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दूसरा पहलू: ताजमहल और 466 किलो सोने का रहस्य, ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट जोसफ टेलर पर बदलवाने का आरोप, राज दफन

Wed, 21 Oct 2026 06:14 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 21 Oct 2026 06:14 AM IST
सार

ताजमहल के गुंबद पर कभी 466 किलो का स्वर्ण कलश चमकता था, पर उसके रहस्यमयी ढंग से गायब होने का राज एक ब्रिटिश अफसर की कब्र में हमेशा के लिए दफन हो गया। ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट जोसफ टेलर पर आरोप है कि उन्होंने यह सोने की छड़ उतरवाकर उसकी जगह तांबे की पॉलिश की हुई छड़ लगवा दी।

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Taj Mahal and 466 kg gold mystery British officer Lt Joseph Taylor accused of replacement secret buried
ताजमहल से जुड़ा रोचक प्रसंग - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एएनआई

विस्तार

यह तो सभी को पता है कि भारत के पहले ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ताजमहल को बेचना चाहते थे, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके मुख्य गुंबद पर लगी बेशकीमती स्वर्ण कलश छड़ (फिनियल) को चार बार बदला गया और इस बेशकीमती धरोहर में लगे सोने का कभी पता ही नहीं चला कि वह कहां गया।

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मुगल बादशाह शाहजहां ने मुमताज महल की याद में 1631 ईस्वी में रौजा-ए-मुनव्वर (ताजमहल) का निर्माण शुरू करवाया, जो 1648 में पूरा हुआ। शाहजहां के आदेश पर मुख्य गुंबद के शीर्ष पर 30 फीट छह इंच लंबी अलंकृत छड़ लगाई गई थी।
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लाहौर के कारीगर काजिम खान की देखरेख में बनी यह तीन कलश वाली छड़ 466 किलो ठोस सोने से बनी थी (मौजूदा कीमत लगभग 700 करोड़ रुपये)। औरंगजेब के समय तक ताजमहल की देखरेख ठीक से होती रही, लेकिन मुगल साम्राज्य के पतन के दौर में स्मारक से कीमती पत्थरों और सोने-चांदी की पच्चीकारी लूटी जाने लगी।
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1810 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी लेफ्टिनेंट जोसफ टेलर को ताजमहल की मरम्मत का जिम्मा सौंपा गया। आरोप है कि उन्होंने सोने की छड़ उतरवाकर उसकी जगह तांबे की पॉलिश की हुई छड़ लगवा दी। इसके बाद छड़ 1840, 1874 और 1940 में बदली गई। इस छड़ के शीर्ष पर अर्धचंद्र और उलटे कलश या कमल जैसी आकृति है। इतिहासकारों के अनुसार, यह मध्य एशियाई शैली में सत्ता और अधिकार के प्रतीक नेजे, यानी भाले का रूप है।

बाबर ने पानीपत में काबुली बाग मस्जिद बनवाई, जिसके शिखर पर रोशनदान जैसी आकृति बनाई गई थी। बाद में, हुमायूं के मकबरे से लेकर ताजमहल तक गुंबदों पर अलंकृत कलशों वाली छड़ें लगाई गईं। इसलिए, ताजमहल के शिखर पर उलटे कमल जैसी आकृति दिखती है।


दिलचस्प बात यह है कि जोसफ टेलर ने ताजमहल से उतारे गए 466 किलो सोने को ब्रिटिश खजाने में जमा ही नहीं कराया। उस संपदा का उन्होंनेे क्या किया, इसका भी कोई रिकॉर्ड नहीं है। 1874 में मरम्मत के दौरान छड़ उतारी गई, तो पता चला कि वह तांबे की थी। उस पर ‘जोसफ टेलर 1811’ लिखा था। टेलर की मृत्यु 1835 में हुई और उन्हें आगरा के ब्रिटिश कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनकी कब्र पर लिखा है कि यहां वह व्यक्ति लेटा है, जिसने ताजमहल और अकबर के मकबरे को संवारने का काम किया। संवारने वाली बात तो सही है, पर उसके साथ ही बेशकीमती छड़ का राज भी दफन हो गया।

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