Teachers Day 2023: क्या शिक्षक दिवस से सम्मान लौट पाएगा?
एक ऐसा दौर था जब माता-पिता खुद कहते थे कि ''मास्टर जी खुली छूट है आपको, खींचकर रखना इसे...लेकिन एक आज का दौर है जहां बच्चों को रत्ती भर डांटने पर भी बात का बतंगड़ बन जाता है।
विस्तार
Teachers Day 2023: मुझे आज भी याद है एक बार स्कूल में गणित का सवाल न आने पर मेरे अध्यापक ने मुझसे कहा-
कल अपने पापा को बुलाकर लाना। घर आकर पापा के पास यह कहने की हिम्मत नहीं थी कि आपको कल स्कूल में गणित के अध्यापक ने बुलाया है।
दरअसल, मुझे यह मालूम था यदि पापा को यह पता लगा स्कूल से शिकायत आई है तो सबसे पहले घर में पिटाई होगी फिर स्कूल जाकर शिक्षकों को खुद बोलकर अपने सामने उनसे पिटाई करवाई जाएगी, इसलिए मैंने घर में यह बात नहीं बताई कि आपको कल बुलाया है क्योंकि यह भी पता था यदि घर में नहीं बताया तो शिक्षक खुद ही अगले दिन लेखा-जोखा बराबर कर देंगे और यह हिसाब-किताब घर वालों के आक्रोश से कहीं अधिक सस्ता होता था।
वह एक ऐसा दौर था जब माता-पिता खुद कहते थे कि ''मास्टर जी खुली छूट है आपको, खींच कर रखना इसे...लेकिन एक आज का दौर है जहां बच्चों को रत्ती भर डांटने पर भी बात का बतंगड़ बन जाता है।
बच्चा यदि घर में कह दे कि फलां-फलां शिक्षक ने मारा या डांटा है, अभिभावक बिना जांच-पड़ताल किए शिक्षक को सबक सिखाने पर उतारू हो जाते हैं।
बच्चों के सामने कहते हैं-
"उसकी हिम्मत कैसे हुई हमारे बच्चे को हाथ लगाने की, हम देखते हैं उसको कल...बहुत से माता-पिता को शिक्षकों के साथ आजकल आम कहते सुना जा सकता है कि "जी और तो कुछ नहीं इकलौता बेटा है या इकलौती संतान है इसलिए थोड़ा जिद्दी है आप प्यार से समझाएं।
कुछेक तो यहां तक कह देते हैं कि-
" कोई बात नहीं यदि नहीं पढ़ेगा हमनें खूब कमाया है लेकिन वे भूल जाते हैं औलाद योग्य होगी तो कमाने में भी पीछे नहीं रहेगी और यदि औलाद बिगड़ैल होगी तो जो कमाया है उसे भी खत्म कर देगी। सही बात है बच्चों का शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न नहीं होना चाहिए लेकिन क्या एक शिक्षक का डर भी नहीं होना चाहिए? या फिर ऊना में प्रधानाचार्य की हुई पिटाई की तरह शिक्षक को ही छात्रों का भय होना चाहिए? आए दिन शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें आती हैं तब समाज, व्यवस्था और मीडिया द्वारा वैसी प्रतिक्रिया नही आती जैसी बच्चों के संदर्भ में आती है। बच्चों के अधिकारों की बात सभी करते हैं लेकिन शिक्षकों के अधिकारों की बात कोई नहीं करता।
भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन जो कि स्वयं एक शिक्षक थे उनका जन्मदिन भी 5 सितंबर को आता है। उपराष्ट्रपति बनने के बाद इन्होंने जब राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाली तो उनके जन्मदिन पर कुछ पूर्व छात्र उन्हें बधाई देने पहुंचे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने कहा कि मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय आप इस दिवस को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाए।
प्रत्येक वर्ष देश व प्रदेश के शिक्षकों में से शिक्षक दिवस पर कुछेक शिक्षकों को राज्य व राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाता है। हाल ही में राज्य पुरस्कार से पुरस्कृत शिक्षकों ने सरकार के इस फैसले का विरोध करना शुरू कर दिया कि भविष्य में सरकार की ओर से पूर्व में मिलने वाले वेतन व अन्य वित्तीय लाभ अब पहले की तरह नहीं मिलेंगे। सेवा विस्तार पर उन्हें महज अब फिक्स वेतन मिलेगा।
एक बात सोचने वाली है क्या हम शिक्षक पुरस्कार की अपेक्षा इसलिए रखते हैं ताकि भविष्य में सेवा विस्तार व वित्तीय लाभ पा सकें यदि यही उद्देश्य है तब तो इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पर ही सवालिया निशान खड़ा हो जाता है।
यह आरोप कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि इस पेशे से जुड़े हुए लोग ही लगाते आए हैं कि इनके चयन में सिफारिश चलती है, जो हार्ड कॉपी की दस्तावेजी फाइल अच्छी बना देता है वह पुरस्कृत हो जाता है, भले ही धरातल पर उसने कुछ भी न किया हो।
खैर जरूरी नहीं सभी पुरस्कृत शिक्षकों का अच्छी फाइल देखकर ही चयन हुआ हो, कुछेक का कार्य अन्य से हटकर और समाज को बच्चों के माध्यम से नई दिशा देने वाला होता है और इसके लिए वे ऐसे पुरस्कारों के हकदार भी होते हैं।
बहुत से शिक्षक अपने कार्य के प्रति पूरी निष्ठा से समर्पित होते हैं उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वही होता है जब उनके पढ़ाए सभी बच्चे भले ही ऊंचे ओहदों पर न पहुंचे, परंतु उन सभी बच्चों का अपने शिक्षक के प्रति आज व भी उतना ही मान-सम्मान बरकार रहे जितना विद्यालय के दिनों में होता था।
आज एक दिन भले ही शिक्षक दिवस मनाने के लिए बन गया है लेकिन ताजा हालात में अन्य दिवस तो शिक्षक अपमान दिवस बन चुके हैं। इस अपमान के लिए शिक्षक व समाज दोनों दोषी हैं। एक शिक्षक को जितना व्यवस्था ने हाशिए पर धकेला उतना शायद ही कोई और जिम्मेदार हो?
आज शिक्षकों की असंख्य समस्याएं हैं, लेकिन पूछने वाला कोई नहीं, यदि इनसे पूछेंगे तो ये जरूर बताएंगे, हर कोई सरकारी स्कूलों में किए जा रहे सुधारों की बात से बहुत खुश होता है क्योंकि "सुधार" शब्द को लोग केवल शिक्षकों से जोड़कर देखते हैं, जब भी मीडिया, सोशल मीडिया पर खबर आती है कि औचक निरीक्षण के दौरान ड्यूटी से नदारद पाए गए शिक्षक हुए निलंबित, तो ऐसी खबरों को लोग बड़े चाव से पढ़ते हैं व दूसरों को सुनाकर खुश होते हैं, सभी अध्यापक ड्यूटी से व अपने घरेलू कार्य के लिए नदारद नहीं रहते। घर का काम करने के लिए उन्हें भी अन्य कर्मचारियों की तरह छुट्टियां मिलती हैं, लेकिन शिक्षकों को मिलने वाली छुट्टियां ही सबको क्यों अखरती हैं?
यहां तक की एमडीएम के खाने की जांच मे दाल पतली तो दिख जाती है लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि चार-चार महीनों तक बिना बजट प्रावधान के भी शिक्षक अपनी जेब से खर्च कर बच्चों को खाना खिला रहा है। क्या हमारा समाज मात्र शिक्षक को कोसने भर से खुश होता रहेगा? क्या एक विद्यार्थी का भविष्य पूरी तरह केवल शिक्षक पर ही निर्भर है?
कोई भी व्यक्ति विद्यार्थी से पहले एक अनजान बच्चा होता है और उसके भविष्य की शुरुआत अपने मां-बाप व घर के माहौल से होती है, इसके बाद बारी आती है शिक्षक तथा स्कूल की। शिक्षक के साथ स्कूल में सरकार द्वारा सौंपी गई अन्य जिम्मेदारियां भी जुड़ जाती हैं। बच्चों को तैयार करके सुबह स्कूल भेज देने व फिर शिक्षकों पर पूरी जिम्मेदारी लाद कर उनके व्यवहार में मीन-मेख निकालने लग जाने से मां-बाप की जिम्मेदारियां खत्म नहीं हो जाती।
किसी ने नहीं सोचा कि तब तक शिक्षक कैसे अपने कर्तव्य का सही ढंग से निर्वाह कर पाएगा जब तक वह गुलामी और तनाव के वातावरण मे कार्य करता रहेगा, भले ही सरकारी स्कूलों में ज्यादातर गरीब व मजदूर वर्ग के बच्चे पढ़ते हों लेकिन अपनी गरीबी का बहाना बनाकर वे अपने दायित्व से विमुख नही हो सकते कि अब शिक्षक ही जाने, शिक्षक ने किसी को गरीब व मजबूर नहीं बनाया।
समाज का एक वर्ग कहता है कि सरकारी स्कूलों मे सरकारी शिक्षकों के बच्चे भी पढ़ने चाहिए लेकिन शिक्षक ही क्यों? क्या सबके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ने चाहिए।
सबसे पहले शुरुआत नीति निर्माताओं और नीति निर्धारकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिल करवा के करनी चाहिए। तभी सरकारी स्कूलों में हर चीज पटरी पर आ सकती है क्योंकि तब व्यवस्था किसी भी शिक्षक को स्कूल में न रसोईया, न मिस्त्री, न डाकिया, न जेई, न सर्वेक्षक, न निर्वाचन अधिकारी, न फार्मासिस्ट,न चपरासी, न पर्यवेक्षक, न ही बाबू, न ग्राम अधिकारी, न ही चपरासी, न ही जनगणना अधिकारी आदि बनने देगी क्योंकि तब कोई नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे को ज्ञान देने वाला शिक्षक अन्य कार्यों पर अपनी ऊर्जा गंवाए तब शिक्षक का असली कार्य शिक्षण होगा।
इन सब पहलुओं के बावजूद यह कतई नहीं कि एक शिक्षक अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए उसे अपनी जिम्मेदारी निभानी ही पड़ेगी। भारत में गुरु-शिष्य की बड़ी लंबी परंपरा रही है।
आज जरूरत है शिक्षक को अपने अंदर छिपे उस शिक्षक को बाहर निकालने की जो स्वंय को तो सत्य मार्ग दिखाए ही साथ ही देश की वर्तमान व भावी पीढ़ी को भी उस मार्ग पर प्रशस्त कर सके जिसकी देश को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है।
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