छोटा बसंता (ठठेरा पक्षी): रंगों, मेहनत और उम्मीद की कहानी, जो सिर्फ देखी नहीं… महसूस की जाती है
Coppersmith Barbet Nesting And Feeding Habits: इंदौर के सिरपुर तालाब पर दिखा ‘छोटा बसंता’ पक्षी अपनी चोंच से पेड़ में कलात्मक घर बनाता है। यह बीजों का प्रसार कर जंगल उगाता है, लेकिन बेमौसम बारिश और मैना के हमले इसके अस्तित्व के संघर्ष को दर्शाते हैं।
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Sirpur Lake Ramsar Site Indore Birding: हर जंगल में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो सिर्फ सुनी नहीं जातीं - महसूस होती हैं। सुबह की सुनहरी किरणें धीरे-धीरे इंदौर के सिरपुर तालाब की नीली लहरों पर बिखर रही थीं। हल्की हवा सरकंडों को हिला रही थी, और दूर कहीं से आती “टक-टक-टक” की लय तालाब के संगीत में एक नया सुर जोड़ रही थी।
मैं पक्षी विशेषज्ञ श्री रितेश खाबिया के साथ इस खूबसूरत रैमसर साइट पर बर्डिंग कर रहा था - एक ऐसी जगह जहां पानी, पेड़ और परिंदे सैकड़ों साल पुरानी साझेदारी में जीते हैं। उस सुबह मेरी नजर जिस छोटे से परिंदे पर पड़ी, वही इस कहानी का हीरो है - छोटा बसंता (ठठेरा पक्षी)। हरे मखमली पंख, माथे पर लाल टोपी, गले पर पीली झलक - जैसे किसी ने वसंत के रंगों को सावधानी से एक पंख में भर दिया हो। ‘ठक-ठक-ठक’ की उसकी आवाज़, दूर पेड़ों के बीच गूंजते हुए, आपको सहज ही उसकी तरफ खींच लाती है। यही वजह है कि इसे गाँवों में “ठठेरा पक्षी” कहते हैं, मानो कोई कारीगर तांबे की थाली पर हथौड़ी चला रहा हो।
छोटा बसंता सिर्फ रंगों का तोहफा नहीं, बल्कि एक अद्भुत कारीगर भी है। अपनी नुकीली पर ताकतवर चोंच से यह पुराने और मुलायम तनों में गोल सुराख बनाता है। वह सिर्फ एक छेद नहीं होता - यह एक सोच-समझकर बनाया गया वास्तुकला का नमूना होता है, जिसमें बाहरी हिस्सा छोटा और गोल, लेकिन भीतर का कमरा अंडाकार, आरामदायक और सुरक्षित होता है। मई-जून के सूरज में दिनभर मेहनत करके घोंसले को अंतिम रूप देना, अंदर मुलायम घास और लकड़ी का बुरादा बिछाना, फिर मादा का 2–4 सफेद अंडे देना - यह उसकी सालाना जीवन-कथा का अहम अध्याय है।
छोटा बसंता का स्वभाव सजग, मेहनती और शांत है। यह अपने साथी के साथ मिलकर अंडों को सेता है, बच्चों को खिलाता है और उनको उड़ना सिखाता है। न नर पीछे हटता है, न मादा - दोनों बराबरी से जिम्मेदारी निभाते हैं। यह नन्हा पक्षी जंगल का माली है। इसका मुख्य भोजन अंजीर, जामुन, पीपल और बरगद जैसे पेड़ों के फल हैं। फल खाते समय यह बीज को अपने चोंच और पंखों पर लेकर लंबी दूरी तक पहुंचाता है। इस प्रकार बीज नई जगह पर गिरते और अंकुरित होते हैं - यही प्रक्रिया जंगल का पुनर्जन्म कराती है। इसके बिना कई वृक्षों का विस्तार संभव नहीं होगा। यह मानो हर साल सैकड़ों पौधों का “बीजारोपण उत्सव” अकेले ही करता है। साथ ही, यह फलों के साथ-साथ छोटे-छोटे कीड़े भी खाकर पेड़ों को कीटों से बचाता है।
जंगल का हर नया अंकुर, उसकी ठक-ठक की अनदेखी गूंज का ही तो नतीजा है…
छोटा बसंता की दुनिया पूरी तरह पेड़ों से जुड़ी है, पार्क, बगीचे, खेतों की मेड़, और सबसे अहम- पुराने, खोखले तने। इन तनों में यह घर भी बनाता है और भोजन भी तलाशता है। इतना ही नहीं, प्रकृति में यह कई अन्य पक्षियों और जानवरों के साथ अप्रत्यक्ष सहयोग में जीता है। कभी इसके गिराए बीजों से बाकी जीवों को भोजन मिलता है, तो कभी यह उन्हीं पेड़ों पर लौटता है जो किसी और पक्षी के छोड़े बीज से उगे हों। जंगल का यह चक्र इसके बिना अधूरा है। पिछले साल, हमने सिरपुर तालाब के किनारे एक पुराने पेड़ में छोटा बसंता का प्रेमालाप और फिर अंडों का आगमन देखा। सब कुछ सही दिशा में लग रहा था -लेकिन तभी कहानी में एक और पात्र आया - ब्रह्मणी मैना।
यह सुंदर परंतु आक्रामक पक्षी खुद खोखले पेड़ में चोंच से घोंसला बनाने में सक्षम नहीं होता, बल्कि किसी और द्वारा बनाए गए घर पर नजर रखता है, वैसे यह खाली कोटर की तलाश में रहता है पर न मिलने पर इंतजार करता है कि कोटर में रहने वाली पक्षी की नेस्टिंग खत्म हो जाए तो वह अपनी नेस्टिंग प्रारंभ करे...
मैना दूर से घोंसले को देख रही थी, जैसे कोई खाली मकान पर नजर रखता है। इस बीच मौसम ने करवट ली - बेमौसम बारिश ने लगातार 4–5 दिन तक घोंसले को भिगो दिया। कोटर के भीतर नमी भर गई, तापमान गिर गया और पहले clutch (अंडों का समूह) के अंडे खराब हो गए। लेकिन छोटे बसंते ने हार नहीं मानी - फिर से घोंसला सजाया, साथी के साथ प्रजनन किया और नए अंडे आए।
बारिश की वजह से समय लगभग 10–15 दिन पीछे चला गया। जब नए चूजे अभी छोटे और कमजोर थे, ब्राह्मणी मैना ने मौका देखा - और अपने बच्चों के लिए जगह बनाने के लिए बसंता के बच्चों को मार डाला। इस अनोखी घटना को श्री रितेश खाबिया सर ने अपने कैमरे में कैद किया।
यह सिर्फ दो पक्षियों का संघर्ष नहीं था- यह जलवायु परिवर्तन, घटते पुराने पेड़ और सीमित संसाधनों का परिणाम था। छोटा बसंता का अस्तित्व प्रकृति की रंगीन सांस है। उसकी ‘टक-टक-टक’ सिर्फ एक आवाज नहीं, बल्कि जंगल में जन्म लेने वाली नई जिंदगियों की दस्तक है।
अगर हम पुराने पेड़ बचाएं, बेमौसम बारिश को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन पर काम करें, और हरियाली को जगह दें तो यह नन्हा कारीगर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उसी तरह घोंसले बनाएगा, बच्चों को पालेगा, और बीजों को यात्रा पर भेजेगा। शायद किसी गर्मी की सुबह, सरकंडों की सरसराहट के बीच, फिर से उसकी ठक-ठक हमें सुनाई दे और इस बार, वह सिर्फ अपने घर बनाने की आवाज नहीं, बल्कि अपने बच्चों के गीत भी सुनाए।
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