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जीवन धारा: जिज्ञासा को कभी मरने मत दीजिए
Mon, 19 Oct 2026 11:58 PM IST
ज्योति भास्कर
चार्ल्स डार्विन
चार्ल्स डार्विन
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 19 Oct 2026 11:58 PM IST
सार
जिज्ञासा को केवल बचपन का गुण मत समझिए। उसे जीवन भर अपने साथ रखिए, संसार को समझने के लिए भी और स्वयं को समझने के लिए भी।
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विस्तार
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मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसी शक्तियां होती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उसके जीवन की दिशा बदल सकती हैं। जिज्ञासा ऐसी ही आतंरिक शक्ति है। यह वह बेचैनी है, जो हमें किसी जानी-पहचानी चीज को भी नए ढंग से देखने के लिए प्रेरित कर सकती है। यह हमें उस समय भी प्रश्न पूछने को प्रेरित करती है, जब दूसरे लोग किसी बात या घटना को अंतिम सत्य मान कर स्वीकार कर चुके होते हैं। जरा अपने आसपास की दुनिया को देखिए। एक बच्चा किसी साधारण-सी वस्तु को देख कर पूछता है- ये क्या है, ऐसा क्यों है? उस बच्चे के लिए संसार में सब नया है। वह हर चीज को उत्सुकता से देखता है। पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके सवाल कम होने लगते हैं। उसे बताया जाता है कि क्या सही है, क्या गलत, क्या संभव है और क्या असंभव। धीरे-धीरे वह स्वयं देखने और समझने के बजाय दूसरों से मिले उत्तरों पर निर्भर होने लगता है। और यहीं से जिज्ञासा के मरने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है।
मेरे विचार में, मनुष्य की बौद्धिक यात्रा का सबसे बड़ा संकट अज्ञान नहीं है। अज्ञान तो हमारी स्वाभाविक स्थिति है। असली संकट तब पैदा होता है, जब हम यह मानने लगते हैं कि अब हम सब जान चुके हैं। और यहीं से सीखने-जानने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। जब मैं किसी जीव को देखता हूं, तो उसके बाहरी रूप से ज्यादा मुझे यह जानने की इच्छा होती है कि वह ऐसा क्यों है? ऐसे प्रश्न केवल प्रकृति के अध्ययन तक सीमित नहीं हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में इनकी जरूरत है। एक चिकित्सक यदि किसी असामान्य लक्षण के पीछे का कारण खोजता है, तो उसकी जिज्ञासा किसी समस्या के समाधान का मार्ग खोल सकती है। हम अक्सर सोचते हैं कि बड़ी खोजों के लिए असाधारण प्रतिभा की जरूरत होती है। पर ऐसा नहीं है। अनेक बार खोज की शुरुआत एक साधारण से प्रश्न या घटना से होती है, जिसे कोई दूसरा व्यक्ति मामूली-सी घटना समझ कर छोड़ देता है। किसी घटना की एक व्याख्या हमें तुरंत संतुष्ट कर सकती है, पर संतोष और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। मान लीजिए कि बगीचे में एक पौधा दूसरे पौधों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। हम तुरंत निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उसकी प्रजाति बेहतर है। पर क्या हमने मिट्टी की गुणवत्ता देखी? क्या उसे अच्छी धूप मिली? जब तक हम इन संभावनाओं की जांच नहीं कर लेते, तब तक हमारा निष्कर्ष अधूरा ही रहेगा। जिज्ञासा को जीवित रखने का अर्थ है जीवन को एक बंद किताब की तरह नहीं, बल्कि निरंतर खुलती हुई किताब की तरह देखना। उम्र बढ़ने के साथ हमारा अनुभव भी बढ़ता है, लेकिन अनुभव को ज्ञान में बदलने के लिए प्रश्न पूछते रहना जरूरी है। जिज्ञासा को केवल बचपन का गुण मत समझिए। उसे जीवन भर अपने साथ रखिए, संसार को समझने के लिए भी और स्वयं को समझने के लिए भी।
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मेरे विचार में, मनुष्य की बौद्धिक यात्रा का सबसे बड़ा संकट अज्ञान नहीं है। अज्ञान तो हमारी स्वाभाविक स्थिति है। असली संकट तब पैदा होता है, जब हम यह मानने लगते हैं कि अब हम सब जान चुके हैं। और यहीं से सीखने-जानने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। जब मैं किसी जीव को देखता हूं, तो उसके बाहरी रूप से ज्यादा मुझे यह जानने की इच्छा होती है कि वह ऐसा क्यों है? ऐसे प्रश्न केवल प्रकृति के अध्ययन तक सीमित नहीं हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में इनकी जरूरत है। एक चिकित्सक यदि किसी असामान्य लक्षण के पीछे का कारण खोजता है, तो उसकी जिज्ञासा किसी समस्या के समाधान का मार्ग खोल सकती है। हम अक्सर सोचते हैं कि बड़ी खोजों के लिए असाधारण प्रतिभा की जरूरत होती है। पर ऐसा नहीं है। अनेक बार खोज की शुरुआत एक साधारण से प्रश्न या घटना से होती है, जिसे कोई दूसरा व्यक्ति मामूली-सी घटना समझ कर छोड़ देता है। किसी घटना की एक व्याख्या हमें तुरंत संतुष्ट कर सकती है, पर संतोष और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। मान लीजिए कि बगीचे में एक पौधा दूसरे पौधों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। हम तुरंत निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उसकी प्रजाति बेहतर है। पर क्या हमने मिट्टी की गुणवत्ता देखी? क्या उसे अच्छी धूप मिली? जब तक हम इन संभावनाओं की जांच नहीं कर लेते, तब तक हमारा निष्कर्ष अधूरा ही रहेगा। जिज्ञासा को जीवित रखने का अर्थ है जीवन को एक बंद किताब की तरह नहीं, बल्कि निरंतर खुलती हुई किताब की तरह देखना। उम्र बढ़ने के साथ हमारा अनुभव भी बढ़ता है, लेकिन अनुभव को ज्ञान में बदलने के लिए प्रश्न पूछते रहना जरूरी है। जिज्ञासा को केवल बचपन का गुण मत समझिए। उसे जीवन भर अपने साथ रखिए, संसार को समझने के लिए भी और स्वयं को समझने के लिए भी।
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