गर्मी का कहर और राजस्थान: शहर के चौराहों पर हरे पर्दे लगाने से ज्यादा जरूरी है ईमानदारी से पेड़ लगाना
कंक्रीट के जंगल यदि जरूरी हैं तो पेड़ लगाना उतना ही जरूरी है। वैसे तो भारत में वनों की संख्या में इजाफा हुआ है, लेकिन हमारे शहर जरूर पेड़ विहीन होते जा रहे हैं।
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देश में गर्मी का प्रकोप जारी है। राजस्थान में तो तापमान 46 डिग्री को पार कर गया है। राजस्थान के कई शहरों में सड़कों पर पानी का छिड़काव हो रहा है तो जयपुर शहर में कुछ चुनिंदा रेड लाइट्स पर धूप से बचने के लिए हरे पर्दे लगा दिए गए हैं, जो चर्चा का विषय बना हुए हैं। कुछ लोग सरकार के इस इनिशिएटिव की तारीफ कर रहे हैं तो कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि पेड़ लगाए होते तो हरे पर्दों की जरूरत नहीं पड़ती। इस बात में दम भी है। दरअसल, शहर तो बढ़ रहे हैं, लेकिन उस लिहाज से पेड़ों को नहीं लगाया जा रहा है। यही कारण है कि देश के अधिकांश शहरों में सड़कें पेड़ विहीन हैं, जबकि भारत में पूर्व में सड़क किनारे पेड़ लगाने की परंपरा रही है।
जयपुर के चौराहों पर लगे हरे पर्दों ने एक बार फिर सड़क किनारे पेड़ों की महत्व के विषय को चर्चा में लाने का काम किया है। एक बार फिर इस बात पर बहस हो रही है कि कंक्रीट के जंगल यदि जरूरी हैं तो पेड़ लगाना उतना ही जरूरी है। वैसे तो भारत में वनों की संख्या में इजाफा हुआ है, लेकिन हमारे शहर जरूर पेड़ विहीन होते जा रहे हैं। भले वो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो, आर्थिक राजधानी मुंबई हो या फिर राजस्थान की राजधानी जयपुर, अधिकांश सड़कें पेड़ों के बिना सूनी नजर आती हैं।
'ट्रीज ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट
कुछ माह पहले 'ट्रीज ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट आई थी, जिसका अध्ययन 'जर्नल बायोडायवर्सिटी एंड कंजर्वेशन' में प्रकाशित हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में पेड़ों की 3708 से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन 347 प्रजातियों पर संकट छाया हुआ है, यानी हम विकास की दौड़ में अपने देश की पेड़ों की प्रजातियां की भी बलि चढ़ाते आ रहे हैं। खास बात यह है कि पेड़ों की 609 प्रजातियां तो ऐसी हैं, जो दुनिया में केवल भारत में पाई जाती हैं, यानी इन पेड़ों का मूल निवास भारत है।'नेचर' पत्रिका की एक रिसर्च कहती है कि भारत में 3518 करोड़ पेड़ हैं। प्रति स्क्वायर किलोमीटर के हिसाब से 11,109 पेड़ हैं, यानी प्रति व्यक्ति अगर आंकड़ा निकाला जाए तो यह संख्या केवल 28 होती है। प्रति व्यक्ति पेड़ों के लिहाज से हमारी दुनिया में 125 वीं रैंक है।
जनवरी 2022 में संसद में सरकार ने वन सर्वेक्षण रिपोर्ट-2021 जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि पिछले दो वर्षों में देश के कुल वन और वृक्षों से भरे क्षेत्र में 2261 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है। 17 राज्य/ केंद्र शासित शासित प्रदेशों का 33 प्रतिशत से अधिक भौगोलिक क्षेत्र वनों से पटा हुआ है। यह अच्छी बात है, लेकिन यदि सरकारी रिपोर्ट में दम है तो फिर यह पेड़ शहरों में क्यों नजर नहीं आते हैं?
प्रत्येक साल मानसून में व्यापक स्तर पर पूरे देश में पौधारोपण का युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जाता है। सैकड़ों पेड़ लगाने के बड़े-बड़े दावे होते हैं, लेकिन अमूमन देखा गया है कि पौधा लगाकर सरकार अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर लेती है और वो पौधा कभी पेड़ बना या नहीं, इसका कोई रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है। जिस तरीके से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। इसके दुष्प्रभाव हम मौसम के असामान्य होने में देख रहे हैं।
बढ़ता तापमान आज हमें परेशान कर रहा है, लेकिन क्या केवल चुनिंदा चौराहों पर हरा पर्दा लगाकर राहत प्रदान की जा सकती है। असहनीय धूप में दोपहिया वाहनों और पैदल यात्रियों का चलना बेहद मुश्किल है। सरकार राहत देने के लिए हरे पर्दे तो लगवाए, लेकिन ज्यादा जरूरी आज सड़कों को पेड़ों से पाट देने की है। अच्छा यह हो कि सड़क किनारे पेड़ लगाने के अभियान में सरकार के साथ आमजन भी जुड़े। पौधों को लगाकर ही कार्य की इतिश्री न की जाए। पौधे को पेड़ बनाने तक की जिम्मेदारी लोग अपने हाथों में लें।
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