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मौसम की बातें और थोड़ी सी यादें: याद करो गर्मी की दोपहरियां और चख लो जिंदगी

Mon, 27 Mar 2023 10:31 AM IST
Kumar Abdul Rahman कुमार रहमान
Updated Mon, 27 Mar 2023 10:31 AM IST
सार

ऋतुराज बसंत जा चुका है और अब बस गर्मी की आमद-आमद है। महीनों के हिसाब से देखें तो गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है, लेकिन बादल और बारिश ने कुछ-कुछ गुलाबी जाड़ों का सा एहसास बना रखा है।

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Summer 2023: The golden and old memories of summer
गर्मियों के वो दिन बहुत हसीन थे। जब दिन में लू चलती और रात को पुरवाई। - फोटो : Istock

विस्तार

ऋतुराज बसंत जा चुका है और अब बस गर्मी की आमद-आमद है। महीनों के हिसाब से देखें तो गर्मी का मौसम शुरू हो चुका है, लेकिन बादल और बारिश ने कुछ-कुछ गुलाबी जाड़ों का सा एहसास बना रखा है। रात में अभी भी मोटी चादर की जरूरत पड़ ही जाती है। कभी गर्मियां बड़ी हसीन हुआ करती थीं। आइए आपको ले चलते हैं, गर्मी की उन्हीं दोपहरियों की तरफ, जिन्हें आप पीछे छोड़ आए हैं। चलिए थोड़ी सी जिंदगी चख लें...

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गर्मियों के वो दिन बहुत हसीन थे। जब दिन में लू चलती और रात को पुरवाई। बड़े-बुजुर्ग दोपहरियां सोकर गुजारा करते और बच्चे जागकर। सिर्फ जागते नहीं थे बल्कि पूरी शिद्दत के साथ धमाचौकड़ी मचाते थे। ऐसी-वैसी ऊधम नहीं, बल्कि कुछ ऐसी कि सोने वालों की नींद उड़ जाए। जितना रोका जाता, उतना ही दोपहरी में बाहर घूमने निकल जाते। दोपहरी में लू के थपेड़ों के मजे यारों संग लेते। जमीन पर गिरी इमली के दाने आपस में बांटकर मुंह बना-बनाकर खाया करते।

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गर्मी शुरू होते ही इम्तेहान आ धमकते। जैसे-तैसे रात-रात भर पढ़कर पेपर निपटाए जाते। तब पास होना बड़ा ही मुश्किल लगता था। घर वाले कहते, कूढ़ मगज है। इसके भेजे में कुछ घुसता ही नहीं। पापा कहते घास खोदेगा। उन दिनों बच्चे घर वालों की डांट-फटकार को बिना दिल पर लिए बड़ी ही बहादुरी से पेपर दिया करते थे।

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सभी बच्चे इम्तेहान का आखिरी पर्चा देने के बाद किसी विजेता की तरह घर में घुसते। घर आकर सबसे पहला जो काम करते, वो ये था कि स्कूल का बस्ता दूर किसी कोने में रख आते, ताकि तीन महीने तक उसके दर्शन न होने पाएं। उन दिनों आज की तरह अप्रैल में स्कूल नहीं खुला करते थे। सो अप्रैल, मई और जून तीन महीने छुट्टियों के होते। तब सात जुलाई को स्कूल खुलता। उऩ्हें छुट्टियां क्या कहना, धमाचौकड़ी, ऊधम और शरारतों के दौर होते थे। शरारतें भी ऐसी-वैसी।

भरी दोपहर में किसी पड़ोसी की घंटी के बटन पर च्यूंगम चिपकाकर भाग आना। घंटी बजती रहती। जब अंकल घर से बाहर झांकते तो उन्हें कोई नजर नहीं आता तो बड़े हैरान-परेशान होते। इन छुट्टियों की दोपहरी में बच्चे इस कदर धमाचौकड़ी मचाते कि घर के सभी बड़े-बूढ़े पूरी दोपहरी डांटते-डपटते गुजार देते। उन दोपहरियों में बच्चे आई-स्पाई खेलते। पुड़ुक-पुड़ुकियां खेलते। खो-खो खेलते। कोड़ा जमाल खेलते।


लकड़सुंघा का डरावना प्रसंग

जब दोपहर में लू जोर पकड़ती, तो मोहल्ले में कर्फ्यू सा लग जाता। बच्चों को डराया जाता कि बाहर निकले तो लकड़सुंघा पकड़ ले जाएगा। लकड़सुंघा लकड़ी सुंघा कर बच्चों को बस में कर लेता है। इस लकड़सुंघे का खौफ ऐसा था कि किसी बूढ़े को बड़ा सा झोला या बोरा लिए देखते, तो बस यही लगता कि वो लकड़सुंघा है। फिर सभी बच्चे सर पर पैर रखकर भागते।
 

गर्मी की दोपहरी में लू से बचने के लिए सभी बच्चों को घर में बंद करके अंदर से दरवाजे में ताला लगा दिया जाता। किसी को भी दोपहर बारह बजे से लेकर शाम चार बजे तक घर से नहीं निकलने दिया जाता। बड़े कहते कि लू लग जाएगी। उन दिनों समझ में नहीं आता था कि आखिर यह लू लगती कैसे है? जब कभी किसी बच्चे को तेज बुखार आता तो मां डराया करती कि उसे लू लग गई है। तुम्हें भी लग जाएगी।


बच्चे बहादुर होते हैं। बिल्कुल निडर। वह किसी खिड़की वगैरह से कूदकर बाहर आ ही जाते। फिर बाकी बच्चों को चुपके-चुपके बुलाते। इस तरह से कुछ बाहर निकलने में कामयाब हो ही जाते। कोई देखने न पाए इसलिए किसी दूसरी गली में पहुंच जाते। या फिर मोहल्ले के बाग का रुख करते। वहां शहतूत, फालसा, लीची, आम, इमली और कमरख तोड़कर खाते। बाग में जाकर लच्छी खेलते। लच्छी का खेल बड़ा ही मजेदार होता। एक बड़ा सा गोला बनाकर उसके बीच में एक मोटा सा डंडा रख दिया जाता।

एक बच्चा चोर बनता और बाकी शाह। शाह बने बच्चे पेड़ पर चढ़ जाते। सभी बच्चे चोर बने लड़के का ध्यान भटकाने की कोशिश करते। फिर कोई चुपके से उस डंडे को उठाकर दूर फेंक देता। चोर बना बच्चा वह डंडा उठाकर फिर उसी घेरे में रख देता। जब बच्चे डंडा उठाने की कोशिश करते तो इस बीच चोर बना बच्चा पेड़ से उतरने वाले बच्चे को छूने की कोशिश करता। जो छू जाता फिर उसे चोर बनाया जाता।

Summer 2023: The golden and old memories of summer
वो जिंदगी के सबसे हसीन पल थे। तब बड़ों की तरह हमें और आपको जाड़े नहीं, बल्कि गर्मियां पसंद थीं। - फोटो : Istock

कोई बड़ा पानी पीने के लिए जाग जाता तो चोरी पकड़ी जाती कि बच्चे घर से फरार हैं। फिर बच्चों को अगली दोपहरी एक मजेदार सजा मिलती। सभी को एक कमरे में बच्चों की मैग्जीन और कॉमिक्स के साथ बंद कर दिया जाता। फिर पूरी दोपहरी हम सब कॉमिक्स पढ़ते। मैग्जीन में रास्ता ढूंढो जैसे खेल खेलते। पढ़ने से ऊब जाते तो लूडो और सांप सीढ़ी खेलते।  

वो ऐसा दौर था, जब गर्मी के फुरसत भरी दोपहरी में सभी कुछ न कुछ पढ़ते थे। पढ़ते-पढ़ते मुंह पर किताब रखकर सो जाने का रिवाज था। मोबाइल के साथ ऐसा नहीं कर सकते हैं। बच्चों के लिए ढेरों मैग्जीन छपती थीं, जिन्हें बच्चे एक-दूसरे से एक्सचेंज करके पढ़ते थे। भइया क्रिकेट की मैग्जीन पढ़ते। मम्मी और दादी सारिका पढ़ते।

दादा और पापा दिनमान या धर्मयुग पढ़ा करते थे। धर्मयुग का ढब्बू जी वाला कार्टून तो हम बच्चे भी पढ़ लिया करते। हम सब ढब्बू जी, चाचा चौधरी और साबू के इस कदर फैन थे कि कापियों पर उसे बड़ी खूबसूरती से उकेरा करते। कई बार जोश में इसे गलत कॉपी पर बना दिया करते। स्कूल में कुटाई होने पर ही मालूम पड़ता कि दिल गलती कर बैठा है। तब के मास्टर ऐसे उदार नहीं थे कि सिर्फ बेंच पर खड़ा करके छोड़ दें। मां जैसे अदरख कूटती हैं वैसे ही बच्चे कूटे जाते थे। गर्मी की वो कुटाई ज्यादा असर नहीं करती थी, जितनी जाड़े की।
 

गूलर के पेड़ की फुनगी और परी वाली कहानी

तब सभी कुदरत के संग जीते थे। गर्मी की रातों में बड़े से आंगन में खूब सारी चरपाइयां बिछा करतीं। सभी खुले आसमान के नीचे सोया करते। रात को पुरवाई के बीच खुले आसमान तले ओस से नम बिस्तर पर लेटकर साफ आसमान में तारे गिनना भी एक मजेदार खेल था। इस बीच कोई जुगनू दिख जाता तो बड़ा ही मजा आता। लगता कोई तारा आसमान में उड़ा चला जा रहा है।

गर्मी की रातों में जब बच्चे खुली छत पर दादी के साथ सोते, तो दादी कहती कि रात को गूलर के पेड़ की फुनगी पर बहुत सुंदर सा फूल खिलता है। उसे रात बारह बजे चुपके से बहुत खूबसूरत सी परी तोड़ ले जाती है। उस परी को देखने के इंतजार में कितनी ही रातें बोझिल आंखों से जागने की कोशिश करते हुए सो जाते।

कभी भी रात बारह बजे तक नहीं जाग सके और इसलिए न गूलर का फूल देख सके और न ही उस खूबसूरत परी के ही दीदार हो सके, जिसके पंख सोने के होते थे। दादी ऐसा ही कहा करती थीं। दादी यह भी कहती थीं कि अगर किसी को गूलर का फूल मिल जाए तो वह आदमी बहुत अमीर हो जाता है।

नवीं क्लास में जब पढ़ाया गया कि गूलर का फूल उसके फल के अंदर बहुत बारीक सा पाया जाता है तो पता चला कि लोग गूलर के फूल से नहीं, बल्कि मेहनत से अमीर होते हैं। बेचारी दादी। वो बहुत भोली थीं।

वो जिंदगी के सबसे हसीन पल थे। तब बड़ों की तरह हमें और आपको जाड़े नहीं, बल्कि गर्मियां पसंद थीं। गर्मी के वो दिन सुनहरे थे। कभी थोड़ी सी फुर्सत निकालिए न और यादों की अलमारी को जरा आहिस्ता से खोलिए। वहां आपके बचपन की एक किताब होगी। उसे झाड़िए-पोंछिए और फिर आहिस्ता-आहिस्ता उसके पन्ने पलटिए।

उन पन्नों पर भूला-बिसरा सा बहुत कुछ मिलेगा, जो छूट गया है। सच मानिए आपको बहुत ही मजा आएगा, जब आप किसी इतवार की शाम कुछ दोस्तों के साथ बैठकर लेमन टी के साथ किताब के उन पन्नों को पलटेंगे। वहां आपको गर्मी की दोपहरियां मिलेंगी। लू के थपेड़ों के बीच खेलते-कूदते आप मिलेंगे। इमली, कमरख, शहतूत, फालसा तोड़ते-बीनते बच्चों का समूह नजर आएगा। जबरदस्ती किसी कमरे में कॉमिक्स के साथ बंद कर दिए गए कुछ बच्चे मिलेंगे।


वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है। बच्चे अब खेलते नहीं हैं। वो मोबाइल में मस्त हैं। मोबाइल उनकी स्मृति को ही कमजोर नहीं कर रहा है, बल्कि उनकी कल्पनाशीलता भी छीन रहा है। कल्पनाशीलता जीवन में बहुत ही उपयोगी है। खास तौर से क्रिएटिव फील्ड के लिए। अपने बच्चों को अपने जैसा बचपन दीजिए। इससे आप उनकी दुनिया को खूबसूरत बना सकेंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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