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Uttarakhand Government: उत्तराखंड में नीतिगत निरंतरता और कड़े फैसलों का प्रभाव

Tue, 23 Jun 2026 08:00 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 23 Jun 2026 08:00 AM IST
सार

किसी भी सरकार का आकलन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उन नीतिगत फैसलों से किया जाना चाहिए जो राज्य की प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक दिशा को प्रभावित करते हैं।

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Uttarakhand Government: impact of policy continuity and tough decisions in Uttarakhand
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी। - फोटो : संवाद

विस्तार

उत्तराखंड जैसे भौगोलिक, सामाजिक और पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य का नेतृत्व करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। राज्य गठन के बाद बीते 26 वर्षों में दस मुख्यमंत्री सत्ता में आए और सभी ने अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के अनुरूप विकास की दिशा तय करने का प्रयास किया।

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इनमें स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी का औद्योगिक और आधारभूत ढांचा विकास विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। किंतु मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल इस दृष्टि से अलग दिखाई देता है कि इसमें कई ऐसे निर्णय लिए गए, जिन्हें राजनीतिक जोखिम के कारण लंबे समय तक टाला जाता रहा था।
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किसी भी सरकार का आकलन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उन नीतिगत फैसलों से किया जाना चाहिए जो राज्य की प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक दिशा को प्रभावित करते हैं।
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धामी सरकार की सबसे चर्चित और दूरगामी पहल देश की पहली समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करना रही है। इसकी संवैधानिक वैधता और व्यावहारिक पक्ष पर बहस जारी है, किंतु यह निर्विवाद है कि उत्तराखंड ने इस विषय पर राष्ट्रीय विमर्श का नेतृत्व किया।

विविध सामाजिक समूहों वाले राज्य में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे संवेदनशील विषयों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना आसान कार्य नहीं था। इस पहल ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर एक नीति-प्रयोगशाला के रूप में स्थापित किया है और कई अन्य राज्यों ने भी इस दिशा में रुचि दिखाई है।

युवाओं के भविष्य और प्रशासनिक विश्वसनीयता से जुड़ा नकल विरोधी कानून भी इसी श्रेणी का निर्णय माना जा सकता है। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं ने लंबे समय तक युवाओं का विश्वास कमजोर किया था।

कठोर दंडात्मक प्रावधानों वाले इस कानून के बाद भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी और समयबद्ध हुई है। हजारों पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ने से युवाओं में व्यवस्था के प्रति भरोसा पुनर्स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है।

महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने का निर्णय केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं है, बल्कि पहाड़ों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी माध्यम है। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कृषि, जल-संरक्षण और पारिवारिक अर्थव्यवस्था की मुख्य आधार हैं। रोजगार के अवसर बढ़ने से स्थानीय स्तर पर आर्थिक स्थिरता और पलायन नियंत्रण में भी सहायता मिल सकती है।

कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक दृढ़ता के संदर्भ में धर्मांतरण विरोधी कानून को और कठोर बनाना, अवैध अतिक्रमणों के विरुद्ध अभियान चलाना तथा माफिया और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई सरकार की एक स्पष्ट नीति के रूप में सामने आई है।

समर्थक इसे कानून के शासन की स्थापना मानते हैं, जबकि आलोचक इसके सामाजिक प्रभावों पर प्रश्न उठाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी बहसें स्वाभाविक हैं, किंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सरकार ने इन विषयों पर निर्णय लेने से परहेज नहीं किया।

धामी सरकार के कार्यकाल की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि समान अवसर और स्थानीय हितों की रक्षा से जुड़ी है। राज्य आंदोलन की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सेवाओं में स्थानीय युवाओं की भागीदारी बढ़ाने और निवेश परियोजनाओं में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इससे राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्यों को नई प्रासंगिकता मिली है।

आर्थिक मोर्चे पर यदि देखा जाए तो उत्तराखंड की कनेक्टिविटी में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, चारधाम ऑल-वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, विस्तारित हेली सेवाएं तथा सीमांत क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क का विस्तार राज्य की विकास रणनीति के प्रमुख घटक हैं। इन परियोजनाओं का प्रभाव केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि उत्पादों के विपणन, आपदा प्रबंधन और रक्षा दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगा।

निवेश आकर्षित करने के लिए आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट ने भी उत्तराखंड को राष्ट्रीय निवेश मानचित्र पर अधिक प्रमुखता से स्थापित किया। निवेश समझौतों को धरातल पर उतारना अभी चुनौती बना हुआ है, लेकिन औद्योगिक, पर्यटन, ऊर्जा और सेवा क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं ने राज्य की आर्थिक आकांक्षाओं को नई गति दी है।

इसके साथ ही नई औद्योगिक नीतियों, स्टार्टअप प्रोत्साहन और पर्यटन आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने के प्रयास भी उल्लेखनीय हैं।

पर्यटन क्षेत्र में सरकार ने पारंपरिक धार्मिक पर्यटन से आगे बढ़कर विंटर टूरिज्म, साहसिक पर्यटन, होम-स्टे मॉडल, सीमांत पर्यटन और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की रणनीति अपनाई है। यदि यह प्रयास दीर्घकाल तक जारी रहे तो पर्यटन का लाभ केवल कुछ शहरों तक सीमित न रहकर दूरस्थ गांवों तक पहुंच सकता है।हालांकि किसी भी संतुलित विश्लेषण में चुनौतियों की चर्चा आवश्यक है। उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी परीक्षा विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की है।

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते निर्माण कार्य, अनियंत्रित शहरीकरण, वनाग्नि, भू-धंसाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि विकास का मॉडल स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप होना चाहिए। जोशीमठ जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि केवल परियोजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

दूसरी बड़ी चुनौती पलायन की है। सड़क, रेल और डिजिटल कनेक्टिविटी में सुधार के बावजूद दूरस्थ गांवों से जनसंख्या का बहिर्गमन पूरी तरह नहीं रुका है। इसके लिए स्थानीय रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता होगी।

इसी प्रकार भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता की नीति का वास्तविक परीक्षण तब होगा जब उसकी प्रभावशीलता सचिवालय से लेकर ब्लॉक और ग्राम स्तर तक दिखाई दे।

समग्र रूप से देखें तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली ने उत्तराखंड की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई है। उनके कार्यकाल की विशेषता केवल योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि विवादास्पद और कठिन समझे जाने वाले विषयों पर निर्णय लेने की राजनीतिक इच्छा-शक्ति रही है।

नीतिगत साहस किसी भी सरकार की पहचान बन सकता है, किंतु उसकी अंतिम सफलता जनता के जीवन में दिखाई देने वाले बदलावों से ही मापी जाएगी।

आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि वर्तमान दौर के ये निर्णय उत्तराखंड को आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर, प्रशासनिक रूप से अधिक सक्षम और सामाजिक रूप से अधिक संतुलित राज्य बनाने में कितने सफल सिद्ध होते हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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