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फिल्म 'मेंटल है क्या' का नाम बदलना कितना जायज?

Wed, 03 Jul 2019 03:58 PM IST
Veena Nagpal वीना नागपाल
Updated Wed, 03 Jul 2019 03:58 PM IST
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special story on mental illness
पिछले कुछ दिनों से फिल्म ' मेंटल है क्या' का शीर्षक विवादों में रहा। - फोटो : Film Poster

पिछले कुछ दिनों से फिल्म ' मेंटल है क्या' के शीर्षक को लेकर बहुत चर्चाएं रहीं। अंतत: उसने एक विवाद का रूप ले लिया। फिल्म का पोस्टर रिलीज होते ही यह विवाद चरम पर पहुंच गया। परिणाम यह हुआ कि फिल्म निर्माताओं को फिल्म का शीर्षक बदलना पड़ा। बता दें कि इसका शीर्षक जजमेंटल कर दिया गया है।

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बहरहाल, क्या यह विवाद केवल विरोध के लिए ही था या इसमें कोई तर्क भी था? फिल्म 'मेंटल है क्या' का नाम बदलना कितना जायज था?

दरअसल, इसका विरोध मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों ने किया जिसमें वह एनजीओ भी शामिल थे जो मानसिक रोगियों तथा अवसादग्रस्त व्यक्तियों के बीच काम करते हैं। उनका कहना था कि शारीरिक रोगों की तरह मानसिक रुग्णता भी होती है और इसके प्रति भी उतनी ही चिंता और सरोकार दिखाया, बताया जाना चाहिए जितनी की हम सामान्य रोगियों की करते हैं।
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दरअसल, यह बहुत जरूरी है कि मानसिक रोगियों के प्रति संवदेनशील व्यवहार किया जाए तथा उनकी पूरी तरह से तीमारदारी की जाए। यह मेंटल है है क्या कहकर कोई मजाक और उपहास की बात नहीं है। इस रोग की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। प्रसिद्ध अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने समय-समय पर इसे लेकर बहुत ही गंभीर बातें की हैं। वह स्वयं इसके दौर से गुजर चुकी हैं। 

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यह विवाद इतना बढ़ गया कि बाद में फिल्म का नाम जजमेंटल कर दिया गया है। - फोटो : social media

उन्होंने एक बार साक्षात्कार में कहा था- "मैं अब भी उस वक्त को याद करती हूं तो सिंहर जाती हूं।" उन्होंने बताया कि पहले तो मैं अपनी मानसिक अस्वस्थता को छिपाती रही। यह बहुत कष्टकारी था, लेकिन मेरी मां ने पहचान लिया कि मेरे साथ सब कुछ सही नहीं है और तब उन्होंने मेरी स्थिति जानकर मेरे साथ पूरा सहयोग किया और वह चट्टान कि भांति मेरे साथ खड़ी रहीं, तब हमने मनोचिकित्सक का उपचार शुरू किया और मैं इस रोग से उबर गई।

यकीनन, यदि मेरी मां मेरे साथ यूं खड़ी ना होती तो शायद मैं मानसिक अस्वस्थता से बाहर न आ पाती। दीपिका इसे लेकर इतनी चिंतित हैं कि उन्होंने एक संस्था बनाई है जो मानसिक रोगियों के साथ काम करती है और उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश करती है। उनकी वह कोशिश अंतत: सफल होती दिखाई दे रही है। 

जिन परिवारों में दुर्भाग्य से मानसिक रोगी कोई सदस्य हो जाए तो उसके साथ बहुत उपेक्षा का व्यवहार किया जाता है जबकि उस समय तो ऐसे लोगों के साथ और सहानभूति की जरूरत होती है। लेकिन देखा जाता है कि उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है यहां तक कि उसे संबंधियों व परिचितों से छिपाया  भी जाने लगता है।

प्राय: यह मानसिक अवस्था महिलाओं में अधिक हो जाती है। वह स्वभाव से ही भावुक संवेदनशील होती हैं, इसलिए उनकी मानसिकता किसी भी बात या घटना से या लगातार होने वाले दुर्व्यवहार से आहत हो जाती है। धीरे-धीरे उदासी उन्हें घेर लेती है और इसी उदासी के बढ़ने से वह अवसाद में चली जाती हैं। 

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अवसाद क सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं होती हैं क्योंकि वह भावुक और संवेदनशील होती हैं। - फोटो : social media

इस अवसाद में वह अपने में सिमट जाती हैं और सामान्य व्यवहार नहीं कर पातीं। कई बार अधिक अवसाद हिंसा में भी बदल जाता है। ऐसे में उन्हें मनोचिकित्सक की आवश्यकता होती है। सामान्य अवसाद में यदि उपचार मिल जाए तो नौबत यहां तक नहीं पहुंचेगी पर, उन्हें यह सुविधा नहीं मिलती उल्टे उन्हें ओझाओं और भूत-प्रेत निकालने वालों के यहां ले जाते है और उन्हें तरह-तरह के शारीरिक कष्ट देते हैं जिससे उनकी मानसिक स्थिति और बिगड़ जाती है।

दरअसल, होना यह चाहिए कि परिवारों में मानसिक रोगी को त्याज्य न मानकर उसको सही उपचार दिलाया जाए। यदि उन्हें मानसिक चिकित्सालयों में रखने की भी आवश्यकता हो तब भी उनसे निरंतर परिवार को मिलते रहना चाहिए। दुख इस बात का है कि उनके पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद भी परिवार उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता।

मानवाधिकार में कार्यरत् एक स्थापित सदस्य ने बताया कि वह मानसिक चिकित्सालय गए  वहां एक संभ्रात सी दिखने वाली महिला मिली। वह कर्नल की पत्नी थी। अब वह पूरी तरह से अपने मानसिक रोग से स्वस्थ हो चुकी थी, लेकिन बार-बार उनके परिवार में सूचना देने पर भी उनके परिवार से उन्हें कोई लेने आ रहा था जबकि उनके पुत्र सेना में ही उच्च अधिकारी थे।

मेंटल है क्या? की बात मजाकिया न होकर बहुत गंभीर है। यदि मनोचिकित्सकों और मनोज्ञानिकों ने इसे सतही मानकर इसका विरोध किया है तो वह सही है और फिल्म के नाम बदलने का भी स्वागत किया जाना चाहिए। 

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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