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बंंगाल चुनाव 2021: 64 साल तक बंगाल पर राज करने वाली कांग्रेस और लेफ्ट शून्य पर कैसे?

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Mon, 03 May 2021 06:43 PM IST
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west bengal election results 2021 why did Left Front, Congress fail to win any seats
लेफ्ट और कांग्रेस ने बंगाल पर कुल मिलाकर 64 साल तक राज किया है। - फोटो : सोशल मीडिया

पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों से सत्ता की सबसे प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा को तो झटका लगा है। लेकिन उससे भी हैरत की बात इसमें लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन का सूपड़ा साफ होना है। इन दोनों दलों ने बंगाल पर कुल मिलाकर 64 साल तक राज किया है। उस बार उन्होंने फुरफुरा शरीफ की इंडियन सेक्यूलर फ्रंट (आएसएप) के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा बनाया था और मुकाबला तिकोना बनाने की उम्मीद के साथ मैदान में उतरी थी। लेकिन मतदाताओं ने बाकी जगह तो दूर कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ रहे मुर्शिदाबाद और मालदा में भी उसे पूरी तरह खारिज कर दिया। इन दोनों दलों के तमाम वोटर भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल कांग्रेस के खेमे में चले गए।

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वैसे, वर्ष 2016 में भी इन दोनों दलों ने हाथ मिला कर चुनाव लड़ा था। उस समय कांग्रेस को 44 और लेफ्ट को 32 सीटें मिली थीं। उसके बाद वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को तो दो सीटें मिल गई थीं। लेकिन लेफ्ट को एक भी सीट नहीं मिली। इस बार लेफ्ट की ब्रिगेड रैली में उमड़ी भीड़ को देखते हुए पार्टी के नेताओं में उम्मीद बंधी थी कि शायद उसकी राजनीतिक किस्मत का सितारा अबकी बुलंद रहेगा।
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ठीक 25 साल पहले वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने राज्य की 294 में से 280 सीटें जीती थीं। तब उनके वोटों को प्रतिशत 86.3 फीसदी रहा था। पांच साल पहले वर्ष 2016 में  38 फीसदी वोट और 76 सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार उनको एक सीट भी नहीं मिली है और साथ ही वोटों का प्रतिशत भी दस फीसदी से नीचे आ गया है। इसमें लेफ्ट के वोट 5.5 फीसदी हैं तो कांग्रेस को महज 2।9 फीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा है।
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west bengal election results 2021 why did Left Front, Congress fail to win any seats
क्या लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन अब बंगाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुका है? - फोटो : अमर उजाला

बीते कई दशकों की वजह से गनी खान के कारण मालदा, अधीर चौधरी की वजह से मुर्शिदाबाद और प्रियरंजन दासमुंशी की वजह से उत्तर दिनाजपुर कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ रहा है। पार्टी को और कहीं से सीटें भले नहीं मिलें, उसे इन तीनों जिलों से खासी सीटें मिल जाती थी। इसी तरह पूर्व बर्दवान और बीरभूम जिला को लेफ्ट का गढ़ माना जाता रहा है।

दरअसल, संयुक्त मोर्चा नेताओं को उम्मीद थी कि आईएसएफ तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएगी और उसका फायदा मोर्चा को मिलेगा। लेकिन यह रणनीति बेअसर रही। भाजपा के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अल्पसंख्यकों ने एकजुट होकर तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया। प्रदेश कांग्रेस अधीर चौधरी ने मालदा और मुर्शिदाबाद में पार्टी के सफाए के लिए धार्मिक आधार पर हुए ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराया है। वह कहते हैं कि इन दोनों जिलों में ऐसा माहौल बनाया गया था कि हिंदू हो तो भाजपा को वोट दो और मुस्लिम हो तो तृणमूल कांग्रेस को।

दूसरी ओर, वाममोर्चा अध्यक्ष विमान बसु ने कहा है कि चुनावी नतीजो पर वे संयुक्त मोर्चा के सहयोगी दलों के साथ विचार-विमर्श करेंगे। यह हमारे लिए एक सबक है। सीपीएम की पोलित ब्यूरो की ओर से जारी बयान में भी लेफ्ट की दुर्गति के लिए ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराया गया है। लेकिन सीपीएम नेता और दमदम उत्तर सीट के उम्मीदवार तन्मय भट्टाचार्य ने इसके लिए प्रदेश सीपीएम नेतृत्व को कठघरे में खड़ा किया है। उनका कहना है कि मोर्चा में पीरजादा की पार्टी आईएसएफ को शामिल करने से वोटरों में गलत संदेश गया है। हमें किसी सांप्रदायिक पार्टी का हाथ नहीं थामना चाहिए था।

भाजपा नेता जय प्रकाश मजूमदार कहते हैं कि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन अब बंगाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुका है। इसलिए वोटरों ने उनको खारिज कर भाजपा को अकेली विपक्षी पार्टी का दर्जा दिया है। लेकिन कई सीटों पर लेफ्ट व कांग्रेस के वोटरों ने तृणमूल की सहायता की है।

इसबीच, चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम का सूपड़ा साफ होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वे नहीं चाहती कि कोई पार्टी इस तरह साफ हो जाए। हमारे राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन बीजेपी के कुछ वोट इन दोनों को मिलते तो बेहतर होता।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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