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Space Warfare Explained: धरती के बाद अब अंतरिक्ष में शुरू होगी जंग! स्पेस वॉरफेयर में क्या कर रहा भारत?

Fri, 22 Aug 2025 07:59 PM IST
Sankalp Singh संकल्प सिंह
Updated Fri, 22 Aug 2025 07:59 PM IST
सार

मॉडर्न वॉरफेयर में जीत सिर्फ हथियारों से नहीं होती, बल्कि डाटा, सर्विलांस और रियल-टाइम इंटेलिजेंस से होती है जो सीधे इन सैटलाइट्स से मिलती है। किसी दुश्मन की मूवमेंट ट्रैक करनी हो या अपनी मिसाइलों को पिन-पॉइंट टारगेट तक पहुंचाना हो हर कदम में सैटेलाइट्स की भूमिका निर्णायक बन चुकी है। यानि अंतरिक्ष अब सिर्फ टेक्नोलॉजी का मैदान नहीं रहा ये अब अगले बैटलफील्ड के रूप में तैयार हो रहा है।

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Space Warfare Explained: The Rising Dangers of Space Warfare and Its Impact on the Future
Space Warfare - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

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साल है 2032 सुबह के 2 बजकर 5 मिनट हुए हैं...
कश्मीर बॉर्डर पर भारतीय खुफिया विभाग को एक असामान्य गतिविधि का पता चलता है। पाकिस्तान की सेना लाइन नियंत्रण रेखा के बेहद पास सेना की तैनाती कर रही है। और फिर कुछ ही घंटों में भारत, पाकिस्तान के ऊपर एक बड़ा जवाबी मिसाइल हमला करता है। रावलपिंडी समेत सैन्य रूप से अहम एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर मिसाइलें गिरती हैं। तिलमिलाया पाकिस्तान जवाबी हमला करने के लिए तैयार है, मिसाइल अटैक करने के लिए बटन दबाया जाता है लेकिन कुछ होता नहीं है। मिसाइल लॉन्च फेल हो चुका है। पाकिस्तान का कम्युनिकेशन सिस्टम क्रैश हो चुका है। आर्मी की कम्युनिकेशन लाइनें बंद हैं। GPS डाउन है। पाकिस्तान अंधेरे में है। पाकिस्तान का पूरा डिफेंस सिस्टम लकवाग्रस्त हो चुका है।ये सिर्फ एक कहानी नहीं ये स्पेस वॉरफेयर का वो चेहरा है जिससे हम आज भी अनजान हैं।


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आज के समय करीब 12,000 से ज्यादा एक्टिव सैटेलाइट्स पृथ्वी को घेरे हुए हैं। आपका मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, जीपीएस, बैंकिग सिस्टम, लाइव टीवी सब सैटेलाइट पर निर्भर हैं। यहां तक कि मौसम की सटीक जानकारी भी। लेकिन असली बात ये है कि कई देश अब इन सैटेलाइट्स का इस्तेमाल सिर्फ सुविधा के लिए नहीं, बल्कि दूसरे देशों पर स्ट्रैटेजिक और मिलिट्री डोमिनेंस के लिए कर रहे हैं।

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मॉडर्न वॉरफेयर में जीत सिर्फ हथियारों से नहीं होती, बल्कि डाटा, सर्विलांस और रियल-टाइम इंटेलिजेंस से होती है जो सीधे इन सैटलाइट्स से मिलती है। किसी दुश्मन की मूवमेंट ट्रैक करनी हो या अपनी मिसाइलों को पिन-पॉइंट टारगेट तक पहुंचाना हो हर कदम में सैटेलाइट्स की भूमिका निर्णायक बन चुकी है। यानि अंतरिक्ष अब सिर्फ टेक्नोलॉजी का मैदान नहीं रहा ये अब अगले बैटलफील्ड के रूप में तैयार हो रहा है।


जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकियों के ठिकानों पर हमला किया था, तो कहां, कैसे और किस कोर्डिनेट पर हमला किया जाएगा सबकुछ सैटेलाइट डाटा से ही तय किया गया।  हालांकि, भारत की इस जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान और भारत के बीच जब DGMO स्तर पर बातचीत चल रही थी, तो पाकिस्तान ने एक चौकाने वाला दावा किया कि उन्हें भारतीय सेना की लाइव मूवमेंट की जानकारी थी। अब सवाल है कैसे? क्योंकि चीन की सैटेलाइट्स ने इंडिया की ट्रूप मूवमेंट को ट्रैक किया और वो इंटेल पाकिस्तान को रियल-टाइम में भेजी गई।

ये है स्पेस इंटेलिजेंस का नेटवर्क, जो आंखों से नहीं अंतरिक्ष से देखता है। आज के दौर में कुछ सैटेलाइट्स सिर्फ देखने या डेटा देने के लिए नहीं बने हैं, वो दूसरे सैटलाइस को जाम कर सकते हैं, या उन्हें पूरी तरह से नष्ट कर सकते हैं। इन्हें कहा जाता है – ASAT, यानी Anti Satellite Weapons और ये शक्ति सिर्फ कुछ देशों के पास है। इनमें अमेरिका, रूस, चीन और भारत का नाम शुमार है।

2019 में भारत ने मिशन शक्ति के तहत अपना खुद का सैटेलाइट मार गिराया था। एक इतिहास बना था - भारत दुनिया का चौथा एंटी सैटेलाइट वेपन पावर बना। अब युद्ध सिर्फ धरती पर नहीं अंतरिक्ष में भी लड़ा जाएगा। जिस देश का स्पेस में वर्चस्व है वो युद्ध से पहले ही जीत के करीब होता है। अब जरा सोचिए आज अगर कोई देश आपके नेविगेशन को जैम कर दे, जीपीएस बंद कर दे, सैनिकों की कम्युनिकेशन लाइनें काट दे तो आपकी पूरी आर्मी अंधी और बहरी हो जाएगी। और अगर इससे भी खतरनाक कुछ है तो वो है अंतरिक्ष में मौजूद न्यूक्लियर वॉरहेड्स।

Space Warfare Explained: The Rising Dangers of Space Warfare and Its Impact on the Future
Space Warfare - फोटो : Amar Ujala

अंतरिक्ष में मौजूद न्यूक्लियर वॉरहेड

अब सोचिए अगर ऊपर अंतरिक्ष में कोई न्यूक्लियर बम धरती का चक्कर काट रहा हो कोई उसे देख नहीं सकता लेकिन अगर वो एक्टिवेट हो गया, तो पूरी दुनिया अंधेरे में डूब सकती है। कुछ दशक पीछे चलते हैं कोल्ड वॉर के दौर में ये एक खतरनाक सपना था न्यूक्लियर वेपन को स्पेस में भेजना।

अमेरिका और सोवियत यूनियन दोनों ने पृथ्वी के ऊपरी वातावरण में न्यूक्लियर बम डिटोनेट किया, बस ये जानने के लिए कि उसका असर क्या होगा। और नतीजा? धरती की कक्षा में घूम रहे कई सैटेलाइट्स जलकर राख हो गए। इस भयानक एक्सपेरिमेंट के बाद, दोनों देशों ने एक समझौते पर दस्तखत किए कि स्पेस में किसी भी तरह के न्यूक्लयर और मास डिस्ट्रक्शन वेपन का इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले साल, अमेरिकी इंटेलिजेंस ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की, इसमें कहा गया कि रूस स्पेस में न्यूक्लियर वॉरहेड भेजने की तैयारी कर रहा है, जो अमेरिका के सैटेलाइट नेटवर्क को नष्ट कर सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स ने तो ये तक दावा कर दिया कि रूस ने वो बम पहले ही अंतरिक्ष में भेज दिया है।

एक अननोन रसियन सैटेलाइट जो अब ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में चुपचाप घूम रही है उसी में ये वॉरहेड है। वहीं यूएस इंटेल का कहना था - ये कोई आम सैटेलाइट नहीं, बल्कि एक सीक्रेट प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसका मकसद है स्पेस में न्यूक्लियर वॉरहेड तैनात करना है। जवाब में रूस ने सारे आरोपों को खारिज कर दिया। पुतिन बोले - हम स्पेस को जंग का मैदान नहीं बनाना चाहते। फिर क्या हुआ?

अप्रैल 2024 में यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में अमेरिका और जापान एक प्रस्ताव लेकर आते हैं, जिसमें कहा गया आओ हम मिलकर न्यूक्लियर और मास डिस्ट्रक्शन वेपन के स्पेस में इस्तेमाल पर बैन लगाएं। लेकिन रुस ने उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया।

यूएस ने तुरंत जवाब दिया देखा? हमें पता था कि तुम कुछ छुपा रहे हो। इसके बाद रूस भी एक प्रस्ताव लेकर आता है कि हम तो स्पेश में हर तरह के हथियारों को हमेशा के लिए बैन करना चाहते हैं। और इस बार अमेरिका ने उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया। अब रूस बोल रहा है हथियारों की होड़ तुमने शुरू की है हम तो सिर्फ तैयार हो रहे हैं। तो असली सवाल ये है क्या हम आने वाले स्पेस वॉर के लिए तैयार हैं?

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Space Warfare - फोटो : Amar Ujala

स्पेस रेस में आगे बने रहने के लिए भारत क्या कर रहा है?

आज के समय कई जरूरी सी रूट्स जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल ग्लोबल इकोनॉमी को पम्प करने में एक इंपोर्टेंट रोल प्ले कर रहे हैं। ठीक इसी तरह धरती के ऑर्बिट जोन में मौजूद ये सैटेलाइटें भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ईंधन की भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में स्ट्रैट ऑफ हार्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल की तरह ही धरती का ऑर्बाइटल जोन भी काफी स्ट्रैटेजिक है। 

स्पेस में जिस तेजी से अमेरिका, चीन और रूस की मौजूदगी बढ़ रही है उससे हमारे सैटेलाइट नेटवर्क पर भी थ्रेट्स आ रहे हैं। कल को अगर युद्ध या किसी जियोपॉलिटिकल एजेंडा को पूरा करने के लिए कोई देश हमारे सेटेलाइट नेटवर्क के साथ जरा भी छेड़छाड़ करता है। ऐसे में हमारे देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क और इकोनॉमी तबाह हो सकती।

इन्हीं खतरों और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए भारत साल 2028 तक अपना खुद का इंडियन स्पेस स्टेशन का बेसिक मॉडल धरती की कक्षा में स्थापित करने जा रहा है। ये स्पेस स्टेशन सीधे तौर पर सैटेलाइट्स को शील्ड तो नहीं करेगा, लेकिन इसकी मौजूदगी से भारत की अर्थ की ऑर्बिट में परमानेंट प्रेजेंस रहेगी। 

इससे स्पेस में हमारी पकड़ मजबूत होगी। इसके साथ ही आने वाले समय में इंडिया का यह स्पेस स्टेशन कई साइंटिफिक रिसर्च, टेक्नॉलॉजिकल डेवलपमेंट और जियोपॉलिटिकल एजेंडे को पूरा करने में भी अहम रोल निभाएगा। आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष से जुड़े कई बड़े सपनों को हमें पूरा करना है। इनमें सबसे अहम है 2035 तक ऑपरेशनल भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन बनाना और 2040 तक भारतीयों को चांद पर उतारना। इस मिशन को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए ISRO के साथ-साथ हमारे स्टार्टअप्स और प्राइवेट कंपनियां भी स्पेस रेस में अपना हिस्सा ले रही हैं। 


दुनियाभर में कई देश अब स्पेस में अपनी वर्चस्व बनाने के लिए अंतरिक्ष को एक्सप्लोर कर रहे हैं। चांद पर नए संसाधनों की खोज से लेकर स्पेस कॉलोनाइजिंग और एस्टेरॉयड माइनिंग की दिशा में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों ने अपनी उपस्थिति बनाने की शुरुआत कर दी है। ऐसे में साल 2027 में लॉन्च होने जा रहे गगनयान मिशन की सफलता भारत को अंतरिक्ष के इन क्षेत्रों में हो रही स्पेस रेस के केंद्र बिंदु में लाकर खड़ा कर देगी। इस स्पेस प्रोग्राम का इस्तेमाल हम अपने फॉरेन पॉलिसी टूल के रूप में भी कर सकेंगे।

गगनयान मिशन आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को एक नया आकार देने का काम करेगा। इस मिशन की सफलता, इसरो को दूसरे बड़े मिशन्स की रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करेगी। भविष्य में मून कोलोनाइजेशन, एस्टेरॉयड  माइनिंग, स्पेस टूरिज्म से लेकर स्पेस लॉजिस्टिक सप्लाई चेन के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने के लिए इसरो के लिए ये मिशन एक टिपिंग प्वाइंट साबित हो सकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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