वट सावित्री पर्व: आस्था और विज्ञान के सामंजस्य का अनोखा पर्व, ताकि...
वैदिक संस्कृति में प्रकृति से हम जो कुछ भी अपने दैनिक जीवन के उपयोग के लिए प्राप्त करते हैं, उसके प्रति प्रार्थना निवेदित करना, कृतज्ञता ज्ञापित करना और श्रद्धा भाव अर्पित करना हम अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं।
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वैदिक संस्कृति में प्रकृति से हम जो कुछ भी अपने दैनिक जीवन के उपयोग के लिए प्राप्त करते हैं, उसके प्रति प्रार्थना निवेदित करना, कृतज्ञता ज्ञापित करना और श्रद्धा भाव अर्पित करना हम अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं। पौराणिक कथाओं में आसपास की नदियों, तालाबों, सरोवरों, वृक्षों-वनस्पतियों को आस्था-श्रद्धा से जोड़ने के पीछे शायद यही मान्यता रही हो कि इन्हें किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुंचाई जाए। यजुर्वेद में वृक्षों- वनस्पतियों और औषधियों के लिए आदरसूचक शब्द कहने का भी शायद यही मंतब्य रहा हो। इस लिए-
'वनानां पत्तये नमः। वृक्षणां पत्तये नमः। ओषधिनां पत्तये नमः' की स्तुति की गई है।
ऋग्वेद में वैदिक ऋषि वृक्षों के संरक्षण को लेकर कहते हैं- जिस प्रकार दुष्ट बाज पक्षी दूसरे पक्षियों की गर्दन मरोड़कर उन्हें दुःख देता है और उन्हें मार डालता है, तुम वैसा ना करो। इन वृक्षों का उच्छेदन न करो, क्योंकि ये वृक्ष जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों को शरण देते हैं।
"अथर्वा मैं वही वन हूं" के लेखक प्रोफेसर आनंद अपनी एक कविता में कहते है कि -
वृक्ष हैं हम: हम समय के वृक्ष हैं स्थावर:
फिर एक शिलालेख अलिखित भविष्य के
छुपाये हुए रखते हैं अनन्त रहस्य को!
अवशोषित करता है जीवन का क्रूर हलाहल
वृक्ष हैं हम: चेतना की साधना हैं अंतहीन
सिक्त करते हैं अमृत तरंगों से इस पृथ्वी को
पर हम वृक्ष हैं, समय पर उगते ही रहते हैं
धरती के भीतर बनाते रत्नकोश।
शतपथ ब्राह्मण में वनस्पतियों को 'पशुपति' की संज्ञा दी गई है। मतलब यह कि वृक्ष-वनस्पतियां अमृत रूपी ऑक्सीजन को प्राणिजगत के प्राणियों को प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं। इसलिए पृथ्वी पर अधिक से अधिक वृक्षारोपण बढ़ाने को कहा गया है।
इससे प्रदूषण कम होगा और प्राणवायु आक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होगी। 'नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो'।
वृक्ष प्राणिजगत के लिए 'नीलकंठ' का काम करते हैं। वायुमंडल में व्याप्त विष रूपी 'कार्बन डाइऑक्साइड' सोख लेना और 'ऑक्सीजन' रूपी अमृत को प्राणिजगत के लिए उपलब्ध कराना, वृक्षों- वनस्पतियों के वजह से ही संभव होता है।
वृक्षों के पूजन की पौराणिक मान्यताएं
प्राचीन काल से पीपल, बरगद, नीम, पाकड़ और आंवला की पूजा का विधान हमारे पौराणिक कथाओं में मिलता है। मसलन ज्येष्ठ अमावस्या को 'वटवृक्ष' की पूजा की जाती है, अक्षय नवमी को आंवला के वृक्ष की पूजा और शीतलाष्टमी के दिन नीम के वृक्ष की पूजा का विधान किया गया।
यहीं नहीं हर वृक्ष की पूजा को किसी न किसी पौराणिक कथा से भी जोड़ा गया है। 'वटसावित्री पर्व' लोकजीवन में 'बरगदाही अमावस्या' के नाम से भी प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान को अपनी तपस्या के बल पर यमराज से मृत्यु के चंगुल से वटवृक्ष के नीचे पुनर्जीवित किया। इस वजह से स्त्रियां अपनी पति की दृघायु की कामना और अखंड पतिव्रता जीवन प्राप्त करने के लिए इस तिथि को व्रत रखती हैं और वटवृक्ष की पूजा इस मंत्र के पाठ से करती हैं -
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाघ्र्यं नमोस्तु।
इस पार्थना में आगे कहा गया है कि जैसे वटवृक्ष अपनी शाखाओं-प्रशाखाओं के जरिए निरन्तर वृद्धि को प्राप्त करता है, उसी प्रकार मैं भी पुत्र-पौत्रों से सदा सम्पन्न रहूं।
सनातन परंपरा में वृक्षों के अलावा लोककल्याण के लिए कुओं का निर्माण भी एक पुण्य कार्य माना जाता है। कुओं के आसपास आमतौर पर पांच तरह के पेड़, बरगद-पीपल- पाकड़, नीम और आंवला के वृक्ष लगाए जाते हैं, ताकि किसी पथिक, पशु-पक्षी-जानवर को छाया के साथ-साथ गर्मी के दिनों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की खुराक मिले और जल पीने के बाद आगे की यात्रा सम्भव हो सके।
ये सभी वृक्ष अन्य वृक्षों की अपेक्षा कई गुना ज्यादा ऑक्सीजन प्राणवायु के रूप प्राणिजगत को एक तरह से मुफ्त में उपलब्ध कराते हैं। कुएं के पास बरगद के पेड़ लगाए जाने के महत्व को बताते हुए पर्यावरणविद् प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता बताते हैं कि "कुएं के पास बरगद का पेड़ इसलिए लगाये जाते हैं कि इसकी जड़ों में जलस्रोत रिचार्ज करने की अद्भुत क्षमता है। बरगद का पेड़ अन्य वृक्षों की तुलना में पांच गुना अधिक ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।
इसके अलावा दो सौ मीटर के एरिया को यह वृक्ष शीतल रखने में सक्षम है।" हमारे ऋषियों ने इस कारण भी वृक्षों को धर्म और आस्था से जोड़ा है, ताकि आमजन निष्ठापूर्वक इनका संरक्षण करें। आयुर्वेद का मत है कि इन वृक्षों में औषधीय गुणों के कारण भी हमारे जीवन में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। इनके छाल और पतों से वमन-ज्वर, कफ-पीत मूर्च्छा जैसे बीमारियों की औषधियां तैयार की जाती हैं।
इस वजह से वृक्षों के पौराणिक, आयुर्वेदिक और पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए पर्व-त्योहार के बहाने ही सही, संरक्षण के उपाय पूरे प्राणिजगत के लिए अत्यंत आवश्यक है। वटसावित्री पर्व को भी इसी नाते खूब धूमधाम से मनाने की परंपरा युगों-युगों से चली आ रही है। हम आज पर्यावरण प्रदूषण और धरती के बढ़ते तापमान की वजह से जिन समस्याओं से रु-ब-रु हैं, ऐसी परिस्थितियों 'वट सावित्री पर्व' के अवश्य सबक लेना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।