युवा कदम: कहानी इंदौर के वसीम इकबाल की, जो बदल चुके हैं 10 हजार से ज्यादा बच्चों की दुनिया
इंदौर के वसीम इकबाल ने अब तक लगभग ढाई लाख बच्चों को बाल अधिकारों पर प्रशिक्षित किया है, दस हजार से ज्यादा बच्चों को बालश्रम से छुड़वाकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा है।
वे कहते हैं- इन बच्चों को लगातार स्कूल की परिधि में रखना भी एक बड़ी चुनौती है। हमारे मित्र, स्वैच्छिक कार्यकर्ता और टीम के सदस्य इससे भी जूझते हैं।
वसीम कहते हैं कि अब हम इंदौर के साथ खरगोन, धार एवं देवास जिले में भी काम कर रहें है और लगभग पचास के ऊपर गांवों में हमारी सीधी पहुंच है।
हमारा मानना है कि बच्चों को शुरुवात से जीवन कौशल सीखाएं जाए तो काफी फर्क पड़ता है। उनमें अपनी बात मनवाने की क्षमता बढ़ती है, जैसे खरगोन जिले के बड़वाह ब्लॉक के पचास बच्चों ने उनसे एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि यदि वे जीवन कौशल शिक्षा से वे महरूम रहते तो वे अपने माता-पिता से खुलकर बात नहीं कर पाते।
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“वर्तमान सरकार की इस बात की तारीफ़ करना होगी जिसकी वजह से सहसा भारतवासियों को संविधान की याद आई और यह सुखद है कि अब जागरूक लोग संविधान को पढ़ रहें है, संविधान को समझ रहें है, स्वैच्छिक संस्थाओं ने भी अपने एजेंडे में संविधान को सर्वोच्च मान्यता दी है और वे अलग-अलग प्रकार से प्रशिक्षण सामग्री बनाकर या लोगों से चर्चा करके संविधान को पुन: जनमानस में पहुंचाने का काम कर रहें है।” – वसीम इकबाल युवा हैं और इंदौर से ही हैं।
वसीम इकबाल की कहानी
बचपन तीन भाइयों और अपने परिवार के साथ इंदौर में बीता, पिताजी धार्मिक शिक्षा के शिक्षक थे और कुछ ना कुछ व्यवसाय करने की कोशिश करते थे, परन्तु व्यवसाय में जो बड़ी पूंजी लगती है उसका अभाव था, इसलिए हर बार वे हर व्यवसाय में फेल हो जाते थे। इससे परिवार की आर्थिक दशा पर फर्क पड़ता था।
वसीम कहते हैं-
“जब मै पांचवी में था तो एक दुकान पर रंगों की पुड़िया बांधने का काम करने लगा और जो रुपये मिलते थे उससे अपनी पढाई का खर्च निकालने लगा। बहुत बाद में पिताजी को मालूम पड़ा तो वे नाराज हुए और मेरा काम बंद करवाया।”
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जैसे-तैसे दसवी तक पहुंचे और फिर कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं था तो कॉमर्स विषय लेकर बारहवी और बीकॉम पूरा किया। बाद में किसी ने कहा कि सोशल वर्क में एमए कर लो सो वह किया”। समाज सेवा में आने का कोई तयशुदा मकसद नहीं था
एमए के दौरान समाज कार्य का व्यवहारिक अनुभव लेने बस्तियों में जाना पड़ता था और इस दौरान बच्चों से मुखातिब होना पड़ता था। गरीबी, भुखमरी और बदहाल बच्चों में अपना चेहरा नजर आता था तो धीरे-धीरे बच्चों की समस्याओं पर ध्यान देना शुरू किया। बस्तियों में समस्याएं बहुत थीं और हर दिन का सूरज समस्याओं का एक बड़ा जखीरा लेकर आता और लोगों को रोज ही जूझना पड़ता था।
इस संघर्ष में बच्चे अपने अभिभावकों के साथ हर स्तर की लड़ाई में साझेदार थे, पर इस सबमे उनका बचपन छीन रहा था और वे पढ़ाई तो दूर - बाकी स्वाभाविक बचपन से भी दूर होते जा रहें थे और बच्चों की पिटाई, शोषण, उनके साथ मारपीट, दैहिक शोषण तक हो जाता था और न पुलिस ध्यान देती थी और न ही प्रशासन।
बचपन का यह हाल देखकर तब यह निश्चय किया कि अब काम की दिशा बचपन की ओर ही होगी। डिग्री होने के बाद अपनी संस्था का पंजीयन किया और नौकरी की, कई वर्ष नौकरी करके कुछ रुपया जमा किया तब तक अपनी संस्था के खर्च बचत से पुरे करते रहे और नौकरी भी चलती रही। बाद में नौकरी स्थाई रूप से छोड़ी और बच्चों के लिए काम आरम्भ किया।
इंदौर में काम की चुनौतियां
इंदौर में काम करना बहुत मुश्किल था- राजनीति, गुंडागर्दी, संगठित समूहों की झुग्गियों पर पकड़ और प्रशासन का साथ ना मिलना जैसी बड़ी चुनौतियां थी, पर धीरे-धीरे हमने सीखा इन सबसे लड़ना, निपटना और बच्चों के हकों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। वसीम की संस्था “आस” के पास आज इंदौर जैसे शहर की चाईल्ड लाईन का महत्वपूर्ण काम है जिसमे रोज उन्हें नई-नई समस्याओं से जूझना पड़ा है।
पुलिस, प्रशासन, न्यायालय, पालक, गुंडे और मवाली किस्म के लोगों से रोज निपटना पड़ता है। रात-बेरात थानों पर जाना पड़ता है, बस्तियों में गहरा सम्पर्क होने से लोग कभी भी फोन करके बुला लेते हैं।
सबसे ज्यादा दिक्कत बालश्रमिको के मुद्दों पर आती है - क्योकि जब भी टीम रेस्क्यू करवाने जाती है तो सबसे पहले बच्चे ही मना कर देते है कि वे श्रमिक हैं क्योंकि उन्हें जो तीस-चालीस रुपये रोज मिलते हैं, वे बंद हो जाते हैं, दूसरा प्रभावशाली लोग बच्चों से अपने होटल्स या कल-कारखानों में मेहनत करवाते हैं और जब इस तरह की धर पकड़ होती है तो वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके चाईल्ड लाईन की टीम को गलत साबित करवा देते हैं।
बच्चों के अधिकारों और बचपन को बचाने की लड़ाई
“क़ानून में बहुत तरह के लूप होल्स है जिसकी वजह से अक्सर अपराधी छूट जाते हैं और बच्चे पुन: काम पर लौट जाते हैं। प्रभावशाली लोग कोर्ट में बड़े-बड़े वकील खड़े कर लेते है पर हमारी संस्था को सरकारी वकील पर निर्भर रहना पड़ता है- जिसे केस में कोई रुचि नहीं होती। असल में यह सब इतना सामान्य हो गया है कि हमें बच्चों का शोषण होते दिखता है- पर आंखों में चुभता नहीं है”।
अभी तक आस संस्था ने लगभग ढाई लाख बच्चों को बाल अधिकारों पर प्रशिक्षित किया है, दस हजार से ज्यादा बच्चों को बालश्रम से छुड़वाकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा है। इन बच्चों को लगातार स्कूल की परिधि में रखना भी एक बड़ी चुनौती है। हमारे मित्र, स्वैच्छिक कार्यकर्ता और टीम के सदस्य इससे भी जूझते है।
वसीम कहते है कि अब हम इंदौर के साथ खरगोन, धार एवं देवास जिले में भी काम कर रहें है और लगभग पचास के ऊपर गांवों में हमारी सीधी पहुंच है। हमारा मानना है कि बच्चों को शुरुवात से जीवन कौशल सीखाएं जाए तो काफी फर्क पड़ता है। उनमें अपनी बात मनवाने की क्षमता बढ़ती है, जैसे खरगोन जिले के बड़वाह ब्लॉक के पचास बच्चों ने उनसे एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि यदि वे जीवन कौशल शिक्षा से वे महरूम रहते तो वे अपने माता पिता से खुलकर बात नहीं कर पाते।
दरअसल, ये वो समूह है जहां इन बच्चों के समुदाय में जल्दी शादी हो जाती है, परन्तु इन बच्चों ने मां बाप को समझाया और कहा कि हम अभी पढ़ाई करना चाहते हैं और आगे जीवन में शिक्षक, डॉक्टर, नर्स या पुलिस बनना चाहते हैं। बच्चों की बात जायज थी, लिहाजा माता-पिता ने लम्बी बहस करके और टीम के सदस्यों से बात करके शादी की बात छोड़ दी और आज ये सभी 50 बच्चे स्कूल जा रहें है - यह एक बड़ी उपलब्धि है।
इसी तरह से धार जिले में संविधान और मौलिक अधिकारों के साथ कर्तव्यों पर जोर देने वाले कार्यक्रम और प्रशिक्षण 13 स्कूलों में किए, जिसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इन सब प्रशिक्षणों और कार्यक्रमों का व्यापक प्रभाव कोविड के दौरान देखने को मिला जब इन बच्चों और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं ने लोगों को मदद की।
इंदौर जैसे शहर में देशभर के लोग मजदूरी करने आते हैं और बदहाल जीवन जीते हैं, परन्तु आस संस्था ने कोविड के दौरान पलायन पर निकले हजारों मजदूर और लोगों को ना मात्र भोजन, सूखा राशन, जूते, चप्पल से लेकर अस्थाई आवास उपलब्ध करवाया, बल्कि उनके घर जाने की व्यवस्था भी प्रशासन के सहयोग से की।
आसान नहीं है काम करने की राह
वसीम कहते है –“शुरवात में हम फंड लेते थे तो डोनर संस्थाओं के अजेंडे पर काम करते थे क्योकि हर संस्था का अपना एक एजेंडा होता है और वे थोपते है साथ ही उम्मीद करते है कि दो साल की अवधि में दुनिया बदल जाए, परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है, यह सब इतना आसान नही था, धीरे-धीरे हमने अपने काम से अपनी पहचान बनाई और फिर अब हम उन्हीं डोनर संस्थाओं से रुपया लेते हैं जो विकेन्द्रित ढंग से काम करने दें, अपने मुद्दे और एजेंडा हम पर ना थोपें और ना ही हस्तक्षेप करें”।
कोविड की त्रासदी के बाद अब फंड मिलना मुश्किल हो गया है और हमें लगता है कि संस्थाओं को व्यक्तिगत डोनर खोजना चाहिए - जो भले ही न्यूनतम राशि दें, परन्तु उनका काम से जुड़ाव हो, सामाजिक सरोकार हो और वे काम में मदद भी करें- सिर्फ रुपया देकर अलग ना हो जाएं। आप यदि अच्छा काम अच्छे मन से करते है तो लोग आगे आते हैं, आज हमारे काम में कई लोग स्वेच्छा से जुड़े है और हमे तकनीकी, कानूनी और अन्य प्रकार से मदद करते है।”
सामाजिक काम में चुनौतियां बहुत है परन्तु आज इंदौर और आसपास के जिलों में हमारे काम का यह प्रभाव है कि बच्चों के शोषण के मुद्दे कम हुए है, न्याय प्रक्रिया में काम तेजी से हो रहें है, बच्चों के मुकदमों के संदर्भ में, पुलिस, प्रशासन और बड़े व्यवसायियों में संवेदनशीलता बढी है - अलग अलग विभागों में हमारी उपस्थिति बढ़ी है। यद्यपि ये कोशिशें अभी बहुत छोटे स्तर पर है, क्योकि शोषण और अपराध के दुष्चक्र बड़े है परन्तु हम पूरी निष्ठा और लगन से लगे हैं कि हम आने वाले समय में बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे पाए और उन्हें जीवन कौशलों से इतना परिपूर्ण कर दें कि वे अपना भला बुरा समझ लें, अपने निर्णय लें और हर तरह की गलत आवाज और कृत्य के प्रति अपनी आवाज बुलंद कर सकें।
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