तीन तलाक पर ये गलती ना कर बैठे कांग्रेस? नई मुसीबत में पड़ेंगे राहुल गांधी
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अपनी स्थापना के 129 वर्ष में कांग्रेस खड़ी कांग्रेस को तीन तलाक के मुद्दे पर अपना स्टैंड क्लियर करना चाहिए। पार्टी को मौलवियों और कट्टरपंथियों के सामने हथियार डालने की अपनी परंपरागत नीति पर पुनर्विचार करना होगा। ट्रिपल तलाक़ यानी तलाक़-तलाक़-तलाक़ जैसी अमानवीय और बर्बर परंपरा पर मानवीय स्टैंड लेने का समय आ गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को एक स्टैंड लेते हुए तीन तलाक को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाले ट्रिपल तलाक़ विरोधी विधेयक का राज्यसभा में समर्थन करना चाहिए। पिछली बार यह विधेयक राज्यसभा में लटक गया था। लिहाज़ा, मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से सुरक्षा देने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई। उम्मीद की जा रही है कि ट्रिपल तलाक विरोधी विधेयक को क़ानूनी जामा पहना दिया जाएगा।
क्या है ट्रिपल पर अब क्यों आमने सामने हैं भाजपा-कांग्रेस?
कई विपक्षी दल ट्रिपल तलाक़ पर क़ानूनी पाबंदी लगाने का विरोध नहीं कर रहे हैं। हां, इसे गैरज़मानती अपराध की श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं दिख रहें हैं। यही राय मीडिया, सोशल मीडिया और जनचर्चा में शामिल मुस्लिम बुद्धिजीवियों में भी है। वे ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाने की कोशिश का विरोध कर रहे हैं। मुल्ला-मौलवी और कट्टरपंथी तो मजहब का हवाला देते हुए विधेयक के ही विरोध में खड़े हो गए हैं और झुकने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। जबकि नरेंद्र मोदी सरकार मानती है कि ट्रिपल तलाक़ को संगीन अपराध की कैटेगरी में रखे बिना इस परंपरा का ख़त्म करना मुमकिन नहीं है। इस समर्थन और विरोध के चलते ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा राष्ट्रीय मिसाइल बन गया है। ऐसे में जाहिर है सोमवार का दिन अहम होगा, जब इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया जाएगा।
गौरतलब है कि पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई चारो समुदाय के जज थे की संवैधानिक पीठ ने ट्रिपल तलाक़ की सदियों पुरानी परंपरा से मुस्लिम महिलाओं को निजात दिला दी थी। ट्रिपल तलाक़ और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली मुस्लिम महिलाओं ने फ़ैसले का स्वागत किया था। इन महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया था। कहा तो यह भी गया था कि तलाक़ के मुद्दे के चलते ही उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने अपने शौहरों का निर्देश न मानकर भाजपा को वोट दिया था और भाजपा सवा तीन सौ सीट जीतने में कामयाब रही थी।
कई दिग्गज महिलाओं ने किया था सपोर्ट
तीन तलाक़ के मुद्दे पर केंद्र को धन्यवाद देने वाली महिलाओं में अभिनेत्री सलमा आगा सबसे आगे रहीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक़ के अमानवीय पहलू को समाज के सामने लाने वाली पहली फिल्म 'निकाह' में यादगार अभिनय किया था। उस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारतीय समाज ने शिद्दत से महसूस किया कि वाक़ई मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ किसी भयावह सपने से कम नहीं है। चूंकि देश में आज़ादी के बाद ज़्यादातर समय कांग्रेस की ही सरकार रही और कांग्रेस ट्रिपल तलाक़ के समर्थक मुल्लों के निर्देश पर काम करती थी, इसलिए इस कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जा सका।
कब आया था चर्चा में? क्या था शाहबानो केस?
ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे ने 1980 के दशक में देश-विदेश में चर्चा का विषय बनने वाले बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताज़ा कर दी है। उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाक़शुदा शाहबानो के पक्ष में फ़ैसला दिया था। लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को इस्लाम में दख़ल मानकर केंद्र ने नया क़ानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से ही रोक दिया था। इस तरह कांग्रेस के इस बेहद अमानवीय क़दम से ट्रिपल तलाक़ की गंभीर शिकार शाहबानो इंसाफ़ पाने से वंचित रह गई।
दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो पांच-पांच बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने 1978 में ही तीन तलाक़ कहते हुए उनको घर से निकाल दिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। बच्चों और अपनी जीविका का कोई साधन न होने से पति से गुज़ारा लेने के लिए शाहबानो अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल लग गए।
कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, फिर चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म का हो। कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी लोगों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में दख़ल लगा। असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया और राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं। कांग्रेस ने अपने इस क़दम को धर्मनिरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।
कांग्रेस क्यों घिरती रही है इस मुद्दे पर?
मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया। उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। वह क़ानून आज भी कांग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।
क्या चाहती है मोदी सरकार?
सन् 1986 में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फ़ैसले को बदलने के लिए क़ानून बनाकर राजीव सरकार ने जो ब्लंडर किया था, अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार संशोधित करने की कोशिश कर रही है। अपनी उसी लाइन ऑफ़ ऐक्शन के तहत केंद्र सरकार पहले अध्यादेश लेकर आई और अब इसे क़ानून का रूप देने में जुटी है। यानी केंद्र सरकार सही मायने में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने के अपने मिशन पर है। यही वजह है कि पिछले दस साल से शौहर के अमानवीय फ़ैसले की शिकार हुई सायरा बानो के पक्ष में दीवार की तरह खड़ी है।
ट्रिपल तलाक़ की गैर-इस्लामिक परंपरा ने मुस्लिम पुरुषों को निरंकुश और बेलगाम बना दिया था। यहां तक कि 'ट्रैजिडी क्वीन' मीना कुमारी (महज़बीन बानो) के साथ इस्लामिक रिवाज़ से निकाह करने वाले फिल्मकार कमाल अमरोही ने मतभेद होने पर ग़ुस्से में तीन तलाक़ कहकर शादी तोड़ दी थी। मीना कुमारी इससे डिप्रेशन में चली गईं, जो अंततः उनकी मौत की वजह बनी। ऐसी ही मज़लूम सायरा बानो को सरकार का सहारा मिला।
मानव अधिकारों से बड़ा नहीं है कोई भी धर्म
वैसे भी हर धर्म की भी अपनी सीमा होनी ही चाहिए। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म, मजहब या रिलिजन नहीं हो सकता। यानी कोई भी धर्म मानव अधिकारों से बड़ा नहीं हो सकता है। तीन तलाक़ निश्चित रूप से हैवानियत है। केंद्र कुछ नहीं कर रही है, बस इस परंपरा को हमेशा के लिए ख़त्म कर रही है। इसलिए मानवीय आधार पर कांग्रेस समेत तमाम सेक्यूलर पार्टियों को इसका समर्थन करना चाहिए ताकि ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाया जा सके। अगर कांग्रेस इस बार भूल सुधार नहीं करती तो 2019 के चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा और नरेंद्र मोदी सरकार की हर नाकामी को ढंकते हुए भाजपा को 2014 के चुनाव से भी बड़ी जीत दिला सकता है।
दरअसल, कांग्रेस की नीतियों के चलते सदियों से उदार रहा हिंदू समाज यह महसूस करने लगा है कि वन नेशन वन लॉ की थ्यौरी पर चलना चाहिए और देश में हर नागरिक के लिए एक ही क़ानून होना चाहिए। इसी मन:स्थिति के चलते देश का बहुसंख्यक समाज सांप्रदायिक कही जाने वाली पार्टियों को आंख मूंदकर वोट दे रहा है, क्योंकि वह मानने लगा है कि एनडीए अगर बुरा भी करेगा तो भी वह कट्टरपंथियों, जिन्हें सेक्यूलर कहने का फ़ैशन है, से बेहतर ही होगा।
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