कोरोना संकट: दुनिया में बच्चों के साथ लगातार बढ़ रही है हिंसा
पुर्तगाल के प्रधानमंत्री रह चुके संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतेरेश ने 29 जून को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक रिपोर्ट पेश की। 2020 में बच्चों की स्थिति पर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न देशों में चल रहे 21 लड़ाई-झगड़ों में, अकेले 2020 में, 19 300 बच्चों के मानवाधिकारों को रौंदने-कुचलने वाले 24 000 गंभीर मामले हुए।
बच्चों के साथ बलात्कार, उनके यौनशोषण और लड़ने-भिड़ने के लिए उन्हें ज़बर्दस्ती सेना में भर्ती करने के मामले घटने की जगह बढ़ते जा रहे हैं।
2020 में अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, यमन और सोमालिया जैसे देशों में, स्कूलों और अस्पतालों पर हुए हमलों में 8400 बच्चों और किशोर-किशोरियों की जानें गईं या वे गंभीर रूप से घायल हुए। क़रीब 7000 को ज़बर्दस्ती सेनाओं या लड़ाकू संगठनों में भर्ती किया गया।
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हम बड़े गर्व से बच्चें को अपना भविष्य कहते हैं, जबकि बाल-मज़दूरी और बच्चों के साथ हिंसा द्वारा उनके वर्तमान को अभिशप्त करते हैं। बच्चों का हाल दुनिया भर में इस समय बेहाल है। कोरोना वायरस वाली अंतहीन दिख रही महामारी के कारण ही नहीं, उससे पहले से ही।
इतना ज़रूर है कि कोविड-19 की मार ने आग में घी डालने का काम किया है। उन भाग्यहीन बच्चों की संख्या तेज़ी से बढ़ गई है, महामारी ने जिनके अब माता-पिता भी छीनकर उन्हें अनाथ बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र की, और उसकी बालकल्याण संस्था 'यूनिसेफ़' की इन्हीं दिनों प्रकाशित नवीनतम रिपोर्टें स्थिति को बहुत ही ''दहला देनें वाली और हृदयविदारक'' बताती है।
चौंकाती है ये रिपोर्ट
पुर्तगाल के प्रधानमंत्री रह चुके संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतेरेश ने 29 जून को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक रिपोर्ट पेश की। 2020 में बच्चों की स्थिति पर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न देशों में चल रहे 21 लड़ाई-झगड़ों में, अकेले 2020 में, 19 300 बच्चों के मानवाधिकारों को रौंदने-कुचलने वाले 24 000 गंभीर मामले हुए।
बच्चों के साथ बलात्कार, उनके यौनशोषण और लड़ने-भिड़ने के लिए उन्हें ज़बर्दस्ती सेना में भर्ती करने के मामले घटने की जगह बढ़ते जा रहे हैं।
2020 में अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, यमन और सोमालिया जैसे देशों में, स्कूलों और अस्पतालों पर हुए हमलों में 8400 बच्चों और किशोर-किशोरियों की जानें गईं या वे गंभीर रूप से घायल हुए। क़रीब 7000 को ज़बर्दस्ती सेनाओं या लड़ाकू संगठनों में भर्ती किया गया।
बच्चों के साथ बलात्कार और हर प्रकार की यौनहिंसा के मामले 70 प्रतिशत तथा उनके अपहरण के मामले 90 प्रतिशत बढ़ गए। स्कूलों और अस्पतालों पर हमलों की पहले से ही कहीं ऊंची संख्या भी घटने का नाम नहीं ले रही।
रिपोर्ट ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा टॉमस-ग्रीनफ़ील्ड को विचलित कर दिया। उन्होंने कहा कि 40 साल के अपने राजनयिक कार्यकाल में बच्चों से उन्होंने ऐसी-ऐसी आपबीतियां सुनी हैं कि यही कामना करती हैं किसी बच्चे पर कभी ऐसी न बीते। "बंदूक की नोक पर उन्हें ज़बर्दस्ती सेना में भर्ती किया जाता है और अपने ही भाई-बहनों या माता-पिता को मार डालने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। यही नहीं, बच्चे ही बच्चों की लाशें गिराते हैं!"
पश्चिमी अफ्रीकी देश बुर्कीना फ़ासो का उदाहरण देते हुए टॉमस-ग्रीनफ़ील्ड ने कहा कि वहां इसी जून महीने के शुरू में 12 से 14 साल के हथियारबंद बच्चों के एक गिरोह द्वारा 130 से अधिक सामान्य लोगों की हत्या करवाई गई।
अफ्रीका के साहेल मरुस्थल में पड़ने वाले सोहलान नाम के एक गांव में "बच्चों ने बच्चों की हत्या की।" टॉमस-ग्रीनफ़ील्ड ने इसी साल मई में काबुल के एक स्कूल को बम से उड़ा देने वाले उस कुकृत्य का भी उल्लेख किया, जिसने 90 से अधिक छात्राओं की बलि लेली।
बालमज़दूरी और कोरोना का संकट
बच्चों के साथ हिंसा और यौनदुराचार संबंधी रिपोर्ट से पहले, पिछले जून महीने में ही, संयुक्त राष्ट्र बालकल्याण संस्था 'यूनीसेफ़' ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन 'आईएलओ' के सहयोग से बालमज़दूरी के बारे में एक अलग रिपोर्ट प्रकाशित की।
इस रिपोर्ट का कहना है कि बालमज़दूरी 20 साल बाद पहली बार पूरे विश्व में बढ़ती हुई दिख रही है। अपने बचपन में ही मेहनत-मज़दूरी करने के लिए विवश बच्चों की संख्या अब 16 करोड़ हो गई है।
पिछले चार वर्षों में उन बच्चों की संख्या में 84 लाख की वृद्धि हुई है, जिन्हें मज़दूरी करनी पड़ रही है। कोरोना महामारी के कारण जिन लोगों को आर्थिक तंगी या बेरोज़गारी का सामना करना पड़ रहा है, अब उनके बच्चों को भी मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ सकती है। इससे बालमज़दूरी की रोकथाम के लिए पिछले 20 वर्षों के प्रयासों से मिली सफलताओं पर अब पानी फिर जायेगा।
'यूनीसेफ़' की रिपोर्ट का सच
'यूनीसेफ़' की इस रिपोर्ट का कहना है कि 2000 से 2016 के बीच पूरे विश्व में बालमज़दूरी में लगे लड़के-लड़कियों की संख्या में 94 लाख की कमी आई थी। उन बालमज़दूरों की संख्या सबसे अधिक घटी थी, जो 5 से 11 साल के बीच की आयु वाले थे। बालमज़दूरी करने वाले सभी बच्चों के बीच उनका अनुपात अब आधे से भी अधिक हो गया है।
5 से 17 साल के वे बच्चे, जिन्हें ख़तरनाक़ क़िस्म के काम करने पड़ते हैं, उनकी संख्या 2016 में 65 लाख से बढ़ कर अब 79 लाख हो गई है। उन्हें ऐसे काम करने पड़ते हैं, जो उनकी सुरक्षा तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ख़तरनाक समझे जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ग़रीबी और बालमज़दूरी के बीच सीधा संबंध है। बालमज़दूरी तभी घट सकती है, जब ग़रीबी भी घटे।
ग़रीबी तभी घट सकती है, जब आर्थिक प्रगति हो और लोगों की आय बढ़े। यानी जब विश्व के राजनेता जनता के हितों को, न कि अपनी स्वार्थपूर्ति को सबसे ऊपर रखें। 'यूनीसेफ़' को डर है कि कोविड-19 महामारी 2022 के अंत तक विश्व में 90 लाख नए बच्चों को बालमज़दूर बना देगी। जो बच्चे पहले से ही मेहनत-मज़दूरी कर रहे हैं, उनके काम-धंधे की परिस्थितियां और अधिक बिगड़ सकती हैं।
यह स्थिति अफ्रीकी देशों में विकराल रूप धारण कर सकती है। वहां पिछले कुछ ही वर्षों में मेहनत-मज़दूरी करने वाले लड़कों-लड़कियों की संख्या में एक करोड़ 66 लाख की बढ़ोतरी हुई है। अफ्रीका के 70 प्रतिशत ऐसे बच्चे
खेती-किसानी के क्षेत्र में, 20 प्रतिशत सेवा (सर्विस) क्षेत्र में और 10 प्रतिशत कल-कारखानों में काम करते हैं। काम करने वाले एक-तिहाई बच्चे पढ़ाई-लिखाई से वंचित रह जाते हैं। जहां तक भारत का प्रश्न है, तो 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में उस समय 5 से 14 साल के बच्चों की कुल संख्या 25 करोड़95 लाख 40 हज़ार थी। उनमें से एक करोड़ एक लाख
बालमज़दूरी कर रहे थे। अनुमान है कि इस समय भारत में बच्चों की कुल संख्या 47 करोड़ 20 लाख है। उनमें से कितने बलमज़दूरी करते हैं, इस बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह शिकायत अवश्य की जाती है कि भारत की जनसंख्या में बच्चों का अनुपात क़रीब 40 प्रतिशत है, पर भारत के 2021-22 के केंद्रीय बजट में उनके विकास और कल्याण के लिए केवल 2.46 प्रतिशत का प्रावधान हैं।
यह राशि बहुत कम हो सकती है, पर यह भी नहीं भूल जाना चाहिये कि बच्चों का विकास और कल्याण, उनकी शिक्षा-दीक्षा और रोज़गार भारत की राज्य सरकारों का भी दायित्व है। क्या वे अपना दायित्व पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभा रही हैं?
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