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स्वादगली: शरणार्थियों के साथ जायके का संसार
पुष्पेश पंत
Updated Mon, 08 Oct 2018 01:05 PM IST
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जायके का संसार
तिब्बती शरणार्थियों का प्रवेश दलाई लामा के साथ भारत में हुआ। समय के साथ ही तिब्बती व्यंजनों ने भी अपनी एक खास जगह बना ली। तिब्बती नूडल्स ने ही बाजार में मैगी के लिए रास्ते खोले और चाउमीन पेट भरने का आसान तरीका बन गई।
आज से कोई छह दशक पहले जब भारत और चीन के संबंध हिमालयी सरहद पर सीमा विवाद के कारण अचानक तनावग्रस्त हुए, तब बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थियों का प्रवेश दलाई लामा के साथ भारत में हुआ। तभी से मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले भारतीयों का परिचय तिब्बती खाने से हुआ। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का लद्दाख वाला इलाका सदियों से 'छोटा तिब्बत' के नाम से जाना जाता है।
वहां से बहुत दूर धुर उत्तर-पूर्व में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का सरहदी इलाका भी तिब्बत से जुड़ा है और वहां का जायका तिब्बती जुबान जैसा ही है। 1962 के सीमा युद्ध के बाद देश की राजधनी दिल्ली में, दिल्ली विश्वविद्यालय के पास मजनू का टीला नामक स्थान पर तिब्बती शरणार्थियों की बहुत बड़ी बस्ती फैल गई।
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जिस तरह देश के विभाजन के बाद पंजाबी शरणार्थी अपने साथ तंदूरी व्यंजन ले आए, उसी तरह बेघर हुए तिब्बतियों ने इस इलाके में अनेक छोटे-छोटे ढाबानुमा भोजनालय चलाना शुरू कर दिया। यहां साधनहीन या सीमित आय वाले तिब्बती घर जैसा अपना खाना खा सकते थे। पैसे की तंगी झेल रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को भी और बाकी मुफलिसों को भी यह जगह बहुत रास आने लगी।
तिब्बती खाना बहुत सीधा-साधा होता है, क्योंकि तिब्बत के बर्फीले-रेगिस्तानी पठार पर बहुत कुछ उगता नहीं। मोटा अनाज जौ ही कठिनाई से पैदा होता है और इसी के आटे को पीसकर सत्तू की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जिसे सम्पा कहते हैं। याक के दूध को मथकर बनाया मक्खन और थोड़ा-सा नमक एक ऐसा पौष्टिक पेय खाद्य पदार्थ बनता है जिसे बहुत कम ईंधन या अतिरिक्त चिकनाई की जरूरत होती है।
पहले पहल यह अटपटा लगता है, मगर एक बार जुबान पर इसका जायका चढ़ जाए, तो संपूर्ण आहार लगने लगती है। मजनू के टीले के तिब्बती ढाबों ने ही जो टिब डैब्स कहलाते थे, पहले-पहल मोमोज और चाउमीन का स्वाद चखाया। दो मिनट में तैयार होने वाली जादुई मैगी नूडल्स के दो रुपये वाले पैकेट भी बहुत बाद में आए।
इनके लिए बाजार तिब्बती नूडल्स ने ही गरम किया। चाउमीन के दो प्रकार तिब्बती भोजन में मिलते हैं। एक मोटे-चपटे नूडल को लक्सा के रूप में पेश किया जाता है या फिर थुपका, जिसमें गोश्त के छोटे-छोटे टुकड़ों को आटे की कतलियों के साथ पकाया जाता है।
इसकी तुलना कुछ-कुछ आप गुजराती शाकाहारी दाल-ढोकली से कर सकते हैं, जिसमें आटे की छोटी-छोटी कतलियां शक्कर पारों की साइज में दाल के साथ खौलती हुई मजे में पक जाती है। इसे भी अपने आप में संपूर्ण आहार कहा जा सकता है।
सब्जियों का प्रयोग तिब्बती भोजन में लगभग नहीं के बराबर होता है और न ही मसाले अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लालमिर्च की तेल के साथ पीसी सॉसनुमा गीली चटनी मोमोज का साथ भी देती है और चाउमीन और थुपका का भी। चाउमीन में जो शिमला मिर्च या बंदगोभी के पत्ते टमाटर-प्याज का साथ देने लगे हैं, वह चीनी व्यंजनों की नकल लगते हैं।
तिब्बतियों को खाने के साथ चावल की हल्की मादक बियरनुमा छांग पीना अच्छा लगता है। जो लोग मादक शराब से परहेज करते हैं, वह हल्की बिना दूध की चाय नींबू के साथ पीते हैं। पर याद रहे इस नींबू का चलन भी शरणार्थियों के भारत आगमन के साथ ही बढ़ा है।
याक के मांस को सुखाकर काम लाया जाता था और याक के दूध से बनी पनीर, जिसे चुरपी कहते हैं, उसे चुइंगम की तरह चबा तिब्बती अपनी भूख और प्यास दोनों एकसाथ मिटाते हैं। नेपाल के उत्तरी इलाके में भी तिब्बती खानपान का प्रभाव देखने को मिलता है।
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आज से कोई छह दशक पहले जब भारत और चीन के संबंध हिमालयी सरहद पर सीमा विवाद के कारण अचानक तनावग्रस्त हुए, तब बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थियों का प्रवेश दलाई लामा के साथ भारत में हुआ। तभी से मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले भारतीयों का परिचय तिब्बती खाने से हुआ। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का लद्दाख वाला इलाका सदियों से 'छोटा तिब्बत' के नाम से जाना जाता है।
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वहां से बहुत दूर धुर उत्तर-पूर्व में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का सरहदी इलाका भी तिब्बत से जुड़ा है और वहां का जायका तिब्बती जुबान जैसा ही है। 1962 के सीमा युद्ध के बाद देश की राजधनी दिल्ली में, दिल्ली विश्वविद्यालय के पास मजनू का टीला नामक स्थान पर तिब्बती शरणार्थियों की बहुत बड़ी बस्ती फैल गई।
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जिस तरह देश के विभाजन के बाद पंजाबी शरणार्थी अपने साथ तंदूरी व्यंजन ले आए, उसी तरह बेघर हुए तिब्बतियों ने इस इलाके में अनेक छोटे-छोटे ढाबानुमा भोजनालय चलाना शुरू कर दिया। यहां साधनहीन या सीमित आय वाले तिब्बती घर जैसा अपना खाना खा सकते थे। पैसे की तंगी झेल रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को भी और बाकी मुफलिसों को भी यह जगह बहुत रास आने लगी।
तिब्बती खाना बहुत सीधा-साधा होता है, क्योंकि तिब्बत के बर्फीले-रेगिस्तानी पठार पर बहुत कुछ उगता नहीं। मोटा अनाज जौ ही कठिनाई से पैदा होता है और इसी के आटे को पीसकर सत्तू की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जिसे सम्पा कहते हैं। याक के दूध को मथकर बनाया मक्खन और थोड़ा-सा नमक एक ऐसा पौष्टिक पेय खाद्य पदार्थ बनता है जिसे बहुत कम ईंधन या अतिरिक्त चिकनाई की जरूरत होती है।
पहले पहल यह अटपटा लगता है, मगर एक बार जुबान पर इसका जायका चढ़ जाए, तो संपूर्ण आहार लगने लगती है। मजनू के टीले के तिब्बती ढाबों ने ही जो टिब डैब्स कहलाते थे, पहले-पहल मोमोज और चाउमीन का स्वाद चखाया। दो मिनट में तैयार होने वाली जादुई मैगी नूडल्स के दो रुपये वाले पैकेट भी बहुत बाद में आए।
इनके लिए बाजार तिब्बती नूडल्स ने ही गरम किया। चाउमीन के दो प्रकार तिब्बती भोजन में मिलते हैं। एक मोटे-चपटे नूडल को लक्सा के रूप में पेश किया जाता है या फिर थुपका, जिसमें गोश्त के छोटे-छोटे टुकड़ों को आटे की कतलियों के साथ पकाया जाता है।
इसकी तुलना कुछ-कुछ आप गुजराती शाकाहारी दाल-ढोकली से कर सकते हैं, जिसमें आटे की छोटी-छोटी कतलियां शक्कर पारों की साइज में दाल के साथ खौलती हुई मजे में पक जाती है। इसे भी अपने आप में संपूर्ण आहार कहा जा सकता है।
सब्जियों का प्रयोग तिब्बती भोजन में लगभग नहीं के बराबर होता है और न ही मसाले अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लालमिर्च की तेल के साथ पीसी सॉसनुमा गीली चटनी मोमोज का साथ भी देती है और चाउमीन और थुपका का भी। चाउमीन में जो शिमला मिर्च या बंदगोभी के पत्ते टमाटर-प्याज का साथ देने लगे हैं, वह चीनी व्यंजनों की नकल लगते हैं।
तिब्बतियों को खाने के साथ चावल की हल्की मादक बियरनुमा छांग पीना अच्छा लगता है। जो लोग मादक शराब से परहेज करते हैं, वह हल्की बिना दूध की चाय नींबू के साथ पीते हैं। पर याद रहे इस नींबू का चलन भी शरणार्थियों के भारत आगमन के साथ ही बढ़ा है।
याक के मांस को सुखाकर काम लाया जाता था और याक के दूध से बनी पनीर, जिसे चुरपी कहते हैं, उसे चुइंगम की तरह चबा तिब्बती अपनी भूख और प्यास दोनों एकसाथ मिटाते हैं। नेपाल के उत्तरी इलाके में भी तिब्बती खानपान का प्रभाव देखने को मिलता है।