इतिहास: सिनौली उत्खनन ने सिद्ध किया, आर्य भारत के मूलनिवासी
भारत की परतंत्रता व पुरातात्विक साक्ष्यों की कमी व अनदेखी ने इस मिथक को स्थापित कर दिया की आर्य नामक एक जाति भारत में मध्य एशिया से आई थी l कहा जाता था की 1500 ई. पू. में मध्य एशिया से आए तथाकथित आर्य भारत में रथ लेकर आए l परन्तु सिनौली से प्राप्त रथ तो 2000 ई.पू. के हैं तथा 1500 ई. पू. से अधिक प्राचीन हैं l
विस्तार
वैदिक काल और आर्य यह दो ऐसे शब्द हैं जो भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के इतिहासकारों व आमजनमानस को 19वीं शताब्दी से आकर्षित किए हुए हैं l अंग्रेजों के भारत में स्थापित हो जाने के बाद उनके इतिहासकारों ने मजबूती से इस बात को स्थापित करने का प्रयास किया की आर्य नामक एक जातीय समूह 1500 ईसा पूर्व में मध्य एशिया से चलकर भारत आयाl उनके अनुसार ये वही लोग थे जो भारत में अपने साथ घोड़े व रथ लेकर आए l
भारत की परतंत्रता व पुरातात्विक साक्ष्यों की कमी व अनदेखी ने इस मिथक को स्थापित कर दिया की आर्य नामक एक जाति भारत में मध्य एशिया से आई थी l उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में हिंडन व यमुना नदी के मध्य में स्थित सिनौली नामक पुरास्थल से सन् 2018 -19 में मिले पुरावशेषों ने यूरोपीय इतिहासकारों व उनके अनुगामी भारतीय इतिहासकारों द्वारा रचित आर्य आगमन के मिथक को धराशाई करने का कार्य किया है l
कहा जाता था की 1500 ई. पू. में मध्य एशिया से आए तथाकथित आर्य भारत में रथ लेकर आए l परन्तु सिनौली से प्राप्त रथ तो 2000 ई.पू. के हैं तथा 1500 ई. पू. से अधिक प्राचीन हैं l इतना ही नहीं, भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में रथों को सूर्य किरणों से आलोकित होने की चर्चा की गई हैl
सिनौली से मिले काष्ठ निर्मित रथों के पहियों में ताम्बे से जो जड़ाई का कार्य किया गया है वह सूर्य के फैलते हुए प्रकाश जैसा ही है l इस प्रकार सिनौली से मिले रथ व ऋग्वेद में वर्णित रथों में साम्यता है l
हड़प्पा उत्खनन में भी मिलता है साक्ष्य
यहां यह बात भी उल्लेखनीय है की हड़प्पा उत्खनन की विवरणिका (1940) में भी ताम्र निर्मित रथ प्राप्त होने का विवरण उपलब्ध है । दुर्भग्यवश इस रथ की बात इतिहास की किसी पुस्तक में नहीं की गई है। जहां तक बात घोड़े की है तो सिनौली के उत्खननकर्ता के अनुसार रथ के वजन व माप के अनुसार यह रथ घोड़े के द्वारा खींचना ही सम्भव थाl इतना ही नहीं, घोड़े के अवशेष सरस्वती सिंधु सभ्यता के विभिन्न पुरास्थल जैसे सुरकोटदा, लोथल, रंगपुर, शिकारपुर आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं l
घोड़े के इन अवशेषों का उल्लेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उत्खनन विवर्णिकाओं में उपलब्ध है l
दुर्भाग्यवश रथ की तरह घोड़े के साक्ष्यों को भी इतिहास की पुस्तकों में स्थान नहीं दिया गया । पुरातात्विक साक्ष्यों व ऋग्वेद के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है की रथ व घोड़े भारत में 2000 ई. पू. के पहले से विद्यमान थेl अतः रथ व घोड़े के आधार पर आर्य आगमन की बात करना तथ्यहीन है l
सिनौली में हुए उत्खनन से हमें योद्धाओं द्वारा पहने जाने वाले ताम्र निर्मित शिरस्त्राण भी मिले हैं l यह शिरस्त्राण मृत शरीर के साथ ही दफनाए गए थे l भारत में इससे पूर्व इस काल के शिरस्त्राण प्राप्त नहीं हुए थे l ऋग्वेद के छठे मंडल में वैदिक देवता मरुतों के द्वारा युद्ध में जाते समय शिरस्त्राण पहने जाने के उल्लेख है l यह पुरावशेष भी सिनौली के लोगों में प्रचलित वैदिक परम्परा का ही द्योतक हैl
सिनौली से ही मिले कई शवाधानों में एक शवाधान में स्थित काष्ठ निर्मित एक शवपेटिका ऐसी भी है जिसपर ताम्बे की नौ मुखाकृतियां बनाई गई हैं l इन मुखाकृतियों ने बैल के सींग युक्त मुकुट पहने हैं l निश्चित तौर पर शवपेटिकाओं पर बनी इन मुखाकृतियों का कोई धार्मिक प्रयोजन है l
यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक हो जाता है की ऋग्वेद में इंद्र व अग्नि को बैलों के सींग से युक्त मुकुट पहनाए जाने की चर्चा की गई है l पुरातत्वविदों का ऐसा मत है की यह मुखाकृतियां वैदिक देवता इन्द्र और अग्नि की हैं l भारतीय जनमानस में दीर्घकाल से यह भ्रम रहा है की उनके समाज में मृत्योपरांत शव को केवल जलाने की ही परम्परा रही है l
ऋग्वेद के दसवें मंडल में शवों को दफनाने के कई उल्लेख उपलब्ध हैं l भारतीय समाज में आज भी शवों को जलाने व भू समाधी देने की परम्परा विद्यमान है ।
कई पाश्चात्य विद्वानों ने सिनौली के इन रथों को मध्य एशिया से आने वाले तथाकथित आर्यों से जोड़ने का प्रयत्न किया है l जिन आर्यों के आगमन का समय पूर्व में 1500 ई.पू. बताया जाता था उसे अब 2000 ई.पू. ले जाने के प्रयत्न किये जा रहे हैं l परन्तु ये इतिहासकार यह भूल जाते हैं की सिनौली के कंकालों का डीएनए व राखीगढ़ी से मिलने वाला 2500 ई.पू. का डीएनए समान है l ऐसे में सिनौली के लोगों को मध्य एशिया से आए आर्य बताना पूर्णतः तथ्यहीन है l
इसके साथ ही अमेरिकी मानव वैज्ञानिक लुकॉक्स व कैनेडी के शोध के अनुसार उत्तर पश्चिम भारत में 800 ई.पू. तक की जनसंख्या में कोई मध्य एशियन डीएनए उपलब्ध नहीं हैl डीएनए पर कुछ ऐसा ही परिणाम हाल ही में हुए शोध कार्यों में भी प्राप्त हुआ है l साथ ही, यदि सिनौली के निवासी पश्चिम दिशा से आए थे तो सिनौली जैसे पुरावशेष उस क्षेत्र से भी प्राप्त होने चाहिए लेकिन ऐसे कोई पुरावशेष हमें आगमन के उस मार्ग पर दिखाई नहीं देते ।
ऋग्वेद में वर्णित शवों को दफनाने की परम्परा, सिनौली से मिलने वाले शवाधान व पुरावशेषों के ऋग्वेद में वर्णित श्लोकों से साम्यता इस बात की ओर इंगित करती हैं की सिनौली में आज से 4000 वर्ष पूर्व रहने वाले लोग वैदिक परम्परा के अनुयायी थे l इतना ही नहीं राखीगढ़ी व सिनौली से मिले कंकालों के डीएनए में साम्यता इस बात का अकाट्य प्रमाण है की 1500 ई.पू. में आर्य नामक कोई मानव समूह घोड़े युक्त रथों पर सवार हो मध्य एशिया से भारत में नहीं आयाl
भारत में आज से 4000 वर्ष पूर्व के पहले से ही वैदिक मान्यताओं का अनुसरण करने वाले लोग रहा करते थे और वे इसी भूमि के मूलनिवासी थे l
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।