाल में दुखद हिंसा को अब चुनावी लाभ में तब्दील करने की कोशिश की गई है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी गई है। पूरे देश में समाज सुधारक के तौर पर विद्यासागर की पहचान है। टीएमसी ने इसी को मुद्दा बनाया है। भाजपा पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगाया है। वहीं बीजेपी डिफेंसिव है और टीएमसी पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगा रही है।

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यह हिंसा छठे चरण की हिंसा के बाद की हिंसा है। छठे चरण के दौरान भी झारग्राम में एक भाजपा कार्यकर्ता रमण सिंह की हत्या हो गई थी। पश्चिम बंगाल में भारी मतदान के बीच लगातार हिंसा ने यह साबित कर दिया है कि बंगाल भाजपा और टीएमसी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है, क्योंकि दोनों दलों का राजनीतिक भविष्य़ बंगाल से तय होता दिख रहा है।
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भाजपा को लग रहा है कि बाकी राज्यों में लोकसभा सीटों के नुकसान की भरपाई पश्चिम बंगाल से पूरी की जा सकती है। जबकि तृणमूल कांग्रेस को लग रहा है कि ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर इस बार केंद्र में ममता बनर्जी निर्णायक भूमिका में आएंगी।
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बंगाल में क्यों हिंसा के साये में हो रहा है चुनाव? 
अभी तक हुए छ चऱणों के चुनाव में पश्चिम बंगाल मे हिंसा हुई है। पांचवे चरण के मतदान के दौरान बैरकपुर में भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच संघर्ष हो गया। बीजेपी ने टीएमसी पर भाजपा प्रत्य़ाशी अर्जुन सिंह पर हमले की कोशिश का आऱोप लगाया। चौथे चरण में आसनसोल में भाजपा प्रत्याशी बाबुल सुप्रियों की कार पर हमला किया। तीसरे चरण में सीपीएम और कांग्रेस समर्थकों पर हमला किया गया। मुर्शिदाबाद में कांग्रेस समर्थक की हत्या कर दी गई।

दूसरे चरण में रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई एम के सांसद मोहम्मद सलीम की गाड़ी पर हमला किया गया। पहले चरण में भी अलीपुरदुआर और कूच बिहार में टीएमसी और भाजपा समर्थकों के बीच संघर्ष हो गया। टीएमसी ने लेफ्ट प्रत्याशी पर भी हमला किया, उनकी गाड़ी तोड़ी।

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चुनावी हिंसा के लिए बिहार मशहूर रहा है। बिहार में 1970 के दशक में चुनावी हिंसा शुरू हो गई थी। - फोटो : Amar Ujala

30 सालों में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं और आरोप-प्रत्यारोप 
चुनावी हिंसा के लिए बिहार मशहूर रहा है। बिहार में 1970 के दशक में चुनावी हिंसा शुरू हो गई थी। उसी समय बंगाल में भी चुनावी हिंसा शुरू हो गई। बिहार में 70 के दशक में बूथ कंट्रोल चुनावों के दौरान शुरू हो गया। इसी दौरान बंगाल में भी बूथ कंट्रोल शुरू हो गया। काफी लंबे समय तक सीपीएम के कार्यकाल में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याओं का सिलसिला चलता रहा।

सीपीएम पर भी लगातार बूथ कंट्रोल कर चुनाव जीतने के आरोप लगे। बंगाल में राजनीतिक हिंसा के हालात यह रहे कि लेफ्ट के 30 सालों के शासन में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं। इस हिंसा के ज्यादातर शिकार विरोधी दल के कार्यकर्ता हुए थे। पश्चिम बंगाल में सीपीएम के शासन के दौरान राजनीतिक हिंसा काफी हुई थी। सीपीएम के शासन को उखाड़ ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आईं। लेकिन उनके शासनकाल और सीपीएम के शासनकाल में खास अंतर नजर नहीं आया।

ममता बनर्जी के दौर में भी राजनीतिक हत्याएं होती रही हैं। पहले जिन राजनीतिक हत्याओं का शिकार कांग्रेस और टीएमसी रही, उसी तरह की राजनीतिक हत्याओं का शिकार अब भाजपा,कांग्रेस और सीपीएम हो रही है। राज्य में भाजपा के बढ़ते ग्राफ के बीच राजनीतिक हिंसा बढ़ी है। खासकर भाजपा की हिंदूवादी राजनीति ने राज्य में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण को तेज किया है।

राजनीतिक कारण हैं हिंसा के पीछे? 
पिछले 3 सालों में राज्य में रामनवमी और मुहर्रम के अवसर पर धार्मिक हिंसा हुई, जिसके पीछे कारण पूरी तरह से राजनीतिक थे। लेकिन ममता बनर्जी के रवैये पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। 2018 में पंचायत चुनावों के दौरान पश्चिम बंगाल में जमकर हिंसा हुई थी। जबकि खुद ममता बनर्जी सीपीएम की राजनीतिक हिंसा की शिकार कई बार हुई, वैसे में उनके समर्थकों दवारा राजनीतिक हिंसा किए जाने को लेकर तमाम सवाल उठ रहे है। हालांकि राजनीतिक हिंसा में सिर्फ टीएमसी समर्थकों की भूमिका यह कहना गैरवाजिब होगा। पश्चिम बंगाल में भाजपा लगातार हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने की कोशिश में है। इस कारण कई भी कई बार हिंसा हुई है।

 

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लोकसभा चुनावों के दौरान हो रही हिंसा के बीच आय़ोग बेबस है। - फोटो : PTI

चुनाव आयोग बेबस? कैसे बंद होगी हिंसा? 
लोकसभा चुनावों के दौरान हो रही हिंसा के बीच आय़ोग बेबस दिखाई दिया है। आखिर आयोग इस बार इतना बेबस क्यों है? आयोग अभी तक चुनावी हिंसा रोकने में विफल रहा है, आखिर क्यों? क्या चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में किसी तरह से चुनावी प्रक्रिया को निपटाना चाहता है? 

कई विशेषज्ञ आयोग की विफलता इसमें ज्यादा मान रहे हैं। जाहिर है 7 चरणों में चुनाव कराने के फैसले के बाद आयोग चुनावी हिंसा रोक नहीं पाया है। एक भी चरण में अभी तक शांतिपूर्वक मतदान नहीं हुए हैं। राज्य की पुलिस और केंद्रीय पुलिस बलों के बीच तालमेल का आभाव नजर आ रहा है। राज्य का प्रशासन भी रवैया अलग है। राय यह भी बन रही है कि 2 से 3 चरणों में अगर मतदान होता तो शायद इतनी हिंसा राज्य में नहीं होती। लेकिन ज्यादा चरणों में चुनाव होने के कारण आसामाजिक तत्वों को संगठित होने का मौका मिल रहा है, वहीं राजनीतिक दल पूरी राज्य से अपने समर्थकों को बुलाकर ताकत लगा रहे है।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बिहार और यूपी से लोग बुला रखे हैं। टीएमसी का कैडर वैसे ही राज्य के अंदर खासा मजबूत है। दूसरी तरफ प्रशासनिक अमला बेबस है। वहीं चुनाव आयोग खुद बेबसी इसलिए भी है कि आयोग पर लगातार पक्षपात के आरोप लग रहे हैं।

प्रधानमंत्री के प्रति सॉफ्ट रवैया अपनाए जाने को लेकर तमाम आरोप चुनाव आयोग पर लग रहे हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में सख्त कार्रवाई करने के बाद आयोग और निशाने पर आएगा। सवाल यही है कि बिहार जैसे हिंसा ग्रस्त राज्य में चुनाव आयोग 1996 के बाद स्वच्छ चुनाव करवाने में सफल रहा। फिर पश्चिम बंगाल में वही चुनाव आयोग साफ सुथरा चुनाव कराने में विफल क्यों है?
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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