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बंगाल में टूटा राज्यसभा की पांचवीं सीट पर गतिरोध

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Wed, 11 Mar 2020 12:28 PM IST
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बिकाश रंजन भट्टाचार्य राज्यसभा का नामांकन भरेंगे। - फोटो : Social Media

पश्चिम बंगाल में राज्यसभा की पांचवीं सीट पर पैदा गतिरोध दूर हो गया है। अब वाममोर्चा इस सीट पर जीत के लिए कांग्रेस का समर्थन लेगा। मोर्चा ने कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और कोलकाता नगर निगम के पूर्व मेयर बिकाश रंजन भट्टाचार्य को इस सीट पर अपना उम्मीदवार बनाया है। इससे वह परंपरा भी टूट गई है जिसके तहत कांग्रेस के दो नेताओं-अभिषेक मनु सिंघवी और प्रदीप भट्टाचार्य तृणमूल कांग्रेस के समर्थन से राज्यसभा की सीट पर जीते थे।

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दरअसल, राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच इस तालमेल से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले इन दोनों दलों के बीच आपसी समन्वय बेहतर व मजबूत होगा।
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क्या है बंगाल में सियासी दलों की स्थिति?  
पश्चिम बंगाल में विधानसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों की जो स्थित है उसे देखते हुए पांच में से चार सीटों पर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार की जीत तय है। लेकिन हर बार की तरह अबकी भी पांचवीं सीट पर पेंच फंसा था। समीकरण ऐसे थे कि कांग्रेस या वाममोर्चा में से कोई भी अकेले अपने बूते यह सीट नहीं जीत सकता था। इससे पहले कांग्रेस के कई नेता तृणमूल कांग्रेस के समर्थन से यह सीट जीत चुके हैं।
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राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता के 49 वोटों की जरूरत होगी। अब महीने भर से चली रस्साकशी के बाद वाममोर्चा और कांग्रेस में तालमेल पर सहमति बन गई है।

प्रदेश माकपा के नेता पहले इस पांचवीं सीट पर पार्टी महासचिव सीतारम येचुरी को उम्मीदवार बनाना चाहती थी। प्रदेश कांग्रेस ने भी पहले ही एलान कर दिया था कि येचुरी के उम्मीदवार बनने की स्थिति में उसे समर्थन देने पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन पोलितब्यूरो ने उनके नाम को मंजूरी नहीं दी। उसके बाद पूर्व सांसद औऱ पोलितब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीमा का नाम सामने आया। लेकिन कांग्रेस के एक गुट को सलीम के नाम पर आपत्ति थी। इसके बाद विकास रंजन के नाम पर सहमति बनी।
 

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सीताराम येचुरी और राहुल गांधी ने लगाई बिकाश के नाम पर मुहर - फोटो : फाइल फोटो

इधर, दिल्ली में राहुल गांधी औऱ सीताराम येचुरी के बीच सोमवार को हुई बैठक में बिकाश के नाम पर सहमति बनी। बिकाश गुरुवार को अपना नामांकन पत्र दायर करेंगे। वाममोर्चा ने इससे पहले वर्ष 2017 में भी बिकाश को राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था। लेकिन तकनीकी खामियों की वजह से तब उनका नामांकन पत्र रद्द हो गया था। तब कांग्रेस के प्रदीप भट्टाचार्य तृणमूल कांग्रेस के समर्थन से निर्विरोध चुन लिए गए थे।

वर्ष 2017 और 2018 के राज्यसभा चुनावों के समय कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच तालमेल पर सहमति नहीं बन सकी थी। 2018 में तृणमूल के समर्थन से कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी जीत गए थे।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच कोई औपचारिक तालमेल नहीं हो सका था। लेकिन तब कोलकाता की जादवपुर संसदीय सीट पर माकपा के बिकाश रंजन भट्टाचार्य के समर्थन में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा किया था। हालांकि तब बिकाश चुनाव हार गए थे। बिकाश से कांग्रेस नेताओं के बेहतर रिश्ते हैं।

कांग्रेस नेता अब्दुल मन्नान ने चिटफंड घोटाले के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की थी उसमें बिकाश ही उनके वकील रहे हैं। इसके अलावा सेव डेमोक्रेसी फोरम के बैनर तले यह दोनों नेता राज्य में कई जगह रैलियां भी कर चुके हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्यसभा की सीट पर आपसी तालमेल बना कर वाममोर्चा और कांग्रेस ने साफ संकेत दे दिया है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भी उनको तालमेल पर कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन फिलहाल पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है। पहले भी इन दोनों की दोस्ती कई मौकों पर टूट चुकी है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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