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कोरोना महामारी और संकट: आखिर पटरी पर कब लौटेगी जिंदगी?

Sun, 27 Sep 2020 09:13 AM IST
Javed Anis जावेद अनीस
Updated Sun, 27 Sep 2020 09:13 AM IST
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Swinging lives between village and city
कोरोना की वजह से लाखों मजदूर अपने घर लौटने के लिए मजबूर हुए हैं। - फोटो : PTI

कोरोना संकट ने भारत के वर्ग विभाजन को बेनकाब कर दिया है, इसने हमारे कल्याणकारी राज्य होने के दावे के बुनियाद पर निर्णायक चोट की है। 

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लॉकडाउन लगाए जाने के बाद जिस तरह से लाखों की संख्या में मजदूर और कामगार अपने गांंवो की तरफ रिवर्स पलायन पर निकल पड़े उसकी मिसाल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में देखने को नहीं मिलती है। यह एक ऐसा वर्ग है जिसपर लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार पड़ी है वे अपने देश में ही प्रवासी करार दिए गए। 
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एक ऐसे समय में जब सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी तो उन्हें पूरी तरह से लावारिस छोड़ दिया गया जबकि इस देश के चुनावी राजनीति को चलाने वाले वही सबसे बड़े ईधन हैं। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया ऐसा रहा मानोंं इनका कोई वजूद ही ना हो। जब वे भूखे, प्यासे, बदहवासी के आलम में सैकड़ों, हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े तब भी इस व्यवस्था का दिल नहीं पसीजा और उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करते उनके हाल पर छोड़ दिया गया। 
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लॉकडाउन के दौरान शहरों में रोजगार पूरी तरह से ठप हो जाने के बाद मजदूरों को अपना गांंव दिखाई पड़ा था, जहां से वे शहर की तरफ पलायन करके आए थे ताकि वे अपने और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कर सकें और अब जब हम लॉकडाउन से अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं तो एकबार फिर वे रोजगार की तलाश में उसी शहर की तरफ निकलने लगे हैं। 

बीते कुछ दशकों के दौरान भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इस दौरान गांव में सीमित रोजगार, खेती के लगातार बिगड़ते हालात और शहरों में बढ़ते काम के अवसरों के कारण एक बड़ी आबादी शहरों की तरफ भागने को मजबूर हुई है। इनमें बड़ी संख्या छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों की है।

ये वे लोग हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में भी हाशिए पर थे और शहरों में भी परिधि पर रहते हैं जिसे हम स्लम या झुग्गी बस्ती कहते हैं। शहरों के चमक-दमक के बीच इन बस्तियों में जीवन जीने के लिए सबसे बुनियादी जरूरतों का अभाव होता है। हालांकि यहां बसने वाली आबादी शहर की रीढ़ होती है जो अपने श्रम से शहर की अर्थव्यवस्था में बहुमूल्य योगदान देती है। 

ये श्रम शक्ति असंगठित औद्याेेगिक श्रमिकों के अलावा निर्माण श्रमिक, छोटे दुकानदार, सब्जी-खाने का सामान बेचने वाले, अखबार बेचने वाले, धोबी, फेरी वाले, सफाई करने वाले, घरेलू कामगार इत्यादि जैसे काम करती है जिन्हें असंगठित क्षेत्र में गिना जाता है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के तहत 'विकास' का जो मॉडल अपनाया गया है उसकी परिधि से यह बड़ी आबादी बाहर है।

उदारीकरण का असली लाभ कुछ लोगों को ही मिला है जबकि असंगठित का एक बड़ा हिस्सा जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी बेहतर जिंदगी जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएं से भी दूर है। उनके बच्चों को न तो बेहतर शिक्षा मिल पाती है और न ही काम के बेहतर अवसर। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक असमानता की खाई इस कदर चौड़ी हो गई है कि देश के मात्र 57 अरबपतियों की संपत्ति देश के आर्थिक पायदान पर नीचे की 70 प्रतिशत आबादी की कुल संपत्ति के बराबर है। 

Swinging lives between village and city
श्रमिक स्पेशल ट्रेन से पूरे परिवार के साथ लौटते मजदूर - फोटो : पीटीआई

यह वही आबादी है जिससे इस देश का चुनावी लोकतंत्र संचालित होता है, क्योंकि वोट डालने के लिए यही वर्ग सबसे ज्यादा बाहर निकलता है, हर बार एक नई उम्मीद के साथ। आजादी के बाद से अब तक यही लोग चुनावी राजनीति के ईंधन बने हुए हैं। लगभग हर इलेक्शन में गरीबी ही चुनाव जीतने का मुद्दा बनती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद हर पार्टी द्वारा इन्हें भुला दिया जाता है।

हमारे देश में गरीब और गरीबी विपक्ष के मुद्दे हैं, लगभग सभी सियासी दल इन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं और संकट के समय इन्हें भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाता है। इसबार कोरोना संकट के समय भी यही हुआ है, केंद्र और राज्य सरकारों ने मजदूर और कामगारों को ना केवल नजरअंदाज किया बल्कि उनके पीड़ा को अवास्तविक बताने की भी कोशिश की गई। 

जब हम सभी को लाखों मजदूर सड़कों पर घिसटते हुए दिखाई पड़ रहे थे तब भारत सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में बताया जा रहा था कि 'अब कोई भी सड़क पर नहीं है, जो भी बाहर था उसे उपलब्ध आश्रयों में ले जाया गया है।' इसी प्रकार से इन्हें सीधे तौर पर कोई राहत पैकेज भी नहीं दिया गया।

केंद्र सरकार की तरफ से जिस बहुचर्चित वित्तीय पैकेज की घोषणा की गई है, उसमें अधिकतर कर्ज, ब्याज आदि पर छूट देने जैसी बातें हैं। मनरेगा में अतिरिक्त आवंटन किया गया है, साथ ही वापस लौटे मजदूरों को गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराने के घोषित उद्देश्य के साथ 'गरीब कल्याण रोजगार अभियान' की शुरुआत की है, जिसमें पचास हजार करोड़ रुपये के आवंटन की बात की जा रही है।

इस योजना के अंतर्गत वापस लौटे मजदूरों को 125 दिनों तक रोजगार मुहैया कराने की बात की गई है। लेकिन बताया जा रहा है कि 'गरीब कल्याण रोजगार अभियान' में पहले से चल रही योजनाओं की ही नई पैकेजिंग के साथ पेश किया गया है। 

दरअसल, भारत में गांवो से शहरों की तरफ पलायन और रिवर्स पलायन की समस्या इतनी बड़ी और व्यापक है की इसे मनरेगा और गरीब कल्याण रोजगार अभियान जैसी योजनाओं के सहारे हल नहीं किया जा सकता हैं।

इसके लिए व्यापक दृष्टि और दीर्घकालीन प्लानिंग की जरूरत है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिये सबसे पहले तो इसे राष्ट्र के एक ऐसे प्रमुख समस्या के तौर पर देखना होगा, जिसके अंतर्गत देश की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी फंसी हुई है तभी हम इसका कोई ठोस और स्थायी उपाय खोज सकेंगे।

अगर हम ऐसे नहीं करेंगे तो इस आबादी के लिये शहर अस्थायी ही सराय बने रहेगे, क्योंकि अब हमारे गांंव इतने बड़े आबादी के पेट पालने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। ऐसी स्थिति में करोड़ों जिंदगियां गांव और शहर के बीच झूलने को ही मजबूर रहेंगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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