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ऋषि कपूर: दिग्गजों के बीच अपनी जगह बनाने की कहानी, उर्फ फिल्मी दुनिया का राहुल द्रविड़

Thu, 30 Apr 2020 03:13 PM IST
Sachin Shrivastava सचिन श्रीवास्तव
Updated Thu, 30 Apr 2020 03:13 PM IST
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veteran actor rishi kapoor passed away life and importance in bollywood
बतौर कलाकार ऋषि कपूर के साथ हमेशा लगता रहा कि उनका सर्वश्रेष्ठ आना अभी बाकी है। - फोटो : सोशल मीडिया

कहावत है कि दुख और मुसीबत अकेले नहीं आते, अपने भाई-बहनों को साथ लेकर आते हैं। हम सभी जो सिनेमा को अपना धर्म और सिनेमाई दुनिया के किरदारों को अपना देवता मानते हैं, उनके दो अजीज शख्स एक ही दिन इस दुनिया से विदा हो गए।

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हर कलाकार की तरह इरफान साहब और ऋषि जी अपने पीछे बहुत सारी यादें छोड़ गए हैं, जिनके जरिए वे रुलाते हैं, हंसाते हैं, अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाते हैं और हमारे निजी दुखों को कुछ देर के लिए हमसे दूर ले जाते हैं।
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अपने-अपने ढंग से सभी कलाकार यही करते हैं। कपूर खानदान की चौथी पीढ़ी के सबसे बड़े सितारे ने भी यही किया। लेकिन वह क्या है जो उन्हें खास बनाता है, वह क्या है, जो उन्हें बाकी सबसे अलग करता है, जो उनका जाना ज्यादा कचोट रहा है।

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ऋषि जी ने अभी कुछ दिन पहले उन्होंने अग्निपथ में रउफ लाला बनकर चौंकाया था, तो 102 नॉट आउट में बाबूलाल के रूप में भी छाप छोड़ी और फिर मुल्क में एक नया ही वितान रच डाला। हम उम्मीद कर रहे थे कि वे फिर चौंकाएंगे, लेकिन इस तरह तो नहीं।


मैंने जब ऋषि कपूर को जाना उस वक्त मेरी उम्र शायद आठ या नौ बरस की रही होगी। उस वक्त नए कलाकारों की शक्ल देखने का सबसे आसान रास्ता चित्रहार हुआ करता था, लेकिन दिक्कत यह थी कि बुधवार और शुक्रवार को हम बच्चों को सीवी रमण या शम्मी नारंग की आवाज में समाचार सुनने में ज्यादा रुचि होती नहीं थी और उसके ठीक बाद आने वाले पांच गानों को घर के बुजुर्ग ठीक से इंज्वाय नहीं करने देते थे।


मुझे आज भी याद है कि उस वक्त चांदनी फिल्म का गीत रंग भरे बादल पे... जब पहली बार देखा था, तो हम दोस्त कई दिनों तक घुटनों को मोड़कर हाथ आगे करते हुए कलम से लिखने की एक्टिंग करते हुए गुनगुनाते थे लिख दिया तेरा नाम... और नाम अलग-अलग होते थे। सबकी जुबान पर।


श्रीदेवी के साथ बर्फीली वादियों में इश्क लड़ाते ऋषि की छवि अपनी सी लगी थी। मारधाड़, गोलियों और गाली-गलौच वाली डॉयलॉग बाजी के बीच ऋषि की सामान्य सी बातें बहुत लुभाती थीं। वे गुंड़ों को एक ही मुक्के में कई फीट दूर तक नहीं उड़ा देते थे, बल्कि गुत्थम गुत्था होते थे। बिल्कुल हमारी गांव की असली लड़ाइयों की तरह। यह बात हमें ऋषि कपूर के करीब लाती थी।


और अभी जब ऋषि कपूर को ट्विटर पर अपनी बेबाक राय रखते हुए देखा करते थे, तो यही लगता था कि हां अपनी बात को ऐसे ही कहना चाहिए। वे बहुत ब्लंट होकर भी ट्विटर पर लिखते थे, ट्रोल का निशाना भी बने। और फिर लगा कि हां, ऐसा ही होना चाहिए इंसान। अपनी बात को पूरे आवेग के साथ कहने वाला।

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असल में ऋषि कपूर उन कलाकारों में शुमार हैं, जिनका फिल्म इंडस्ट्री ने सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया। - फोटो : फाइल फोटो

असल में ऋषि कपूर उन कलाकारों में शुमार हैं, जिनका फिल्म इंडस्ट्री ने सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया। 70 के जिस दशक में वे फिल्मी पारी खेलने के लिए उतरे उस वक्त राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, विनोद खन्ना आदि सितारों का दौर था और अमिताभ अपने पूरे वेग के साथ बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाए हुए थे। इस दौर में एक चॉकलेटी चेहरे वाले सामान्य कद काठी के ऋषि कपूर का दर्शकों के दिल में जगह बनाना एक अहम घटना है।
 

अगर आप क्रिकेट के दर्शक हैं, तो यह कुछ कुछ वैसा ही है कि 90 के दशक में सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली की धुआंधार बल्लेबाजी के बीच राहुल द्रविड़़ अपनी धीमी और सधी हुई पारियों के जरिए खेल प्रेमियों को मंत्र मुग्ध कर रहे थे।


इस बारे में वरिष्ठ लेखक और फिल्म समीक्षक अजय ब्रम्हात्मज कहते हैं कि उस दौर में अमिताभ बच्चन के सामने किसी और का टिक पाना आसान नहीं था। बल्कि कोई ठीक से टिक भी नहीं पाया।

इसमें महज ऋषि कपूर ही थे जो अपनी अलग फैन फॉलोइंग बरकरार रखे रहे, इसीलिए उन्हें सदाबहार कहा जाता था। अमिताभ के इस दौर में एक रोमांटिक छवि के लीड एक्टर की जरूरत थी, जिसे ऋषि कपूर ने पूरा किया।

70 और 80 के दशक में ज्यादातर दर्शक एक्शन फिल्में देख रहे थे, इसलिए बहुत ज्यादा हिट भले ही ऋषि कपूर ने नहीं दीं, लेकिन वे लगातार अपनी राह बनाते रहे।

अजय बताते हैं कि ऋषि कपूर ने उस दौर में फैशन ट्रेंड बदलने में बड़ी भूमिका निभाई इसमें चौड़े पैंचे के बैलबॉटम हों, स्ट्रीप स्वेटर, हाफ स्वेटर, घुटनों तक जाने वाला उनी मफलर ये सभी ऋषि कपूर के कारण ट्रेंड में आए। बाल उनके कर्ली थे, इसलिए बालों की नकल जरूर नहीं हो पाई।

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फिल्म बॉबी, मेरा नाम जोकर का कर्ज उतारने के लिए बनाई गई थी। - फोटो : सोशल मीडिया

ऋषि कपूर के बतौर लीड एक्टर फिल्मी करियर को अगर दो हिस्सों में बांटकर देखे तो दिलचस्प तथ्य निकलकर आते हैं।1973 से 1997 के बीच उन्होंने 51 सोलो लीड फिल्में कीं। इनमें बॉबी, लैला मजनूं, रफू चक्कर, सरगम, कर्ज, प्रेम रोग, नगीना, हनीमूल, बंजारन, हिना और बोल राधा बोल जैसी फिल्में शुमार हैं, जिन्होंने ऋषि कपूर की सितारा छवि को गढ़ा।

इसी बीच उन्होंने 40 से ज्यादा मल्टी स्टारर फिल्में कीं, जिनमें वे दूसरे या तीसरे नंबर के हीरो थे। इनमें से ज्यादातर हिट रहीं। दिलचस्प यह भी है कि जिस नीतू-ऋषि कपूर की जोड़ी को हिट जोड़ी माना जाता है, असल में इस जोड़ी की मल्टी स्टारर फिल्में ही हिट हुईं हैं।

ऋषि कपूर -नीतू जब सिंगल लीड में आए यानी जहरीला इंसान, जिंदा दिल, दूसरा आदमी, अंजाने में, झूठा कहीं का, धन दौलत तो उन्हें दर्शकों ने नकार दिया था।

वहीं मल्टी स्टारर खेल-खेल में, कभी-कभी, अमर-अकबर-एंथनी, पति-पत्नी और वो, दुनिया मेरी जेब में जैसी फिल्में बॉक्स आफिस पर सफल रही। ऋषि कपूर-नीतू के खाते में सोलो हिट की बात करें तो महज रफू चक्कर ही दर्ज है।

मल्टी स्टारर फिल्म में खतरा यह होता है कि तालियां कई बार किसी एक कलाकार के खाते में जाती हैं, और बाकी के किरदार को उतनी तारीफ नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए। ऋषि कपूर ने इस खतरे को उठाया और अपनी जगह बनाई।

जैसे घर-परिवार और जमाना में राजेश खन्ना के किरदार को ज्यादा सराहना मिली, तो वहीं सागर में कमल हासन की एक्टिंग के आगे ऋषि कपूर फीके लगे। वहीं दुनिया में दिलीप कुमार और प्राण जैसे दिग्गजों के आगे ऋषि कपूर दब गए।

और अंत में...

किसी सितारे के बेटे के फिल्मी कॅरियर की उठान को देखते हुए यह मान लिया जाता है कि उसके लिए उसके पिता ने या परिवार ने फिल्म बनाई होगी।

ऋषि कपूर के साथ भी ऐसा ही हुआ। आम धारणा है कि बॉबी ऋषि कपूर को लांच करने के लिए बनाई गई थी। लेकिन खुद ऋषि कपूर  ने बताया है कि असल में बॉबी का निर्माण मेरा नाम जोकर का कर्ज उतारने के लिए किया गया था।

इसके लिए राज कपूर एक लव स्टोरी बनाना चाहते थे, लेकिन उनके पास राजेश खन्ना को साइन करने लायक पैसे नहीं थे। इसलिए कहानी को एक किशोर की प्रेम कहानी का रूप देकर ऋषि कपूर को लीड एक्टर के तौर पर लिया गया। उसके बाद की कहानी आप सभी को मालूम ही है, जो इतिहास में दर्ज है। राजा की मासूम प्रेम कहानी को कैसे भूला जा सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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