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हॉर्मुज की घेराबंदी: भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता संकट

Sun, 01 Mar 2026 05:07 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 01 Mar 2026 05:07 PM IST
सार

खामेनेई के बाद ईरान में उपजी अनिश्चितता के बीच, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण और सख्त करने की आशंका बढ़ गई है। यह संकरा समुद्री मार्ग विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वहन करता है।

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The Siege of Hormuz: A Threat to India's Energy Security
पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप। - फोटो : ANI

विस्तार

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच भड़के भीषण सैन्य टकराव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। 1 मार्च 2026 की स्थिति में, ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के निधन की खबरों ने आग में घी का काम किया है।

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ईरान के भीतर संभावित सत्ता संघर्ष और बाहरी हमलों ने ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और वित्तीय व्यवस्थाओं को वैश्विक अस्थिरता के चरम पर पहुँचा दिया है। भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है, इस संकट के सबसे संवेदनशील दौर में है।
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ईरान में नेतृत्व का संकट और हॉर्मुज का सामरिक महत्व

सामरिक दृष्टि से हॉर्मुज की संकीर्णता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति और कमजोरी है। मात्र 33 किलोमीटर चौड़े इस मार्ग के अवरुद्ध होने से ओमान और ईरान के बीच का समुद्री यातायात ठप हो सकता है। ईरान इसे एक 'भू-राजनीतिक ढाल' के रूप में उपयोग करता है, जिससे वह वैश्विक महाशक्तियों पर दबाव बना सके।
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भारत के लिए इस मार्ग की सुरक्षा केवल व्यापारिक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है, क्योंकि यहाँ से होने वाली किसी भी बड़ी बाधा का सीधा असर हमारी औद्योगिक गति और परिवहन व्यवस्था पर पड़ेगा।

खामेनेई के बाद ईरान में उपजी अनिश्चितता के बीच, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण और सख्त करने की आशंका बढ़ गई है। यह संकरा समुद्री मार्ग विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वहन करता है।

भारत के लिए यह मार्ग एक 'ऊर्जा जीवनरेखा' है क्योंकि हमारा 60 प्रतिशत गैस और आधा कच्चा तेल यहीं से आता है। यदि यह मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध होता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर सकती हैं।

कच्चे तेल में 'युद्ध और अनिश्चितता' का उछाल

संघर्ष और ईरान में नेतृत्व के शून्य से 'ब्रेंट क्रूड' में 10 से 15 प्रतिशत का तात्कालिक उछाल देखा गया है। बाजार में इसे 'अनिश्चितता का अतिरिक्त मूल्य' कहा जा रहा है। भारत के लिए हर डॉलर की वृद्धि विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डाल रही है।

रुपये की कमजोरी (88 रुपये प्रति डॉलर के पार) इस मार को और घातक बना रही है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें घरेलू बाजार में 130 रुपये प्रति लीटर तक पहुxचने का खतरा पैदा हो गया है।

आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल एक डॉलर की वृद्धि भारत के वार्षिक आयात बिल में लगभग 10,000 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ा देती है।

यदि कीमतें 120 डॉलर के पार स्थिर रहती हैं, तो भारत का चालू खाता घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद के 3 प्रतिशत के खतरनाक स्तर को पार कर सकता है। इसके अतिरिक्त, तेल विपणन कंपनियों का 'अंडर-रिकवरी' बोझ बढ़ने से सरकारी राजकोषीय घाटे पर भी सीधा प्रहार होगा, जो अंततः विकास योजनाओं के बजट में कटौती का कारण बन सकता है।

भारत का सुरक्षा कवच: 74 दिनों की आकस्मिक योजना

इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए भारत ने अपनी आकस्मिक ऊर्जा योजना सक्रिय कर दी है। जहाँ अल्पकालिक संकट के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) सीमित नजर आते हैं, वहीं भारत की कुल भंडारण क्षमता अब एक अभेद्य ढाल के रूप में उभरी है।

वर्तमान में विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर के भूमिगत रणनीतिक भंडारों में लगभग 9.5 दिनों का कच्चा तेल आपात स्थिति के लिए सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त, देश की प्रमुख तेल शोधनशालाओं (रिफाइनरियों) जैसे IOC, HPCL और BPCL के पास लगभग 64.5 दिनों का कच्चा तेल और तैयार उत्पादों का भंडार सदैव मौजूद रहता है।

इस प्रकार, रणनीतिक और शोधनशाला भंडारों को मिलाकर भारत के पास लगभग 74 दिनों का कुल तेल भंडार उपलब्ध है। यह विशाल 'सुरक्षा चक्र' सरकार को युद्ध जैसे संकट के समय वैकल्पिक मार्गों, जैसे रूस या अफ्रीकी देशों से तेल की नई व्यवस्था करने के लिए दो महीने से भी अधिक का बहुमूल्य समय प्रदान करता है।

भविष्य की तैयारी: रणनीतिक भंडार का विस्तार

किसी भी वैश्विक युद्ध या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में 'रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार' भारत की जीवनरेखा हैं। वर्तमान में प्रथम चरण के तहत विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर (कर्नाटक) में विशाल भूमिगत चट्टानी गुफाओं में लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल सुरक्षित है, जो करीब 9.5 दिनों की आवश्यकता पूरी करता है।

संकट की गंभीरता को देखते हुए सरकार दूसरे चरण (Phase II) के अंतर्गत ओड़िशा के चंडीखोल और पादुर में अतिरिक्त भंडार बना रही है।

रिफाइनरी स्टॉक्स को मिलाकर भारत के पास कुल 74 दिनों का तेल बैकअप है, जो खाड़ी देशों में अस्थिरता के समय देश की अर्थव्यवस्था को 'ऊर्जा आघात' से बचाने के लिए एक अनिवार्य सुरक्षा ढाल है। पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए एक कड़वी चेतावनी है। खामेनेई के बाद का ईरान और हॉर्मुज की घेराबंदी भारत की ऊर्जा नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।

हालांकि, 74 दिनों का भंडार हमें कुछ समय की सुरक्षा देता है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल आयात पर निर्भरता घटाने और स्वदेशी ऊर्जा स्रोतों को सशक्त बनाने में ही निहित है। यह समय केवल आर्थिक प्रबंधन का नहीं, बल्कि सामरिक दूरदर्शिता का है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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