Uniform Civil Code: भारत में समान नागरिक संहिता, मोदी सरकार के लिए कितनी बड़ी है चुनौती?
इधर, सवाल यह उठता है कि क्या इतनी विविधताओं वाले भारत देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक है? अगर व्यवहारिक होती तो संविधान सभा इस मुद्दे को नीति-निर्देशक तत्वों में नहीं डालती? अगर इतना आसान होता तो धारा 370 के सफाए से पहले ही देश में यह कानून आ जाता।
इधर, सवाल यह उठता है कि क्या इतनी विविधताओं वाले भारत देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक है? अगर व्यवहारिक होती तो संविधान सभा इस मुद्दे को नीति-निर्देशक तत्वों में नहीं डालती? अगर इतना आसान होता तो धारा 370 के सफाए से पहले ही देश में यह कानून आ जाता।
विस्तार
उत्तराखण्ड सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता कानून का मजमून तैयार करने के लिए गठित रंजना देसाई कमेटी का दिल्ली में 22वें विधि आयोग से मिलना ही था कि आयोग ने भी अन्य विषयों को पीछे छोड़कर तत्काल समान नागरिक संहिता पर पहल शुरू कर दी। आयोग ने फिलहाल इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर रायशुमारी शुरू कर दी है।
इधर, विधि आयोग द्वारा आनन-फानन में समान नागरिक संहिता को लेकर आगे बढ़ने से यही संकेत मिलते हैं कि आयोग जल्दी ही इस विषय पर अपनी सकारात्मक राय दे देगा और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ही देश में समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी, चाहे उसका कानूनी या संवैधानिक नतीजा जो भी हो।
दरअसल, एक बार कानून लागू होने के बाद केन्द्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार गर्व के साथ दावा कर सकेगी कि उसने कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद राम मंदिर का निर्माण भी करा दिया और तीसरा महत्वपूर्ण संकल्प समान नागरिक संहिता को भी व्यवहारिक धरातल पर उतार दिया। अगर कानून को अदालत में चुनौती दी गई तो भी उसका राजनीतिक लाभ यह कहकर उठाया जा सकता है कि हमने तो वायदा पूरा कर दिया मगर विरोधी ऐसा नहीं चाहते हैं।
केन्द्र के लिए धामी सरकार की कसरत
मोदी सरकार के ही कार्यकाल में गठित 21वां विधि आयोग साफ कह चुका था कि समान नागरिक संहिता की न तो जरूरत है और ना ही वह वांछनीय है। इस स्पष्ट टिप्पणी के बाद भी अगर 22वां आयोग इस विषय को प्राथमिकता दे रहा है तो समझा जा सकता है कि इसमें आयोग से ज्यादा केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय की रुचि है।
जाहिर है मंत्रालय द्वारा एक से अधिक मौकों पर कहा भी गया था कि विधि आयोग की राय आने के बाद इस विषय पर फैसला लिया जाएगा। चूंकि भाजपा शासित उत्तराखण्ड इस मामले में काफी आगे बढ़ चुका है और भाजपा हिमाचल, गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में समान नागरिक संहिता का वायदा कर चुकी है।
अन्य भाजपा शासित राज्य भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों वाले अनुच्छेद 44 के तहत राज्य समान नागरिक संहिता बना तो सकते हैं मगर अनुच्छेद 254-ख के अनुसार बिना राष्ट्रपति की अनुमति के वह कानून लागू नहीं हो सकता। जाहिर है कि राज्यों में यह पहल बिना भाजपा शीर्ष नेतृत्व की अनुमति के नहीं हो रही है। अगर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ही धामी सरकार से यह सब करा रहा है तो वह फालतू की कसरत नहीं करा रहा, बल्कि स्वयं कानून बनाने का रास्ता साफ कर रहा है।
धामी सरकार ने केवल माहौल बनाया
वर्ष 2019 में भाजपा के ही एक विधायक अश्वनि उपाध्याय ने दिल्ली हाइकोर्ट में समान नागरिक संहिता लागू करने संबंधी एक याचिका दायर की थी, जिस पर केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने 12 पृष्ठों का एक हलफनामा दायर कर कहा था कि विधि आयोग की रिपोर्ट मिलने पर केन्द्र सरकार द्वारा अन्य हित धारकों से बात कर कानून बनाया जा सकता है। फिर फरवरी 2022 में तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री किरन रिजजू ने संसद में कहा था-
संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत सम्पूर्ण भारत की टेरिटरी में यह लागू होना है, इसलिए इस पर केन्द्र सरकार या संसद का बनाया हुआ कानून ही ज्यादा व्यवहारिक हो सकता है। इन तथ्यों के आलोक में समझा जा सकता है कि इस दिशा में उत्तराखण्ड जैसे भाजपा शासित राज्यों के प्रयास या पहले महज माहौल बनाने के लिए ही हैं और इस दिशा में असली प्रयास अब 22 वें विधि आयोग की पहल के साथ शुरू हो गया है।
रायशुमारी एक औपचारिकता
गौर करने वाली बात यह है कि 22 वां विधि आयोग समान नागरिक संहिता को लेकर जो सार्वजनिक रायशुमारी कर रहा है उसकी सीख आयोग को उत्तराखण्ड की समान नागरिक संहिता ड्राफ्ट कमेटी ने दी है। कमेटी की अध्यक्षा जस्टिस रंजना देसाई ने केन्द्रीय आयोग से मिलने के बाद दावा किया था कि समान नागरिक संहिता के पक्ष में उत्तराखण्ड का भारी बहुमत है और बहुत थोड़े लोगों ने इसका विरोध किया है।
उत्तराखण्ड में 85 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की है जिसे समान नागरिक संहिता से कोई परेशानी इसलिए नहीं है कि उनके लिए 1955 और 56 में ही नागरिक संहिताएं बन चुकी हैं। वैसे भी कमेटी ने न्याविदों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों के बजाय आम जनता और खास कर एक राजनीतिक तथा धार्मिक विचारधारा के लोगों की राय एकत्र की थी।
राय देने वाले अधिसंख्य लोग किसी अन्य समुदाय के लिए व्यक्तिगत मामलों में विशेषाधिकार क्यों चाहेंगे? ऐसी ही रायशुमारी राष्ट्रीय स्तर पर भी होनी है और समान नागरिक संहिता के पक्ष में उत्तराखण्ड की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दुओं का भारी बहुमत आना लाजिमी है। विधि आयोग के कानों में यह मंत्र उत्तराखण्ड की कमेटी फूंक गई थी।
जनजातियों में कैसे लागू होगा कानून?
इधर, सवाल यह उठता है कि क्या इतनी विविधताओं वाले भारत देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक है? अगर व्यवहारिक होती तो संविधान सभा इस मुद्दे को नीति-निर्देशक तत्वों में नहीं डालती? अगर इतना आसान होता तो धारा 370 के सफाए से पहले ही देश में यह कानून आ जाता।
दरअसल, जब धारा 370 हटाई गई तो कहा गया था कि एक देश में एक जैसा ही कानून और प्रशासन होना चाहिए इसलिए अलग धारा हटा दी गई, लेकिन अनुच्छेद 371 की कई उपधाराएं आज भी मौजूद हैं और पूछ रही हैं कि एक देश एक कानून कहां है? अगर एक देश एक कानून व्यवहारिक है तो फिर नवीन पंचायती राज के लिए संविधान का 73वां और 74वां संशोधन पूर्वोत्तर राज्यों में लागू क्यों नहीं है?
आसान नहीं एक देश एक कानून
संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक भारत के नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतंतत्रता की अपितु, धार्मिक रीति-रिवाजों की स्वतंत्रता की गारंटी भी देते हैं। वैयक्तिक कानून भी धार्मिक रीति-रिवाजों में ही आते हैं। संविधान देश की 7 सौ से अधिक जनजातियों के प्रथागत् कानूनों को मान्यता देने के साथ ही उनके रीति-रिवाजों को मानने की गारंटी भी देता है, इसलिए अनुसूची-6 के क्षेत्रों में स्वायत्तशासी जिलों में उन जनजातीय परम्परागत पंचायतों को मान्यता दी गई है जिन्हें थोड़े न्यायिक अधिकार भी प्राप्त हैं, इसलिए वहां संविधान के 73वें और 74वें संशोधन लागू नहीं हो सके। जनजातियों में बहुपति और बहुपत्नी प्रथा अब भी चलती है।
समान नागरिक संहिता कैसे हस्तक्षेप करेगी। जनजातियों को छेड़ने का नतीजा मणिपुर में दिखाई दे रहा है। भारत में पारसियों की जनसंख्या एक लाख से भी बहुत कम है। भारत के चहुमुखी विकास में असाधारण योगदान देने वाले पारसियों की जनसंख्या एक लाख भी नहीं है। बिरादरी से बाहर शादी करने का मतलब वहां जायदाद से हाथ धोना है।
ये सख्त नागरिक कानून इसलिए है ताकि इस मानव वंश का अतित्व बना रह सके। किसी खास वर्ग या समुदाय से जोर-जबरदस्ती करके भले ही वोटों का इजाफा हो जाएगा, लेकिन जनजातियों को छेड़ोगे तो अपना अस्तित्व बचाने के लिए कई बिरसामुंडा खड़े हो सकते हैं।
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