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रशीद ईरानी का जाना: बेहद खामोशी से चला गया विश्व सिनेमा का दीवाना और एक कविता प्रेमी

Wed, 04 Aug 2021 12:04 PM IST
Vijay kumar विजय कुमार
Updated Wed, 04 Aug 2021 12:04 PM IST
सार

हिंदी फिल्मों और विश्व सिनेमा के गहरे जानकार, समीक्षक, साहित्य और कविता प्रेमी रशीद ईरानी नहीं रहे। उनकी मृत्यु गुमनामी में हुई। मुंबई प्रेस क्लब में हमेशा दिखाई देने वाला एक शख्स जब अचानक से नहीं दिखा तो चिंता लाजमी थी और वही हुआ जिसका डर था।

रशीद भाई फिर कभी प्रेस क्लब नहीं लौटे। उनकी मृत्यु एक दुखद और गुमनाम अंत थी। वे 30 जुलाई को बाथरूम में मृत पाए गए और उनके नहीं रहने की सूचना तीन दिन बाद दुनिया को पता चली। 

रशीद भाई, मुंबई  और उनका ईरानी रेस्तरां ब्रेबोर्न मुंबई का धड़कता हुआ अतीत था जो आज एक इतिहास बन गया है। वरिष्ठ स्तंभकार और मुंबई पर सालों से लिख रहे लेखकविजय कुमार ने उन्हें कुछ इस तरह याद किया है..!  

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veteran film critic rashid irani life and memories
रशीद ईरानी अपने रेस्तरां ब्रेेबोर्न में। उनके रेस्तरां में नामी फिल्म निर्देशक, लेखक और दिग्गज पत्रकारों का आना-जाना लगा रहता था। - फोटो : सोशल मीडिया से साभार

विस्तार

अलविदा रशीद भाई !

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आज सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया में तुम्हारे जाने की खबर पढ़ी और स्तब्ध रह गया हूं। पिछ्ले तीन दशकों की वह तुमसे दुआ-सलाम। गिरीश दमानिया भी तो इसी तरह से सहसा चले गए थे। हर आदमी एक कहानी है, या शायद कभी समझ आती और कभी उलझी रह जाती एक कविता। माना कि तुमने कोई घर-बार बसाया नहीं। और वह कैसा अजीब सा ' पैशन' था तुम्हारी ज़िन्दगी में। एक गहरी तनहाई का जीवन। वहां मरिन लाइन्स के तुम्हारे उस घर में साथ देने के लिए तुम्हारे चारों ओर सिर्फ कविता की किताबें ही किताबें थीं। और सिनेमा का वह एक विश्व- संसार, और थोड़े से दोस्त और बहुत सारी गपशप। लेकिन भला इस तरह से भी कोई जाता है क्या! तुम अचानक चले गए और फिर कई दिनों बाद तुम्हारे पार्थिव अवशेष तुम्हारे घर में मिलते हैं। यह कोई बात हुई..!

याद आता है जब मशहूर इसराइली कवि यहूदा अमीखाई फरवरी 1993 में मुम्बई आए थे तब एक शाम यशवंत राव चव्हाण प्रतिष्ठान सभागार की टैरेस पर हुए उनके उस काव्य-पाठ कार्यक्रम में पहली बार गिरीश दमानिया के मार्फत तु्मसे मुलाकात हुई थी। बाद की मुलाकातों में तुम्हारे उस अतिशय विनम्र , अंतर्मुखी और अल्पभाषी व्यक्तित्व को जानने के अवसर मिलते रहे। तुम विश्व सिनेमा के गहरे जानकार थे।
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कई दशकों तक ' टाइम्स ऑफ इंडिया' और बाद में ' हिन्दुस्तान टाइम्स ' में विदेशी फिल्मों की समीक्षा लिखते रहे। लेकिन इस सब से कहीं बढ़कर था तुम्हारा वह अद्भुत कविता- प्रेम ! विश्व- कविता के किस प्रख्यात कवि की किताब नहीं थी तुम्हारे खज़ाने में ! वह सीधे सीधे कहा जाए तो एक दीवानगी ही तो थी।

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किताबों-फिल्मों की दुनिया और रशीद भाई  

सैंकड़ों किताबें और पत्रिकाएं तुमसे उधार मांगकर पढ़ीं। कविता पुस्तकों की तलाश में तुम्हारे साथ इस शहर में जैको, दानाई ,क्रॉसवर्ड, लोटस, स्ट्रेंड, न्यू एंड सेकंड हैंड बुक स्टॉल, स्मोकर्स कॉर्नर, किताबखाना, वेवर्ड और फुटपाथ पर पुरानी दुर्लभ किताबें सजाए बैठे उन बहुत से पुस्तक- विक्रेताओं के पास जाने के कुछ दुर्लभ अनुभव स्मृति में बसे हुए हैं।


और कैसा विरोधाभासों से भरा जीवन था तुम्हारा। एक तरफ तुम विदेशी फिल्मों का चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया थे। फिल्म समीक्षा के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम थे और दूसरी अरफ आजीविका के लिए धोबीतलाब पर एक लम्बे समय तक अपना ईरानी रेस्त्रां ‘ ब्रेबॉर्न कैफे’ चलाते रहे। वह रेस्त्रां जिसमें कभी प्रसिद्ध कवि निसीम इज़ाकेल और इयुनिस डिसूज़ा भी आकर बैठकी जमाते थे और पत्रकार अनिल धारकर भी। और उस तरह के बीसियों लोग।

फिल्मकार सागर सरहदी और कविता-प्रेमी अपने उस बुजुर्ग दोस्त गिरीश दमानिया के साथ तुम्हारे उस ईरानी रेस्त्रां में घंटों हुई आत्मीय गपशप हमेशा याद आती रहेगी। दमानिया जी और रशीद भाई आप दोनों मुझे विश्व कविता की दुनिया में भटकते हुए कोलम्बस की तरह से लगते थे। लेकिन अब तो सिर्फ यादें बची हैं। तुम छोड़ गए हो अपने पीछे बहुत सारी किताबें, बहुत सारी बहसें, बहुत सारी जानकारियां, बहुत सारी गपशप और बहुत सारी सम्बन्धों की उष्मा।

 

तुम्हारे इस तरह से जाने पर मुझे प्रख्यात पोलिश कवि चेश्वाव मिवोश की वे पंक्तियां याद आ रही हैं-

I was to be redeemed by the gift of arranging words
But must be prepared for an earth without grammar
मैं बहुत सारी कविता पुस्तकें खोलूंगा और तुम अक्सर याद आते रहोगे रशीद भाई ।


नमन..!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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