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जीवन धारा: दिखावे से बेहतर है भीतर का निखार, श्रेष्ठ बनने की होड़ से बचने के सूत्र से सफलता
Wed, 21 Oct 2026 05:58 AM IST
ज्योति भास्कर
अल्फ्रेड एडलर
अल्फ्रेड एडलर
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 21 Oct 2026 05:58 AM IST
सार
अगर हम अपनी कीमत सिर्फ इससे तय करेंगे कि हम दूसरों से कितने आगे हैं, तो हमें जिंदगी भर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की दौड़ में भागना पड़ेगा। ऐसे में, कोई भी कामयाबी सच्ची खुशी या सुकून नहीं दे पाएगी।
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दिखावे से बेहतर है भीतर का निखार (सांकेतिक)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
लोग चाहते हैं कि दूसरे उन्हें योग्य समझें, उनकी प्रशंसा करें और उनके व्यक्तित्व में कोई कमी न निकाल सकें। इसके लिए वे अपने व्यक्तित्व को इस तरह प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं कि दूसरों की नजरों में उनकी छवि अच्छी बनी रहे। इसमें कोई बुराई नहीं है। खुद को सुधारना और बेहतर बनना अच्छी बात है। लेकिन, दिक्कत तब शुरू होती है, जब इन्सान सच में बेहतर बनने के बजाय सिर्फ दूसरों के सामने बेहतर दिखने का दिखावा करने लगता है। तब हमारा जीवन स्वयं को विकसित करने में कम और अपनी कमियों को छिपाने में अधिक खर्च होता है।
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मनुष्य अपनी कमजोरियों को जितना छिपाना चाहता है, कई बार उतना ही अधिक उनके प्रति सजग रहने लगता है। उसे डर होता है कि कहीं कोई उसकी अज्ञानता पहचान न ले, उसकी असफलता सामने न आ जाए या कोई उससे बेहतर सिद्ध न हो जाए। यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है कि क्या हम सचमुच अपनी कमियों से परेशान हैं, या इस बात से अधिक कि दूसरे लोग उन्हें देख लेंगे? दोनों में बहुत अंतर है।
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यदि हम अपनी गलती पहचानते हैं, तो उसे सुधार सकते हैं। पर, यदि हमारी चिंता यह है कि कोई हमें अज्ञानी या गलत न समझ ले, तो हम सीखने और गलतियों को सुधारने के बजाय अपनी सफाई देने में लगे रहेंगे। तब हमारा ध्यान समस्या को हल करने पर नहीं, अपनी प्रतिष्ठा को बचाने पर केंद्रित हो जाएगा।
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दरअसल, हम अपनी प्रगति को इस आधार पर नहीं मापते कि हमने कितना सीखा, बल्कि पैमाना यह होता है कि दूसरे हमसे कितना पीछे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि हम अपने जीवन को एक ऐसी परीक्षा बना देते हैं, जिसका परिणाम कभी पूरी तरह हमारे पक्ष में नहीं आ सकता। दुनिया में हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा, जो हमसे बेहतर है। अगर हम अपनी कीमत सिर्फ इस बात से तय करेंगे कि हम दूसरों से कितने आगे हैं, तो हमें जिंदगी भर खुद को सबसे बेहतर साबित करने की दौड़ में भागना पड़ेगा।
ऐसे में, कोई भी कामयाबी हमें सच्ची खुशी या सुकून नहीं दे पाएगी, क्योंकि हर बार तुलना करने के लिए कोई नया इन्सान सामने आ जाएगा। सच तो यह है कि कोई भी हर समय सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता। इसलिए, अपनी कमियों को स्वीकार करना कोई हार नहीं है, बल्कि उन्हें मानकर ही हम खुद को बेहतर बना सकते हैं।
जीवन का उद्देश्य हर व्यक्ति के सामने स्वयं को योग्य सिद्ध करना नहीं हो सकता। इससे अधिक जरूरी यह है कि हम अपने भीतर मौजूद संभावनाओं को कितना विकसित कर पाते हैं, अपनी गलतियों से कितना सीखते हैं और दूसरों के प्रति कितना ईमानदारी रहते हैं। जिस दिन हमें अपनी अपूर्णता से भागने की जरूरत नहीं रह जाती, उसी दिन हम दूसरों से श्रेष्ठ दिखाई देने की मजबूरी से भी धीरे-धीरे मुक्त होने लगते हैं।
- व्हाट लाइफ कुड मीन टू यू के अनूदित अंश
सूत्र: श्रेष्ठ बनने की होड़ से बचें
मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध होना नहीं, बल्कि अपनी कमियों को पहचानकर उनसे आगे बढ़ना है। जब हम अपना जीवन लोगों की प्रशंसा पाने और अपनी छवि बचाने में लगा देते हैं, तब स्वयं से दूर होने लगते हैं। दुनिया में हमेशा कोई हमसे अधिक योग्य और सफल होगा। इसलिए, तुलना से मिलने वाला संतोष कभी स्थायी नहीं हो सकता।