इस पाकिस्तानी पीएम ने बिना तलाक चुपके से की थी सेक्रेटरी से शादी, बवाल मचा तो बैन हो गया तीन तलाक
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तलाक-ए-बिद्दत (इंस्टैंट ट्रिपल तलाक) औऱ निकाह हलाला अब मुस्लिम समुदाय का अंदरुनी मसला नहीं रह गया है। अब ये दोनों मसले भारत की राजनीति पर प्रभाव डालने वाले महत्वपूर्ण मसले हैं। दोनों मुद्दों पर जमकर राजनीति हो रही है। निश्चित तौर पर ट्रिपल तलाक को प्रतिबंधित कर सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने की कोशिश की है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि इन मुद्दों पर जमकर राजनीति हो रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही ट्रिपल तलाक का मुद्दा वोट बैंक है।
क्यों राजनीतिक मुद्दा बन गया है तीन तलाक?
दरअसल, तीन तलाक के मुद्दे से एक सियासी पार्टी की नजर बहुसंख्यक वोटों पर है तो दूसरे की नजर अल्पसंख्यक वोटों पर हैं। मुस्लिम महिलाओं का ट्रिपल तलाक का मसला भारत में काफी लंबे समय से गरमाया हुआ है। शायद भारत दुनिया के कुछ बचे-खुचे देशों में शामिल होगा जो धर्मनिरपेक्ष देश होने के बावजूद ‘इंस्टैंट ट्रिपल तलाक’ को प्रतिबंधित करने में विफल रहा, जबकि इस्लामिक मुल्कों ने भी ट्रिपल तलाक काफी पहले बैन कर दिया था।
दूसरी तरफ भारत में ट्रिपल तलाक राजनीति का मुद्दा बना रहा, क्योंकि यह लगातार वोटबैंक रूपी दूध दे रहा था। 2019 के लोकसभा चुनावों में भी यह मुद्दा खासा गरमाया। कांग्रेस इस मुद्दे की गंभीरता को समय पर नहीं पकड़ सकी। भाजपा ने इसका जोरदार लाभ उठाया। अब फिर लोकसभा और राज्यसभा में दोनों दल ट्रिपल तलाक के मसले पर आमने-सामने हैं। खास बात यह है कि लोकसभा में त्रिपल तलाक पर बिल पास हो गया है जबकि सरकार की असली जंग राज्यसभा में है।
लोकसभा में बिल पारित, विपक्ष के तर्क कमजोर
लोकसभा ने मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइटस ऑन मैरेज) बिल 2019 पारित कर दिया। इस मुद्दे पर विपक्ष हंगामा करता रहा। लेकिन संख्या बल में कमजोर विपक्ष की एक न चली। लोकसभा में बिल पारित हो गया, राज्यसभा में अब विपक्ष की एकता देखने वाली होगी।
उधर बिल को लेकर राजनीति जारी है। बिल के प्रावधानों में तलाक-ए-बिद्दत को गैरकानूनी करार दिया गया है। इसे प्रथा के इस्तेमाल करने पर तलाक देने वाले पति को तीन साल की जेल होगी।
वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग मुस्लिम पुरुषों को परेशान करने के लिए किया जाएगा। विपक्ष की नजरों में यह कानून मुस्लिम विरोधी है। सरकार का दावा है कि कानून मुस्लिम विरोधी नहीं है, क्योंकि पति के खिलाफ कानून का दुरुपयोग न हो, इसलिए ट्रायल से पहले पति को बेल दिए जाने का प्रावधान कानून में रखा गया है। हालांकि ट्रिपल तलाक गैर जमानती अपराध होगा, लेकिन मजिस्ट्रेट के पास जमानत मंजूर करने का अधिकार होगा। लेकिन इससे पहले पीड़ित पत्नी को मजिस्ट्रेट जरूर सुनेगा।
क्यों है सरकार के तर्क
बिल पर लोकसभा में बोलते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि इस बिल से मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ मिलेगा। इसे सियासी चश्मे से नहीं देखा जाए। इसे नारी सम्मान के दृष्टि से देखा जाए। जबकि विपक्ष का दावा था कि यह बिल मुस्लिम विरोधी तो है ही, महिला विरोधी भी है।
लोकसभा सदस्य असदुद्दीन औवैसी ने इसका विरोध करते हुए लोकसभा में कहा कि बिल के प्रावधानों के अनुसार पति को तीन साल के लिए जेल भेजा जाएगा। वैसे में पीड़िता पत्नी को रखरखाव का खर्च पति कैसे देगा? बिल के प्रावाधान के अनुसार पत्नी को तीन साल तक पति के जेल में रहने तक प्रतीक्षा करनी होगी।
कटरपंथियों पर सख्ती करते हुए अयूब खान ने ट्रिपल तलाक किया था बैन
मुस्लिम महिलाओं को तलाक से संबंधित बेहतर अधिकार देने में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान भारत से काफी आगे रहा। 1950-60 के दशक में जब पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी जैसे दल अपनी जमीन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे, पाकिस्तानी सरकार ने ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी घोषित कर दिया दिया।
पाकिस्तानी सरकार ने 1961 में एक आर्डिनेंस के माध्यम से ट्रिपल तलाक को गैरकानूनी ठहरा दिया। नए कानून के मुताबिक तलाक के बाद पति को यूनियन काउंसिल को नोटिस देना जरूरी हो गया। तलाक की शिकार महिला को भी नोटिस की कॉपी देना जरूरी था। तलाक की वैधता 90 दिन के बाद ही स्वीकार करने का प्रावधान कानून में था।
दिलचस्प बात यह थी तब भारत में हिंदू महिलाओं के अधिकार को लेकर तमाम बातें हो रही थीं, लेकिन मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर सरकार ने चुप्पी साध ली थी। भारत में तो 21वीं सदी में भी मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर सरकारों ने कुछ नहीं सोचा। इस पर सिर्फ राजनीतिक दलों ने राजनीति की। इसमें सारे राजनीतिक दल शामिल थे।
बता दें कि कोई भी दल मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर पाक-साफ नहीं रहा है। यहां मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के बहाने वोट बैंक की राजनीति होती रही, वहीं सीमा पार पाकिस्तान के शासक जनरल अयूब खान ने मुस्लिम महिलाओं को वो अधिकार दिए, जो एक सुन्नी इस्लामिक देश में सोचा नहीं जा सकता था।
भारत में कहीं जाकर 21वीं सदी में सर्वोच्च न्यायलय ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर फैसला दिया और ट्रिपल तलाक को गैरकानूनी करार दिया। सरकार ने गंभीरता तब दिखाई जब सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के तलाक संबंधी अधिकारों को लेकर कानून बनाने को कहा। 2017 में सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यों वाली बेंच ने शायरा बानो वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया के केस में ट्रिपल तलाक को बहुमत से अंसवैधानिक घोषित किया।
प्रधानमंत्री बोगरा की दूसरी शादी और ट्रिपल तलाक पर बैन
दरअसल, पाकिस्तान में ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को बैन करने के पीछे मोहम्मद अली बोगरा से संबंधित एक घटना थी। 1955 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा ने अपनी पत्नी के अधिकार का हनन किया था। उन्होंने अपनी पत्नी को तलाक दिए बिना अपनी सेक्रेटी से शादी कर ली थी। इसका जोरदार विरोध हुआ। विरोध के कारण सरकार को मजबूरी में मुस्लिम पारिवारिक और विवाह कानून में सुधार के लिए सात सदस्यों वाला आयोग का का गठन करना पड़ा।
आयोग ने मुस्लिम महिलाओं को अधिकार देने के लिए कई सिफारिशें की थी। इन्हीं सिफारिशों के बाद पाकिस्तान सरकार ने‘मुस्लिम फैमिली लॉ आर्डिनेस 1961’ लाया। अध्यादेश में ट्रिपल तलाक को प्रतिबंधित कर दिया गया। ऑर्डिनेंस में एक साथ तीन तलाक बोलकर तलाक देने की प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया।
इस तरह की हरकत करने पर एक साल की सजा का प्रावधान कानून में किया गया। नए कानून के तहत पति तलाक की घोषणा के बाद यूनियन काउंसिल के चेयरमैन को नोटिस देगा, साथ ही नोटिस की एक कॉपी अपनी बीबी को देगा। उसे दो मासिक धर्म या तीन महीने का इंतजार करना पड़ेगा।
चेयरमैन को नोटिस दिए जाने के बाद भी तलाक 90 दिनों तक मान्य नहीं होगा। अगर इस बीच पति और पत्नी के बीच आपस में समझौते के उम्मीद होगी तो पति तलाक की घोषणा को वापस लेगा। यही नहीं पाकिस्तानी सरकार ने निकाह हलाला को भी प्रतिबंधित कर दिया था। पाकिस्तान के 1961 के कानून के मुताबिक तलाक के बाद भी पत्नी पहले पति के साथ बिना हलाला शादी कर सकती है।
बांग्लादेश ने पाकिस्तानी लॉ को अपनाया
1971 में बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हो गया। लेकिन बांग्लादेश ने भी पाकिस्तान के इस प्रोग्रेसिव कानून को अपनाया। दिलचस्प बात थी कि 1947 से पहले ब्रिटिश इंडिया( अविभाजित भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) के मुसलमान 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 के तहत पारिवारिक और तलाक के मामले के डील करते थे। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश या भारतीय उपमहादीप के ज्यादातर मुसलमान सुन्नी इस्लाम के हनफी स्कूल को मानते हैं।
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में सुन्नी इस्लाम की दो प्रमुख शाखाएं देवबंदी औऱ बरेलवी ही प्रभावी हैं, जो इस्लाम के कानूनी व्याख्या करने वाले हनफी स्कूल को मानते हैं। हनफी स्कूल मुस्लिम महिलाओं को बहुत ज्यादा अधिकार देने के लिए राजी नहीं है।
यह स्कूल मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में जाकर पुरुषों के बराबर नमाज पढ़ने का भी विरोधी है। भारत में जब भी मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ने के अधिकार दिए जाने की बात होती है तो हनफी स्कूल इसका विरोध करता है। मोटी बात यह है कि हनफी स्कूल मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से संबंधित कोई भी प्रगतिशील कानून बनाए जाने का जोरदार विरोध करता है।
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी हुक्मरानों ने पाकिस्तान बनने के बाद शुरुआती दौर में हनफी स्कूल के कटटरपंथियों की परवाह कभी नहीं की। जबकि भारत में सरकारें इस कटटरपंथियों के दबाव में हमेशा रहीं, मुस्लिम महिलाओं को लेकर प्रगतिशील कानून बनाने को आगे नहीं आईं। जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में हनफी स्कूल के कट्टरपंथी सरकारों को दबाव में लेने में कामयाब नहीं रहीं। पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक के शासन के वक्त जरूर कट्टरपंथियों का प्रभाव सरकार और शासन में बढ़ा। इसके बावजूद महिलाओं के अधिकारों को लेकर बनाए गए कानून में जनरल जिया ने भी कोई फेरबदल नहीं किया।
जनरल जिया ने सुन्नी कटटरपंथियों के दबाव में शिया और अहमदिया मुसलमानों के अधिकारों को छीनने वाले कानून जरूर पारित किए। इसी प्रकार बांग्लादेश में खालिदा जिया के समय में कटटरपंथियों का दबाव जरूर बढ़ा, लेकिन शेख हसीना के शासन में कट्टरपंथियों के साथ सख्ती से निपटा गया।
पाकिस्तान में अयूब खान मुस्लिम महिलाओं के अधिकार के प्रति काफी संवेदनशील थे। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं को कानूनी अधिकार प्रदान किए। जनरल अय़ूब खान की प्रगतिशीलता इस हद तक थी कि उन्होंने कटटरपंथियों की परवाह किए बिना पाकिस्तान मे जनसंख्यक नियंत्रण कानून लगाकर दिया। अयूब खान ने कट्टरपंथियों के विरोध को सख्ती से कुचल दिया।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव से परेशानी है सुन्नी मुसलमानों को
भारत में मुस्लिम पारिवारिक मामलों में तलाक अभी तक ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लिकेशन एक्ट 1937’ के अधीन रहा है। इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ भी कहा जाता है। यह ब्रिटिश राज में बनाया गया था कानून था जो मुस्लिमों पर लागू होता था। 1937 के नए कानून से पहले ब्रिटिश भारत में एंग्लो मोहम्मडन लॉ लागू था, जिसे हटाकर नया कानून लागू किया गया था। इसी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अभी तक भारत में ट्रिपल तलाक या तालाक-ए-बिद्दत वैध है।
तलाक देने की कई प्रथाओं में से एक तलाक-ए-बिद्दत ही अभी तक भारत का मुसलमान अपनाता रहा है। हालांकि हनफी स्कूल के अलावा इस्लाम के दूसरे स्कूल तलाक-ए-बिद्दत को सही नहीं मानते। कई मुल्कों ने इसी कारण अपने यहां तलाक संबंधी कानूनों में बदलाव किया। समय बदलने के साथ ही महिला अधिकारों की मांग इस्लामिक देशों में भी हुईं। इन्हीं मांगों के आधार पर इस्लामिक देशों ने तलाक संबंधित कानूनों में बदलाव किए। मिश्र, सऊदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और अफगानिस्तान जैसे देश ने तलाक संबंधी कानूनों में बदलाव किए और महिलाओं को अधिकार दिए।
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