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हम भगवान नहीं है! हम खाना नहीं देंगे तो क्या पक्षी भूखे मर जाएंगे?
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food for birds
- फोटो : अश्वनी शर्मा
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पक्षी और जानवर को खाना खिलाना पुण्य का काम है। पहली रोटी गाय को, दूसरे रोटी पक्षी को। यह सोच तो बहुत सही है। यह हमें सिखाती है कि हम अपने सिवाय औरों की भी सोचें। उन्हें दुख न पहुंचाएं। पर जब ऐसी बातें अंधविश्वास बन जाए तो यह पुण्य पाप में बदल जाता है। पहले समय में घर में गाय रखते थे और पहली रोटी उसे देते थे, कुत्ते को और पक्षी को भी थोड़ा सा दे दिया जाता था। परंतु अब शहरों का रूप बदल गया है न घर-आंगन में गाय है न घर की मुंडेर पर गौरैया।
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परंतु यह अंधविश्वास और भी ज्यादा बढ़ गया है। पहले समय में कुछ दाने पक्षियों को डालते थे। उन दिनों जनसंख्या कम थी और खिलने वाले और भी कम। उन दिनों अनाज बड़ी मुश्किल से खाने को पूरा होता था उसमें से थोड़ा मिल बांटकर खा लिया करते थे।
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पहले केवल नवाब लोग कबूतर-बाज़ी करते थे और कबूतर को दाना डालते थे। इतने अधिक कबूतरों के नज़ारे केवल पुरानी दिल्ली में देखने को मिलते थे परंतु अब तो जैसे पूरी दिल्ली कबूतरखाना बन गई है। अब जिसे देखो वो पुण्य काम कर रहा है या नवाब बन बैठा है।
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कुछ असर फिल्मों का भी है। अमरीश पुरी ने (डीडीएलजे ) कबूतरों को दाना डाला तो फिर शाहरुख खान ने अमरीश पुरी को ...तो हम कुछ कम हैं क्या? हिन्दी की कई फिल्मों में लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर में कबूतरों को दाना चुगते दर्शाया तो हम क्यों पीछे रहें? दिल्ली के हर चौराहे को ट्राफलगर स्क्वायर ना बना दें?
परंतु किसी ने यह तो बताया नहीं कि ट्राफलगर स्क्वायर या फिर लंदन में कहीं भी दाना डालने पर कई वर्षों से प्रतिबंध है और दाना डालने पर बहुत भारी जुर्माना होता है। यह इसलिए कि कबूतरों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि वह इंसानों में सांस की कई बीमारियों का कारण बने और घरों-इमारतों को बेहिसाब नुकसान पहुंचा रहे थे। आहार-शृंखला एक प्राकृतिक नियम है और उसी के चलते भगवान ने हर पशु-पक्षी को अपना खाना ढूंढने की क्षमता दी है।
परंतु हम कोई भगवान से कम हैं? हम खाना नहीं देंगे तो वो भूखे न मर जाएंगे। अरे! उनको क्यों निकम्मा कर रहे हो भाई? खुद तो फास्ट-फूड खाते हो उनको भी बिगाड़ रहे हो। मैदे की ब्रेड, कुरकुरे, तले हुए नमकीन और दाना...वाह क्या बात है! कीट-कीटाणु अब वो क्यों ढूंढेंगे? कीट-कीटाणु को कौन संयम में रखेगा? क्या पशु-पक्षियों की एक ही जाति को बढ़ावा देना सही है? क्या इससे असंतुलन नहीं बढ़ रहा? जो खाना डाला जा रहा है उससे कबूतरों की संख्या तो बढ़ ही रही है साथ में चूहे-गिलहरी के भी मजे हो रहे हैं और वह भी दिन दुनी-रात चौगुनी के हिसाब से बढ़ते चले जा रहे हैं। कुछ विचार करें।
लेखक के बारे में: मुझे अपने विवाहित जीवन में अनेकों सैन्य छाविनियों में रहने का अवसर मिला। पक्षियों से आकर्षित होने पर मैंने पक्षी और वृक्षों की जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किया। अब मैं प्रकृति संरक्षण और उसकी ओर जागरूकता बढ़ाने में परस्पर प्रयास करती हूं।
यह श्रृंखला 'नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशंस' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से संबंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।