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पराली जलाने की समस्या: एक पर्यावरणीय संकट और कृषि की दुविधा

Mon, 29 Sep 2025 08:39 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 29 Sep 2025 08:39 AM IST
सार

अदालत ने पिछले साल भी सख्त रुख अपनाया था, जिसके बाद पंजाब में पराली जलाने के दस हजार से अधिक मामले सामने आए थे। लगभग दो करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से केवल सवा करोड़ रुपये की ही वसूली हो पाई।

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The problem of stubble burning: An environmental crisis and an agricultural dilemma
खेत में जलती पराली - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सदैव किसानों के प्रति सहानुभूति रखने वाला सर्वोच्च न्यायालय भी जब धैर्य खोकर पराली जलाने वाले दो-चार किसानों को जेल भिजवाने और कठोरता से पराली जलाने से रोकने की हिदायत पंजाब और हरियाणा की सरकारों को देने लगे तो इस समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। लेकिन विचारणीय विषय यह है कि इस गंभीर समस्या का समाधान अगर केवल जेल या कानून होता तो यह पिछले वर्ष या उससे पहले ही सुलझ चुकी होती।

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अदालत ने पिछले साल भी सख्त रुख अपनाया था, जिसके बाद पंजाब में पराली जलाने के दस हजार से अधिक मामले सामने आए थे। लगभग दो करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से केवल सवा करोड़ रुपये की ही वसूली हो पाई।
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पराली जलाने की समस्या भारत के कृषि क्षेत्र की एक पुरानी और जटिल चुनौती है, जो हर साल अक्टूबर-नवंबर में चरम पर दिखाई देती है। विशेषकर पंजाब और हरियाणा में धान की फसल कटाई के बाद बची पराली को जलाना न केवल हवा को जहरीला बनाता है, बल्कि स्वास्थ्य, मिट्टी की उर्वरता और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालता है।
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सर्वोच्च न्यायालय की चिंता: सख्ती की पुकार

सर्वोच्च न्यायालय ने पराली जलाने को 'प्रदूषण-मुक्त जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन' माना है। 17 सितंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की पीठ ने कहा, “कुछ किसानों को जेल भेजो, ताकि संदेश पहुंचे।” न्यायालय ने गिरफ्तारी और जुर्माने की सिफारिश की, हालांकि केंद्र सरकार ने नीतिगत समाधान पर अधिक बल दिया।

2023 में न्यायालय ने पंजाब सरकार को फटकारते हुए कहा था, “कैसे रोकें यह पता नहीं, लेकिन रोकना होगा।” हाल में आयोग को रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया गया, ताकि 'शून्य पराली जलाना' सुनिश्चित हो सके। न्यायालय का दृष्टिकोण है कि किसान महत्त्वपूर्ण हैं, पर प्रदूषण असहनीय है।

समस्या की जड़ें: कितनी पुरानी?

पराली जलाने की प्रथा भारत में कम से कम 1980 के दशक से प्रचलित है, जब हरित क्रांति ने पंजाब और हरियाणा को धान-गेहूं की दोहरी फसल का केंद्र बना दिया। हर साल भारत में लगभग 352 मिलियन टन पराली उत्पन्न होती है, जिसमें 22 प्रतिशत गेहूं और 34 प्रतिशत धान से आती है।

पंजाब में अकेले 70-80 लाख मीट्रिक टन धान की पराली जलाई जाती है, जो उत्तर भारत के वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है। 2015 में इसी से जुड़े प्रदूषण के कारण भारत में लगभग 66 हजार मौतें हुईं।

यह समस्या मुख्य रूप से पंजाब (32.44 लाख हेक्टेयर धान क्षेत्र, 2024) और हरियाणा (लगभग 110 लाख मीट्रिक टन धान उत्पादन, वित्त वर्ष 2023) तक सीमित है, लेकिन इसका असर पूरे उत्तर भारत में फैलता है। 2024 में आगजनी की घटनाएँ कम हुई थीं, लेकिन 2025 में खतरा फिर से मंडरा रहा है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण और मिट्टी पर प्रभाव

पराली जलाने से निकलने वाले धुएँ में सूक्ष्म कण (पी.एम. 2.5), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और काला कार्बन जैसे विषैले तत्व होते हैं, जो सांस की बीमारियाँ, कैंसर और हृदय रोगों को बढ़ाते हैं।

2020 के एक अध्ययन के अनुसार, यह दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है, जिससे सर्दियों में दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 से ऊपर पहुँच जाता है। पर्यावरण पर इसका गहरा असर पड़ता है काला कार्बन ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ाता है, ओजोन परत को नुकसान पहुँचता है और जैव विविधता घटती है।

मिट्टी के लिए तो यह अत्यंत हानिकारक है ऊष्मा से लाभकारी जीवाणु और फफूँद मर जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और फसल उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक कम हो सकता है। 2022 के एक अध्ययन में पाया गया कि पराली जलाने से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड 22 से 80 प्रतिशत और कार्बन मोनोऑक्साइड 7 से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

प्रदूषण का प्रसार: सीमाओं से परे

यह प्रदूषण केवल स्थानीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। पंजाब और हरियाणा से उठकर हवा के साथ यह दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (200 किलोमीटर दूर) तक पहुँचता है, जहाँ सर्दियों की स्थिर हवा इसे फंसाए रखती है। इसका असर उत्तर प्रदेश, राजस्थान ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और नेपाल तक भी जाता है।

2020 में बीबीसी की एक रिपोर्ट में बताया गया कि यह धुंध पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेती है, जिसके कारण विद्यालय बंद करने और स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने तक की स्थिति आ जाती है। सीमाओं से परे फैलने वाला यह प्रदूषण अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है।

किसानों का पक्ष: मजबूरी या लापरवाही?

किसानों के लिए पराली जलाना 'सबसे आसान और सस्ता' उपाय है, क्योंकि धान कटाई के बाद गेहूं बोने के लिए केवल 10 से 15 दिन का समय मिलता है। 2024 की एक रिपोर्ट में किसान ने कहा, “सरकार को समझना चाहिए कि हम भी इसी धुएं में सांस लेते हैं।” न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) के कारण धान-गेहूं का चक्र तोड़ना कठिन है, क्योंकि विकल्पी फसलें लाभदायक नहीं हैं। 

किसान संगठनों की मांग है कि 23 फसलों को एम.एस.पी. के दायरे में लाया जाए। उनका कहना है, “यह हमारी लालच नहीं, बल्कि नीतियों की मजबूरी है।” यदि विकल्प नहीं मिले तो किसान धान बोना बंद कर सकते हैं, लेकिन यह उनके लिए आर्थिक आत्मघात होगा।

पंजाब-हरियाणा सरकारों का रुख

दोनों राज्य सरकारें पराली जलाने पर सख्ती दिखा रही हैं—पंजाब ने 2024 में 38 प्रतिशत कमी दर्ज की, वहीं हरियाणा ने 25 प्रतिशत। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने 26 सितंबर 2025 को दोनों राज्यों के साथ बैठक कर 'शून्य पराली जलाना' को अनिवार्य बताया।

किसानों को सब्सिडी पर मशीनें (हैपी सीडर, सुपर सीडर) दी जा रही हैं, लेकिन समन्वय कमजोर है। पंजाब 'उड़नदस्ता' और प्राथमिकी पर जोर दे रहा है, जबकि हरियाणा शाम के समय निगरानी बढ़ा रहा है। दीर्घकालिक लक्ष्य किसानों के लिए लाभकारी पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है, फिर भी 2025 में प्रदूषण बढ़ने की आशंका बनी हुई है।

व्यवहारिक और वैज्ञानिक समाधान

व्यवहारिक और वैज्ञानिक समाधान के रूप में हैपी सीडर और सुपर सीडर जैसी मशीनें पराली को काटकर मिट्टी में मिला देती हैं, जिससे गेहूं की बुवाई आसान होती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 78 प्रतिशत तक घटता है।

पराली से बायोमास ईंधन ईंटें बनाई जा सकती हैं, जो बिजलीघरों में काम आती हैं। सूक्ष्म जीवाणुओं की मदद से इसे 30–40 दिन में खाद में बदला जा सकता है, वहीं मशरूम की खेती और पशु चारे में भी इसका उपयोग संभव है।

वैज्ञानिक नवाचारों में पराली को ‘बायोचार’ में बदलकर मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना, एथेनॉल उत्पादन से किसानों की आय बढ़ाना और मल्चर व सूक्ष्मजीवों द्वारा इसका प्राकृतिक विघटन शामिल है। जल्दी पकने वाली धान किस्में कटाई का समय घटाती हैं और पराली जलाने की आवश्यकता कम करती हैं। इन उपायों को सफल बनाने के लिए सरकार को सस्ती मशीनें और प्रशिक्षण किसानों तक पहुँचाना होगा।

धान/चावल उत्पादन: भारत की रीढ़

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। वित्त वर्ष 2020-21 में इसका उत्पादन लगभग 120 मिलियन टन रहा। पंजाब (11.5 मिलियन टन, 2023) और हरियाणा (4.5 मिलियन टन) मिलकर लगभग 20 प्रतिशत योगदान करते हैं। पंजाब में 2024 में 32.44 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान बोया गया, जिसमें से 6.39 लाख हेक्टेयर में बासमती की खेती हुई।

न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को आय सुनिश्चित होती है, लेकिन भूजल स्तर लगभग 80 प्रतिशत तक गिर चुका है और पराली की समस्या लगातार गहराती जा रही है। पूर्वी भारत, जो कुल उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत योगदान देता है, भविष्य की कुंजी माना जा रहा है।

यदि पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हुआ और किसानों को व्यवहारिक विकल्प नहीं मिले, तो वे धान की खेती छोड़ने को विवश हो सकते हैं। 2024 के विरोध प्रदर्शनों ने इस खतरे की ओर संकेत भी किया है। ऐसी स्थिति में चावल उत्पादन 20 प्रतिशत तक घट सकता है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकट खड़ा करेगा।

समग्र  दृष्टिकोण की आवश्यकता

पराली जलाने की समस्या केवल किसानों की नहीं है, बल्कि नीतियों, तकनीक और जन-जागरूकता की भी है। सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती, सरकारों का समन्वय और वैज्ञानिक नवाचार मिलकर ही इसे सुलझा सकते हैं। लेकिन जब तक किसानों को व्यवहारिक और लाभकारी विकल्प नहीं मिलेंगे, यह संकट जारी रहेगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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