'गहने-वहने, पायल, नथ सब सुनार के पास रखवा दिया है... अब 290 रुपया बचा है, जब बहुत समेटकर चलिथ है'
Uttarkashi Tunnel Rescue Operation: ईश्वर के साथ ही अब वो वक्त आ गया है जब हम लोगों को पहाड़ों से माफी मांग लेनी चाहिए। हमें विकास चाहिए लेकिन किस कीमत पर और कहां पर, इस पर एक बार फिर से सोचने की आवश्यकता है।
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ये गंदगी तो महल वालों ने फैलाई है साहब,
वरना गरीब तो सड़कों से थैलियां तक उठा लेते हैं।
ये ब्रेकिंग न्यूज, वो ब्रेकिंग न्यूज, अब बस कुछ ही समय में मजदूर सुरंग से बाहर आने वाले हैं। अब यहां से मशीन मंगाई गईं जो काम नहीं कर सकी वो वहां से मशीन मंगाई गई थी। इन सबके बीच कुछ चेहरे जिन्होंने पहली बार देखा कि कैसे खबरें देश दुनिया तक पहुंचती हैं। जिनको मौका मिला वो अपना माइक गरीब के मुंह तक ले जाने को बेकरार दिखे। इसी बीच सुरंग में फंसे एक बेटे का पिता अपनी झुर्रियों में अपने तमाम उम्र के दर्द और तजुर्बे को समेटे उस गुफा के बाहर खड़ा है जहां उसका बेटा पहाड़ की नाराजगी का शिकार हो गया।
वो बेटा जो बस मजदूरी करने आया था उसे नहीं मालूम था कि पहाड़ आजकल बहुत नाराज चल रहे हैं। दीपावली वाले दिन घर पर बेटे की आस लगाए पिता को पता चलता है कि जिस सुरंग में उनका बेटा काम कर रहा था, पहाड़ ने उसे बनाने से मना कर दिया और उनके बेटे को अपने आगोश में ले लिया।
वो तुरंत घर में रखे चांदी के बने गहने-वहने, पायल, नथ सबको लेकर सुनार के पास पहुंचता है और वहां से 9000 रुपये लेकर चल पड़ता है, उस पहाड़ से सवाल करने कि आपने मेरे बेटे को गलत अपने पास रख लिया, उसे मुझे वापिस लौटा दीजिए। ऐसे में जब उससे एक रिपोर्टर सवाल पूछता है कि आप यहां तक कैसे पहुंचे? चेहरे पर पूरी उम्मीद और सहजता के साथ वो कहता है- "साहब, गहने-वहने, पायल, नथ सब सुनार के पास रखवा दिया है। 9000 रुपये लेकर चला था अब 290 रुपया बचा है, कम से कम खर्च करने के बाद भी अब इतना ही बचा है।
भगवान की कृपा है, महादेव के आशीर्वाद से अब बेटा निकल आया और अब वो उसे अपने गांव लेकर जाना चाहता है । इसी बीच रिपोर्टर उससे सवाल करता है कि आप बड़े खुश रहते हैं तो वह कहता है कि हम तो 24 घंटे खुश रहते हैं साहब। आप इस पिता को सुनेंगे तो शायद आपके खुश रहने की परिभाषा बदल जाए। अब तो बाबा से यही प्रार्थना है कि इस पिता और अपने बेटे को हमेशा खुश रखे।इनके साथ ही उन सबको जो 17 दिनों से रोज तिल-तिल कर उम्मीद से सुरंग में काम करने वालों को भगवान की तरह देख रहे थे।
वहीं उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक मां दिन-रात मोबाइल पर आंख गढ़ाकर बैठी थी। मंगलवार को जैसे ही खबर मिली कि सुरंग में फंसे श्रमिकों को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू हो गई है तो बेटे के इंतजार में गुमसुम बैठी मां का चेहरा चमक उठा। ईश्वर ने भी आखिर सुन ली और उनकी उम्मीद को खुशियों में बदल दिया। ईश्वर के साथ ही अब वो वक्त आ गया है जब हम लोगों को पहाड़ों से माफी मांग लेनी चाहिए। हमें विकास चाहिए लेकिन किस कीमत पर और कहां पर, इस पर एक बार फिर से सोचने की आवश्यकता है।
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