हिमालय में बर्फीली बाढ़: प्रकृति की प्रचंड अभिव्यक्ति, कब गंभीर होंगे पर्यावरण को लेकर?
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सीमांत जिला चमोली की भारत तिब्बत सीमा से लगी नीती घाटी के रेणी गांव के निकट एवलांच गिरने से आई धौली गंगा की विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर विश्वविख्यात चिपको आंदोलन की याद ताजा कर दी है। सन् 1970 की अलकनंदा की बाढ़ के बाद इसी रेणी गांव में गौरादेवी ने चंडी प्रसाद भट्ट और गोविंद सिंह रावत आदि के सरंक्षण में चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी।
- चिपको की जन्मस्थली से प्रकृति का उग्र संदेश
चिपको आंदोलन की जन्मस्थली में प्रकृति ने रविवार की सुबह एवलांच टूटने के बाद ऋषिगंगा और फिर धौली गंगा में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर हिमालय से अत्यधिक छेड़छाड़ और मानवीय लापरवाहियों के प्रति अत्यधिक प्रचंड तरीके से आगाह कर दिया है। जाहिर है कि कुछ देर के लिए नदी का पानी रुका होगा और जब रुका हुआ पानी अवरोधक तोड़ कर अत्यंत वेग से नीचे निकल गया तो पानी के साथ बह रही कच्ची बर्फ ने पहले ऋषिगंगा और फिर धौली गंगा में बाढ़ पैदा कर दी। जिससे ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट और फिर धौली पर बन रहे तपोवन विष्णुगाड पावर प्रोजैक्ट को लीलने के साथ ही उन परियोजनाओं पर बड़ी संख्या में काम कर रहे मजदूरों को उनकी कालोनियां समेत निगल लिया। यही हालत केदारनाथ आपदा के समय भी चोराबारी ताल के टूटने से पैदा हुई थी।
- हिमालय पर विप्लवों का सिलसिला
उत्तराखंड में 2010 में भी हालात काफी बदतर हो गए थे और दो साल बाद तो केदारनाथ के ऊपर ही बाढ़ आ गई। हिमाचल प्रदेश में अगस्त 2000 में जब सतलुज में बाढ़ आई तो नदी का जलस्तर सामान्य से 60 फुट तक उठ गया था। इसी तरह 26 जून 2005 की बाढ़ में सतलुज का जलस्तर सामान्य से 15 मीटर तक उठ गया था। इसके एक महीने के अंदर फिर सतलुज में त्वरित बाढ़ आ गई। हिमालय पर बर्फ के रूप में एक महासागर के बराबर पानी बर्फ के रूप में जमा है। अगर बर्फ का यह महासागर विचलित हो गया तो उस प्रलय की कल्पना भी भयावह है।
सन् 1857 में भारी भूस्खलन और बोल्डरों के कारण मंदाकिनी का प्रवाह तीन दिन के लिए रूक गया था...
- हिमालयी नदियों का मिजाज नहीं समझे योजनाकार
अलकनंदा के लगभग 1016 वर्ग कि.मी. में फैले कैचमेंण्ट में पांच प्रमुख नदियां तीव्र गति से चल कर 5 प्रयागों में अलकनंदा से मिलती हैं। इनसे भी ज्यादा खतरनाक वे छोटे बरसाती नाले होते हैं जो लगभग 60 डिग्री से भी अधिक की ढाल में बह कर गहरी घाटियों में दोनों और टकरा कर भारी बोल्डरों और पेड़ों को उखाड़ कर साथ ले चलती हैं। इनसे सबसे अधिक खतरा झीलें बनने का होता है जो कि काफी समय बाद टूट कर अलकनंदा घाटी से लेकर हरिद्वार तक तबाही मचा देती हैं।
हिमालयी नदियां तो जितनी वेगवान होती हैं उतनी ही उत्श्रृंखल भी होती हैं। इसलिए अगर उनका मिजाज बिगड़ गया तो फिर रविवार को धौली गंगा में आई बाढ़ की तरह ही परिणाम सामने आते हैं। वास्तव में जिस नदी का जितना तीव्र ढाल होगा उतना ही वेग उसकी जलधारा का होगा। हरिद्वार से नीचे बहने वाली गंगा झाल बहुत कम होने के कारण वेगहीन हो जाती है। गंगा की ही दो श्रोत धाराओं में से एक भागीरथी का औसत ढाल 42 मीटर प्रति किमी है। मतलब यह कि यह हर एक किमी पर 42 मीटर झुक जाती है।
अलकनंदा का ढाल इससे अधिक 48 मीटर प्रति किमी है। जबकि इसी धौलीगंगा का ढाल 75 मीटर प्रति किमी आंका गया है। नंदप्रयाग में मिलने वाली नंदाकिनी का 67 मीटर और रुद्रप्रयाग में इससे मिलने वाली मंदाकिनी का ढाल 66 मीटर प्रति कि.मी. आंका गया है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जब कोई नदी या नाला इतने ढाल में बहेगा तो उसका वेग और उस वेग में कितनी शक्ति होगी। अलकनंदा घाटी में इसी तरह कई बार अत्यंत वेग से बहने वाली नदियों में पानी की असंतुलित और अनियंत्रित मात्रा इस तरह की घटनाओं का कारण बन चुकी है। फिर भी हमारी सरकारें सावधानी बरतने को तैयार नहीं हैं। पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट भी धौलीगंगा पर बन रहे 520 मेगावाट क्षमता की जलविद्युत परियोजना के बारे में कई बार शासन प्रशासन को आगाह कर चुके थे।
- अलकनंदा के कैचमेंट में यह नई घटना नहीं
सन् 1857 में भारी भूस्खलन और बोल्डरों के कारण मंदाकिनी का प्रवाह तीन दिन के लिए रूक गया था। जब वह झील टूटी तो अलकनंदा घाटी में भारी तबाही मच गई। इसी प्रकार सन् 1868 में चमोली गढ़वाल के सीमांत क्षेत्र में झिन्झी गांव के निकट भूस्खलन से बिरही नदी में एक अन्य झील बन गई, जिसे गोडियार ताल कहा गया। सन् 1886 में प्रकाशित ई.टी.एटकिंसन के हिमालयन गजेटियर के अनुसार गोडियार ताल में भूस्खलन से उसका एक हिस्सा टूट गया जिससे झील का काफी पानी निकलने से अलकनंदा घाटी में भारी तबाही हुई और 73 लोगों की जानें चलीं गईं।
सन् 1893 में गौणा गांव के निकट एक बड़े शिलाखंड के टूट कर बिरही में गिर जाने से नदी में फिर झील बन गई जिसे गौणा ताल कहा गया जो कि 4 कि.मी.लंबा और 700 मीटर चैड़ा था। यह झील 26 अगस्त 1894 को टूटी तो अलकनंदा में ऐसी बाढ़ आई कि जिससे कई गांवों के साथ ही गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर का आधा हिस्सा साफ हो गया। बद्रीनाथ के निकट 1930 में अलकनंदा फिर अवरुद्ध हुई थी, इसके खुलने पर नदी का जल स्तर 9 मीटर तक ऊंचा उठ गया था।
सन् 1957 में धौलीगंगा की सहायक द्रोनागिरी गधेरे में भापकुंड के निकट एवलांच आने से 3 कि.मी. लंबी झील बन गई थी। 1967-68 में रेणी गांव के निकट भूस्खलन से जो झील बनी थी उसके 20 जुलाई 1970 में टूटने से अलकनंदा की बाढ़ आ गई जिसने हरिद्वार तक भारी बताही मचाई। उस बाढ़ से गंगनहर में इतनी गाद भरी कि उसे साफ करने में ही करोड़ों रुपये खर्च करने पड़े। माना तो यह भी जाता है कि 1970 की अलकनंदा की बाढ़ के कारण ही विश्वविख्यात चिपको आंदोलन की खड़ा हुआ था। इस बाढ़ की जननी रेणी ही चिपको की जननी भी मानी जाती है, जहां चंडी प्रसाद भट्ट एवं अन्य सर्वोदयी नेताओं की प्रेरणा से गौरा देवी ने अपनी साथी संग्रामी देवी आदि को साथ मिलकर पेड़ों पर चिपक कर पेड़ बचाए थे।
उत्तराखंड हिमालय में भले ही वृक्ष आवरण बढ़ा हो मगर...
- हिमालय के वनावरण हरण का नतीजा
अगर आप भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की 1995 और 2017 की वन स्थिति सर्वे रिपोर्टों पर गौर करें तो आप अंदाज लगा सकते हैं कि हम हिमालयवासी अपने आश्रयदाता हिमालय के तंत्र को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के अलावा उत्तर पूर्व के शेष हिमालयी राज्यों में देश का लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र निहित है। लेकिन पिछले दो दशकों में उत्तर पूर्व के इन हिमालयी राज्यों में से किसी एक में शायद ही कोई साल ऐसा गुजरा हो जब वह वनावरण न घटा हो।
उत्तराखंड हिमालय में भले ही वृक्ष आवरण बढ़ा हो मगर वनों के घनत्व में तेजी से वृद्धि हुई है। जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क चैड़ीकरण ने पहाड़ों की चूलें हिला दीं। डायनामाइट विस्फोटों से हिमाच्छादित पहाड़ कांप रहे हैं जिस कारण पहाड़ों पर जमीं बर्फ और हिमखण्ड लुड़क रहे हैं। केदारनाथ में हैलीकाप्टरों की गड़गड़ाहट वन्यजीवों के साथ ही हिमाच्छादित पहाड़ों को भी विचलित कर रही है। उच्च हिमालयी क्षेत्र स्थित रेणी गांव के लोग पहले से ही ऋषिगंगा पावर प्रोजैक्ट निर्माण में हो रहे विस्फोटों से परेशान और भयभीत थे। जब राज्य सरकार ने उनकी नहीं सुनी तो वे इन विस्फोटों को रोकने और उसके मलबे को हटाने की फरियाद लेकर 2019 में हाइकोर्ट भी गये मगर राज्य सरकार ने हाइकोर्ट के आदेशों को भी अनसुना कर दिया। जिसका परिणाम आज सबके सामने है।
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