यूएस-तालीबान शांति समझौता बन सकता है भारत के लिए मुसीबत
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तालिबान-अफगानिस्तान समझौता इस पहाड़ी देश के गले की हड्डी बन रहा है। शिया मुस्लिमों की एक रैली पर हमला इसका सुबूत है। इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है। यानी यह संगठन भी शिया विरोधी है और तालिबान भी शियाओं को फूटी आंखों नहीं देखते। इसका अर्थ यह कि दोनों संगठनों में कहीं न कहीं अंतर संबंध है।
इससे पहले तालिबान ने अफगानी फ़ौज पर यह कहते हुए हमला किया था कि उसने तो परदेसी सैनिकों को नहीं मारने का क़रार किया है। इसके बाद सोलह राज्यों में तालिबानी हमले हुए। इसके अलावा एक फुटबॉल स्टेडियम उड़ा दिया और एक महिला को पत्थरों से पीट कर मार डाला। इस तरह एक बार फिर अपने ढंग से इस्लामी सत्ता क़ायम करने की कोशिश।
दरअसल, तालिबान -अमेरिकी क़रार से संशय भरे सवाल उभरते हैं। अव्वल तो यह कि अब तालिबान और अफगान सरकार के रिश्ते कैसे होंगे ? तालिबान ने यह समझौता कोई मनोरंजन के लिए नहीं किया है। वे हर हाल में सत्ता में भागीदारी चाहेंगे।
अमेरिकी बैसाखियां हट जाने के बाद अफगानिस्तान की अमेरिकी कठपुतली सरकार उन्हें कैसे रोकेगी? अपनी दम पर अगर वह तालिबान को रोकने में सक्षम होती तो फिर नाटो फ़ौज की ज़रूरत ही क्या थी ?
अफ़गान अवाम शान्ति चाहती है। तालिबान के सत्ता में आने की कल्पना ही उन्हें डरा देती है।हालांकि एक वर्ग तालिबान समर्थक है और वह देश में किसी भी तरह की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ है। तालिबान के डर से अशरफ़ गनी और डॉक्टर अब्दुल्ला मजबूरी में साथ हैं अन्यथा उनके रिश्ते जगजाहिर हैं। अमेरिकी रौब नहीं रहने पर तालिबान उनकी दुर्गति नहीं करेंगे-इसकी कोई गारंटी नहीं है। याने देश में गृहयुद्ध की आशंका खड़ी हो गई है। यह छिपा नहीं है कि तालिबान के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान में लोकतान्त्रिक ढंग से ऐसी कोई सरकार बनी रहे ,जिसकी सहानुभूति भारत के साथ हो।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने तो यह साफ़-साफ़ कह दिया है कि वे भारत को अफगानिस्तान में नहीं देखना चाहते, इसलिए वह चाहेगा कि सत्ता पर क़ाबिज़ हो और भारत का प्रभाव घटाया जा सके। जब तक तालिबान के हाथों में हुक़ूमत नहीं आएगी,पाकिस्तान चैन से नहीं बैठेगा। तालिबानी सरकार बनी तो पाक सेना की चांदी हो जाएगी।
सत्तर साल में वह पहली बार कंगाली की मार झेल रही है। उसके खर्चों पर रोक लग गई है और फ़ौज के अनेक धंधे बन्द हो गए हैं। तालिबान से उसका पुराना गठजोड़ रहा है। अफ़ीम का गैर क़ानूनी कारोबार तालिबान और पाक फौज की कमाई का बड़ा स्रोत रहा है। इससे दोनों खुश होंगे।
पिछले दिनों सख्ती के चलते अफ़ग़ान सीमा पर कश्मीरी उग्रवादियों के प्रशिक्षण शिविर बन्द करने पड़े थे।तालिबान के आने से फिर कश्मीर में उग्रवादियों की घुसपैठ कराई जा सकेगी।
इस सड़क निर्माण के दौरान तालिबान आतंकवादियों ने अनेक भारतीय मजदूरों की हत्या कर दी थी क्योंकि पाकिस्तान इसे पसंद नहीं कर रहा था। इरादा यही था कि इस बंदरगाह से ईरान और अफगानिस्तान के लिए निर्यात बढ़ाया जा सकेगा। यह बंदरगाह एक तरह से पाकिस्तान में चीन की ओर से बनाए गए ग्वादर बंदरगाह के जवाब में बनाया गया था,जो भारतीय नौसेना की क्षमता में इज़ाफ़ा करता है।
तालिबान -अमेरिका समझौता दरअसल दुनिया के सबसे बड़े चौधरी की कूटनीतिक पराजय है। यह इस उप महाद्वीप के लिए बेहद ख़तरनाक संकेत है। डोनाल्ड ट्रंप ने यह चुनावी दांव खेला है, लेकिन नहीं कहा जा सकता कि अफगानिस्तान में अब अमन चैन बहाल हो ही जाएगा।
दो दशक में हिंसा ने इस मुल्क़ को बेजान देह में तब्दील कर दिया है। उसमें प्राण फूंकना आसान काम नहीं है। कारण यह है कि समझौता किसी तरह अमेरिकी सैनिकों के वहां से पिंड छुड़ाने के लिए निकाला गया मजबूरी भरा रास्ता है।अमेरिका को अफगानिस्तान की खुशहाली से कोई लेना देना नहीं है। जानकारों को आशंका है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद अफगानिस्तान में अस्थिरता का नया दौर शुरू हो सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।