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थोड़ी सी ज़िंदगी चख लोः एक होता था लैंप पोस्ट

Mon, 29 May 2023 12:29 PM IST
Kumar Rahman कुमार रहमान
Updated Mon, 29 May 2023 12:29 PM IST
सार

लैंप पोस्ट से भारत के लोगों का वैसा ही गहरा रिश्ता रहा है, जैसा मिट्टी के तेल वाली डिबरी का। वही डिबरी जिसे टीन के किसी डिब्बी या शीशी में मिट्टी का तेल भरकर उसमें कपड़े की बाती डाल कर जलाते थे। अब न वह डिबरी दिखती है और न ही अपना वो लैंप पोस्ट।

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The old Lamp Post: Memory History and story of lamp post
लैंप जलते ही बच्चे खुशी से ताली बजाते (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : istock

विस्तार

वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है। बस उनकी यादें भर रह जाती हैं। ऐसी ही एक याद है लैंप पोस्ट की। पोस्ट शब्द से यह बिल्कुल मत समझ लीजिएगा कि इसका ताल्लुक डाक या खत से है। यहां पोस्ट की मीनिंग खंभा है। लैंप पोस्ट मतलब लैंप वाला खंभा। लोहे के काले से एक खंभे के ऊपरी सिरे पर एक लैंप हुआ करता था। ऐसे लैंप पोस्ट हर गली-मुहल्ले में हुआ करते थे। इस लैंप के चारों तरफ शीशे लगे होते थे। तब बच्चे इतने शैतान नहीं होते थे कि गुलेल से निशाना लगाने का अभ्यास करें। उनके लिए तो यह लैंप खुशियों का चिराग था। रात में उनकी जिंदगी इसी के इर्द-गिर्द घूमा करती थी। बड़े गप्पे मारा करते थे।

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कहानी लैंप पोस्ट की

हम आपको जिस लैंप पोस्ट की कहानी सुनाने जा रहे हैं, वह अब शायद ही कहीं बचे हों। हो सकता है कि किसी पहाड़ी कस्बे में उसका चलन आज भी हो! सड़क के किनारे जो ऊंचे से खंभे पर जगमग करते बल्ब लगे होते हैं, इसे भी लैंप पोस्ट कह दिया जाता है, हालांकि वह हाई मास्ट, रोड लाइट या स्ट्रीट लाइट होती हैं। बस जरा स्वरूप अलग होता है। 

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लैंप पोस्ट से भारत के लोगों का वैसा ही गहरा रिश्ता रहा है, जैसा मिट्टी के तेल वाली डिबरी का। वही डिबरी जिसे टीन के किसी डिब्बी या शीशी में मिट्टी का तेल भरकर उसमें कपड़े की बाती डाल कर जलाते थे। अब न वह डिबरी दिखती है और न ही अपना वो लैंप पोस्ट। किसी जमाने में एक ऐसी जनरेशन भी थी, जिसने लैंप पोस्ट के नीचे बैठकर पढ़ाई की थी।
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शाम होते ही नगर पालिका का एक कर्मचारी साइकिल से आता था। साइकिल की एक हैंडल में छोटा सा झोला होता। उस झोले में माचिस की डिब्बी, कपड़े की बाती और कैंची रहती। दूसरी तरफ के हैंडल में कैरोसिन से भरा एक डिब्बा लटका होता। उनकी साइकिल में तीन डंडो वाली बांस की एक सीढ़ी भी बंधी होती। वह सीढ़ी को लैंप पोस्ट के खंभे के सहारे लगा देते।

फिर लैंप में मिट्टी का तेल भरते। उस लैंप की टंकी में उतना तेल डाला जाता कि वह सुबह तक अपने आप बुझ जाए, ताकि लैंप को सुबह बुझाने के लिए फिर न आना पड़े। तेल डालने के बाद वो लैंप को माचिस से जला देते। लैंप पोस्ट को जलाते ही उसकी रोशनी से आसपास का पूरा इलाका ही गुलजार हो जाता।
 

उनका काम बड़ा मजेदार और जिम्मेदारी भरा था। कई बार लैंप की बाती पर गुल आ जाता। गुल मतलब राख। इस वजह से लैंप आसानी से नहीं जलता था। तब वो कर्मचारी झोले से एक कैंची निकालकर तुरंत बाती का अगला सिरा काट देते और फिर उसे मिट्टी के तेल में डुबो कर फिर से लैंप में डाल देते। माचिस से लैंप पोस्ट को रोशन करके अगले ठिकाने की तरफ साइकिल बढ़ा ले जाते। ऐसे दर्जनों लैंप उन्हें जलाने होते। 

 


लैंप पोस्ट के नीचे सजती थी महफिल

लैंप की रोशनी काफी दूर तक जाती। लैंप जलते ही बच्चे खुशी से ताली बजाते। बच्चों को लैंप के नीचे पढ़ने के लिए बैठा दिया जाता। बच्चे बोरा बिछा कर घंटों उसके नीचे बैठे पढ़ा करते। बच्चों के जाते ही बड़े वहां पर आ बैठते। बड़े वहां अक्सर बैठकर कोई उपन्यास पढ़ा करते। कोई एक पढ़ता और बाकी उसे सुनते। कुछ घंटे यूं ही गुजार कर सभी घर की राह पकड़ते। लैंप पोस्ट के नीचे हर दिन धारावाहिक तौर पर उपन्यास सुनने के लिए महफिल सजती रहती।

मजेदार स्थिति तब होती अगर वहां पर ड्रॉक्यूला जैसा उपन्यास बढ़ा जाता। फिर तो हालात यूं होते कि जब महफिल खत्म होती तो बारी बारी से लोग दूर रहने वालों को उन के घर तक छोड़ने जाते। आस पास रहने वाले लोग भी जल्दी से विदा हो कर दरवाजा जल्दी से बंद कर डालते। कभी कोई फिल्म देखकर आता तो वह सभी को उसकी कहानी पूरे विस्तार से सुनाता। कुछ यूं खुशहाली बिखेरता था उन दिनों का लैंप पोस्ट।

ऐसे लोग अब भी मिल ही जाते हैं, जिन्होंने लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ाई की और फिर बुलंदी तक पहुंचे। सन् 2016 में खुफिया एजेंसी रॉ के चीफ बनाए गए अनिल कुमार धस्माना ने भी कभी लैंप पोस्ट के नीचे बैठकर पढ़ाई की थी। कुछ साल पहले तक लोग किसी के बारे में मिसालें देते हुए कहते, उसने लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ाई की और वो आज बड़ा अफसर है। लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ना एक मिथक जैसा बन गया। ये मेहनत और लगन का पर्याय जैसा है।
 

भारत में लैंप पोस्ट का कल्चर अंग्रेज ले कर आए। उन्होंने शहर की गलियों और मुहल्ले में लोहे के जरा ऊंचे से खंभे लगवाए। उसके ऊपर मोटी टीन की चादर का बना एक लैंप नट-बोल्ट से कसा होता था। काफी बड़े से इस लैंप के चारों तरफ शीशे लगे होते थे। इससे लैंप हवा चलने पर बुझता भी नहीं था और रोशनी भी देता था। लैंप को मिट्टी के तेल से जलाया जाता था।


उन दिनों देश में बिजली की कमी थी। इस वजह से पूरे देश में बिजली सप्लाई नहीं हो पाती थी। घरों में मिट्टी के तेल की डिबरी जलती और सड़क पर लैंप पोस्ट रोशनी बिखेरा करता। घर की डिबरी ज्यादा उजाला नहीं करती थी। वहीं लैंप पोस्ट काफी बड़ा होने की वजह से ज्यादा रोशनी देता था।

ऐसे लैंप पोस्ट यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के बाहर भी हुआ करते। हॉस्टल से निकलकर लड़के वहां खूब मस्ती करते। लैंप पोस्ट के नीचे चायखाने सजे होते। देर रात सभी वहां चाय की चुस्कियों के बीच दुनिया-जहान की बातें करते। खूब गप्पे मारते। नये-नये प्लान बनते। शरारतें करने की तरकीबें निकाली जातीं। 

चालीस साल पहले तक ऐसी व्यवस्था थी। बल्कि रेलवे के तमाम छोटे स्टेशनों पर उसके बाद भी लैंप पोस्ट दिख जाते थे। बाद में उनकी जगह सोलर लाइट ने ले लिया। तमाम जगहों पर बिजली कनेक्शन भी पहुंच गया। अब दौर बदल गया है। अब तकरीबन हर जगह पर ही बिजली पहुंच गई है। यही वजह है कि लैंप पोस्ट पुराने दिनों की बात हो गई है, लेकिन यह लैंप पोस्ट उस दौर के तमाम लोगों की यादों में अब भी रचा बसा है। उसके नीचे गुजारी अनगिनत बातें और किस्से अब भी याद हैं।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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