कश्मीर पर सामयिक विश्लेषण: आखिर क्यों हो रही है टारगेट किलिंग से बार-बार माहौल बिगाड़ने की कोशिश?
कश्मीर की वादियों से सीमा पार तक से रची जा रही इस साजिश के जरिये कश्मीरी पंडितों की वापसी, अमरनाथ यात्रा और लोकतंत्र की खातिर होने वाले चुनाव में खलल के नापाक मंसूबे साफ झलक रहे हैं।
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जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटने के बाद जैसे-जैसे हालात सुधरने लगे थे, वैसे-वैसे फिजा बिगाड़ कर जहर घोलने की पुरजोर साजिश भी परवान चढ़ने लगी है। कश्मीर में एक महीने के भीतर करीब 9 कश्मीरी पंडितों व गैर कश्मीरी हिंदुओं की टारगेट किलिंग के पीछे कई वजहें हैं। कश्मीर की वादियों से सीमा पार तक से रची जा रही इस साजिश के जरिए कश्मीरी पंडितों की वापसी, अमरनाथ यात्रा और लोकतंत्र की खातिर होने वाले चुनाव में खलल के नापाक मंसूबे साफ झलक रहे हैं।
पाक के आतंकी संगठन सक्रिय हैं, जो घाटी के युवाओं को बरगला कर उनके कंधे पर बंदूकें रखकर अशांति और डर का माहौल पैदा कर रहे हैं।
दरअसल, 370 की वापसी के बाद कश्मीर में तेजी से हालात बदले हैं। पर्यटन के लिहाज से कश्मीर फिर धरती का स्वर्ग साबित होने लगा। सारे होटल पैक रह रहे हैं। निवेश का माहौल पूरी तरह से इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि निवेशकों में असुरक्षा की भावना कम नहीं हुई है, फिर भी घाटी में बाहरी के जमीन खरीदने के दो मामले आए। घाटी के मुकाबले जम्मू में निवेशकों का उत्साह ज्यादा है। हाल के वर्षों में आतंकियों पर नकेल डाली गई तो आतंक से जुड़े युवाओं को मुख्यधारा में लाने की पुरजोर कोशिशें भी हुईं।
कश्मीरी पंडितों की घर वापसी
कश्मीरी पंडित भले असुरक्षा की भावना से अब भी पूरी तरह से कश्मीर लौटने का साहस नहीं जुटा पा रहे हों लेकिन प्रधानमंत्री पैकेज के तहत करीब 5-6 हजार कश्मीरी पंडितों ने नौकरियां हासिल कर घर वापसी की है। 370 की वापसी से पहले भी जम्मू-कश्मीर में आतंकी सगंठनों द्वारा भटकाव के शिकार पत्थरबाज युवाओं या संगीनें थामने वालों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए नौकरियों में अवसर प्रदान किए गए। कुछ ने नौकरियां हासिल कर ली लेकिन वे तब भी साजिश के हिस्सा या सूत्रधार बने रहें।
अब जब कश्मीरी पंडितों को पीएम पैकेज के तहत नौकरियां मिल रही हैं तो तेजी से उनकी घर वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ऐसे में आतंकियों ने राहुल भट्ट, टीवी कलाकार आमरीन और शिक्षिका के बाद अब राजस्थान से जुड़े बैंक प्रबंधक को निशाना बनाकर डर का माहौल पैदा किया है। ऐसा तब भी किया गया, जब बिहार से जुड़े मजदूरों के सामूहिक कत्लेआम किए गए।
खूनखराबे से कश्मीरी बनाम गैर कश्मीरी का जहर घोलने की साजिश लगातार जारी है। डर का माहौल पैदा करने के पीछे कश्मीरी पंडितों की घर वापसी को रोकना और गैर कश्मीरियों व हिंदू अल्पसंख्यकों को वादियों में सुकून की सांस लेने से रोकने का नापाक इरादा साफ है।
अमरनाथ यात्रा की आस्था
अब 30 जून से अमरनाथ यात्रा शुरू होने जा रही है, यह आस्था का सवाल है। कोरोना की वजह से दो साल से अमरनाथ यात्रा नहीं हो पाई। इस बार भव्य यात्रा की तैयारी की गई है। आमतौर पर अमरनाथ यात्रा में पहले 2-3 लाख श्रद्धालु शामिल होते थे। इस बार उम्मीद की जा रही है कि यह संख्या पहले से ज्यादा होगी। तैयारी तो 5 से 8 लाख श्रद्धालुओं के हिसाब से की जा रही है। अमरनाथ यात्रा के पंजीयन की शुरुआत में ही 1 जून तक यह आंकड़ा ढाई लाख को छू चुका है। ऐसे में अमरनाथ यात्रा की आस्था में अशांति की ताजा घटनाएं भी खलल की साजिश का हिस्सा हैं।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के बाद से लोकतंत्र की खातिर चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। हालांकि, परिसीमन का विवाद फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और गर्मी की छुट्टी के बाद ही इस पर सर्वोच्च अदालत ने गौर करने का मन बनाया है,लेकिन गुपकार गुट से लेकर तमाम राजनीतिक पार्टियां परिसीमन को लेकर सवाल खड़े कर चुकी हैं।
यूं भी जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले वहां शांति बहाली की बड़ी जिम्मेदारी अब सरकार पर है। चुनाव से भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में भले सत्ता लाभ न मिल पाए लेकिन चुनाव कराकर केंद्र सरकार दुनिया के सामने लोकतंत्र का संदेश तो देना चाहेगी ही।
जम्मू-कश्मीर के बदले हालात का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि जहां 370 हटने के बाद एक साल से ज्यादा दिनों तक इंटरनेट पाबंदी रही, हर जुमे को इंटरनेट की पाबंदी मजबूरी थी, वहां आतंकी मामलों में अलगाववादी यासीन मलिक को सजा के फैसले पर महज कुछ घंटों के लिए ही इंटरनेट सेवाएं रोकी गईं, छिटपुट पत्थरबाजी हुई, फिर अमन-चैन। यह भी जम्मू-कश्मीर के तेजी से बदलते हालात की मिसाल है।
शांति व स्वर्ग की आस
टारगेट किलिंग से उपजे हाल के हालात पर अब केंद्र फिर सख्ती और समीक्षा की स्थिति में है। गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए दोभाल के बीच मंत्रणा के बाद शुक्रवार को फिर उच्चस्तरीय बैठक में प्रदेश और केंद्र सरकार मंत्रणा कर माहौल सामान्य करने की दिशा में बड़े और कड़े फैसले ले सकती है। जाहिर है, शांतिपूर्ण अमरनाथ यात्रा व टारगेट किलिंग रोकना पहली प्राथमिकता होगी।
यूं भी कश्मीरी पंडितों, हिंदुओं और गैरकश्मीरियों से लहूलुहान कश्मीर में उबाल चरम पर है। कश्मीरी पंडित व हिंदू पीड़ित परिवार सुरक्षा और शांति चाहते हैं। वे सामूहिक पलायन और तबादले की जिद पर अड़े हैं। दूसरी तरफ, कश्मीर में इस्लामिक आतंक, पाक के नापाक इरादे, आतंकी आर्थिक मदद व हवाला कनेक्शन, अलगाववादियों की गुपचुप सक्रियता लगातार चुनौती पैदा कर रही है।
ऐसे में केंद्र सरकार ने 370 हटाकर जैसे 56 इंच का सीना दिखाया,उतनी ही मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति से कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाने के लिए बड़ी पहल की जरूरत अब महसूस की जा रही है। केंद्र और राज्य सरकार की ढृढ़ इच्छाशक्ति से ही कश्मीर में आगे हालात और सुधरेंगे। कश्मीर में शांति के साथ-साथ स्वर्ग की आस अभी कायम है।
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